नयी दिल्ली/ मुंबई/कोलकाता. गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रतन टाटा को एक शब्द का एसएमएस ‘वेल्कम’ (स्वागत है) भेजा था, जिसके बाद 2008 में टाटा नैनो परियोजना पश्चिम बंगाल से गुजरात स्थानांतरित हो गई थी. इससे दुनिया की सबसे सस्ती कार बतायी जा रही नैनो के इतिहास में एक अध्याय समाप्त हो गया था और दूसरा अध्याय शुरू हो गया था.
पश्चिम बंगाल में 2006 में राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार द्वारा टाटा समूह के वास्ते सिंगूर में नैनो कार उत्पादन इकाई स्थापित करने के लिए किये गए भूमि अधिग्रहण के खिलाफ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) प्रमुख ममता बनर्जी के नेतृत्व में उग्र विरोध प्रदर्शन हुए थे. मोदी ने टाटा को यह एसएमएस उस समय भेजा था जब उद्योगपति कोलकाता में एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे और पश्चिम बंगाल से टाटा नैनो परियोजना बाहर ले जाने की घोषणा कर रहे थे.
मोदी ने 2010 में साणंद में 2,000 करोड़ रुपये के निवेश से बने टाटा नैनो संयंत्र का उद्घाटन करते हुए कहा था, ”जब रतन टाटा ने कोलकाता में एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि वे पश्चिम बंगाल छोड़ रहे हैं, तो मैंने उन्हें एक छोटा सा एसएमएस भेजा था जिसमें मैंने लिखा था, ‘वेल्कम’ और अब आप देख सकते हैं कि एक रुपये का एसएमएस क्या कर सकता है.” टाटा ने तीन अक्टूबर, 2008 को पश्चिम बंगाल से नैनो परियोजना को बाहर ले जाने की घोषणा की थी और कहा था कि अगले चार दिन के भीतर गुजरात के साणंद में संयंत्र स्थापित किया जाएगा.
मोदी ने तब कहा था कि कई देश नैनो परियोजना के लिए हरसंभव मदद देने को उत्सुक हैं, लेकिन गुजरात सरकार के अधिकारियों ने सुनिश्चित किया कि परियोजना भारत से बाहर न जाए. उन्होंने सरकारी मशीनरी की भी प्रशंसा करते हुए कहा था कि यह दक्षता में कॉर्पोरेट संस्कृति से मेल खा रही है और राज्य के तेज विकास में प्रमुख भूमिका निभा रही है. साणंद में प्लांट से जून 2010 में पहली नैनो कार के बाहर निकलने के समय, टाटा ने इकाई स्थापित करने में मदद के लिए मोदी के नेतृत्व वाली गुजरात सरकार की सराहना की थी.
टाटा ने कहा था, ”जब हमने एक अन्य नैनो संयंत्र के लिए जमीन की तलाश की, तो हम शांति और सद्भाव की ओर बढ.ना चाहते थे. गुजरात ने हमें वह सब कुछ दिया जिसकी हमें जरूरत थी. मोदी ने हमसे कहा, ‘यह सिर्फ टाटा की परियोजना नहीं, यह हमारी परियोजना है.’ हम पर जो समर्थन और भरोसा जताया गया है, उसके लिए हम उनके बहुत आभारी हैं.” टाटा ने 2018 में नैनो कारों का उत्पादन बंद कर दिया.
एयर इंडिया को नए पंख देकर रतन टाटा ने पुराने सपने को किया था साकार
आर्किटेक्ट की पढ.ाई करने के बावजूद विमान उड़ाने का जुनून रखने वाले दिग्गज उद्योगपति रतन टाटा ने घाटे में चल रही एयर इंडिया को कई दशक बाद टाटा समूह के नियंत्रण में लाकर एक बहुत पुराने सपने को अंजाम तक पहुंचाया था. टाटा ने यात्री विमान और लड़ाकू विमान उड़ाए लेकिन एयर इंडिया को फिर से परवाज देने की उनकी मंशा जनवरी, 2022 में ही जाकर पूरी हो पाई थी. टाटा समूह ने एयर इंडिया का नियंत्रण उसी समय सरकार से अपने हाथों में लिया था.
इसके साथ ही कभी टाटा समूह की ही एयरलाइन रही एयर इंडिया की घरवापसी हो गई. इसे अंजाम देने में रतन टाटा के मार्गदर्शन की अहम भूमिका रही थी. टाटा संस के मानद चेयरमैन रतन टाटा (86) का बुधवार देर शाम मुंबई में वृद्धावस्था से जुड़ी समस्याओं के कारण निधन हो गया. उनका बृहस्पतिवार को पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया.
पिछले ढाई वर्षों में एयर इंडिया को फिर से रफ्तार देने के लिए टाटा प्रबंधन ने कई प्रयास किए हैं. इस दौरान टाटा समूह ने अपना विमानन कारोबार को नए सिरे से पुनर्गठित करने की पहल की है. इस क्रम में अगले महीने एयर इंडिया के साथ विस्तारा का विलय होने वाला है. इसके पहले एआईएक्स कनेक्ट (पूर्व में एयरएशिया इंडिया) का एयर इंडिया एक्सप्रेस के साथ विलय पूरा हो चुका है.
रतन टाटा ने एयर इंडिया का अधिग्रहण पूरा होने के बाद एक संदेश में कहा था, ”टाटा समूह यात्रियों की सुविधा और सेवा के मामले में एयर इंडिया को पसंदीदा एयरलाइन बनाने के लिए मिलकर काम करने के लिए उत्साहित है.” वर्ष 1932 में जेआरडी टाटा ने टाटा एयरलाइन की स्थापना की थी. हालांकि, सरकार ने बाद में उसका राष्ट्रीयकरण कर उसे एयर इंडिया का नाम दे दिया था. धीरे-धीरे एयर इंडिया आर्थिक मुश्किलों में घिरती गई और उसका विनिवेश करने का फैसला किया गया.
रतन टाटा एयर इंडिया को फिर से टाटा समूह के नेतृत्व में लाने का इंतजार वर्षों से कर रहे थे. उन्होंने इस मौके का पूरा फायदा उठाया.
जेआरडी टाटा के नेतृत्व में एयर इंडिया एक समय दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित एयरलाइंस में शुमार होती थी. रतन टाटा अपनी एयरलाइन को फिर से उसी प्रतिष्ठा एवं छवि के स्तर पर ले जाना चाहते थे. अब शायद वह आसमान से इसे नई ऊंचाइयों को हासिल करते हुए देखें.
साइरस मिस्त्री से टाटा समूह का नियंत्रण वापस लेने के लिए रतन टाटा ने लड़ी थी कानूनी लड़ाई
टाटा समूह के मानद चेयरमैन और दिग्गज उद्योगपति रतन टाटा ने शापूरजी पालोनजी समूह के साइरस मिस्त्री के साथ लगभग चार साल लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी, जिसके बाद वह उन्हें नमक से लेकर सॉफ्टवेयर तक के कारोबार में सक्रिय (टाटा) समूह के कार्यकारी अध्यक्ष पद से हटाने में कामयाब रहे थे.
पद्म विभूषण से सम्मानित रतन टाटा का मुंबई के एक अस्पताल में बुधवार रात निधन हो गया था. वह 86 साल के थे. वहीं, उनके कट्टर प्रतिद्वंद्वी और टाटा समूह के पूर्व कार्यकारी चेयरमैन मिस्त्री की चार सितंबर 2022 को महाराष्ट्र के पालघर जिले में एक कार हादसे में मौत हो गई थी.
मिस्त्री ने वर्ष 2012 में टाटा सन्स प्राइवेट लिमिटेड (टीएसपीएल) के चेयरमैन के रूप में रतन टाटा की जगह ली थी. हालांकि, लगभग चार साल बाद उन्हें नाटकीय तरीके से इस पद से हटा दिया गया था, जिससे देश के सबसे बड़े व्यापारिक समूह में बेहद कड़ी कानूनी लड़ाई छिड़ गई, जो उच्चतम न्यायालय तक पहुंची. इस दौरान, देश के शीर्ष वकील अदालतों में दोनों पक्षों की पैरवी करते दिखे.
टाटा समूह पर नियंत्रण की लड़ाई शुरू में राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) में लड़ी गई. इसके बाद यह राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) पहुंची और अंतत? दोनों पक्षों का झगड़ा शीर्ष अदालत के समक्ष आया.
शीर्ष अदालत ने 26 मार्च 2021 के अपने आदेश में मिस्त्री को टाटा समूह के कार्यकारी चेयरमैन पद से हटाने के फैसले को बरकरार रखा, जिसके साथ ही इस कड़वी कानूनी लड़ाई का अंत हो गया. तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ ने मिस्त्री को टाटा समूह के शीर्ष पद पर बहाल करने के एनसीएलएटी के फैसले को खारिज कर दिया था. पीठ ने टीएसपीएल में स्वामित्व हितों को अलग करने के अनुरोध वाली शापूरजी पालोनजी (एसपी) समूह की याचिका भी खारिज कर दी थी.
सिंगूर गाथा: नैनो कार संयंत्र बाहर जाने से बंगाल का राजनीतिक और औद्योगिक परिदृश्य किस तरह बदला
उद्योगपति रतन टाटा ने अक्टूबर 2008 में दुर्गा पूजा की पूर्व संध्या पर घोषणा की कि ‘टाटा मोटर्स’ सिंगूर में लगभग पूरा हो चुके नैनो कार संयंत्र से हट जाएगी. उन्होंने इस फैसले के लिए ममता बनर्जी के भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन को जिम्मेदार ठहराया और दावा किया इसके कारण जिसे दुनिया की सबसे सस्ती कार बनाने से जुड़ी अभूतपूर्व परियोजना कहा जा रहा था, वह बेपटरी हो गई.
टाटा की वापसी की परिणति एक तीखे सियासी संघर्ष के रूप में हुई जिसने पश्चिम बंगाल के औद्योगिक और राजनीतिक परिदृश्य को महत्वपूर्ण रूप से बदल दिया. सोलह साल बाद भी सिंगूर की विरासत को सिर्फ खोए हुए अवसरों की कहानी से कहीं अधिक एक विस्तृत पटल पर देखा जाता है. रतन नवल टाटा का बुधवार रात मुंबई में निधन हो गया. वह 86 वर्ष के थे. वर्ष 2006 में टाटा मोटर्स ने लाखों भारतीय परिवारों को किफायती दामों पर वाहन स्वामी बनाने लक्ष्य के साथ नैनो परियोजना (मात्र एक लाख रुपये की कीमत वाली एक क्रांतिकारी कार) की घोषणा की थी.
कोलकाता के पास के ग्रामीण क्षेत्र सिंगूर को उसकी बहु-फसली उपजाऊ कृषि भूमि के लिए जाना जाता है, लेकिन इसका चयन वाम मोर्चा सरकार और टाटा मोटर्स द्वारा विनिर्माण स्थल के रूप में किया गया था. तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य, जिन्होंने राज्य की अर्थव्यवस्था को बढ.ावा देने के लिए तेजी से औद्योगीकरण का आह्वान किया था, ने उत्साहपूर्वक इस परियोजना का समर्थन किया था. उन्हें यह उम्मीद थी कि यह परियोजना पश्चिम बंगाल को एक औद्योगिक केंद्र में बदल देगी और इससे राज्य से बाहर पूंजी का प्रवाह समाप्त हो जाएगा.
हालांकि, हुगली जिले के सिंगूर में संयंत्र स्थापित करने के निर्णय को किसानों के एक समूह के तीव्र विरोध का सामना करना पड़ा, जिन्होंने अपनी जमीन देने से इनकार कर दिया, जिससे एक तीखा संघर्ष छिड़ गया. अंतत? इसने परियोजना को पटरी से उतार दिया.
संयंत्र के लिए लगभग 1,000 एकड़ भूमि के अधिग्रहण की प्रक्रिया से सिंगूर में व्यापक अशांति फैल गई. कई किसानों ने मुआवजा स्वीकार कर लिया, लेकिन कई ने अपनी आजीविका छिनने के डर से अपनी जमीन देने से इनकार कर दिया.
वर्ष 2006 के विधानसभा चुनाव में मिले झटके के बाद अपनी राजनीतिक किस्मत को पुनर्जीवित करने के लिए प्रयासरत विपक्षी नेता ममता बनर्जी ने तुरंत किसानों का समर्थन किया और उन लोगों की 400 एकड़ जमीन वापस करने की मांग की, जिन्होंने इसे स्वेच्छा से नहीं बेचा था. उन्होंने ज.मीन के ‘जबरन अधिग्रहण’ के खिलाफ उग्र विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किया.
रतन टाटा, जिन्होंने सिंगूर से हटने के फैसले को ‘दर्दनाक’ करार दिया था, ने इसके लिए बनर्जी को दोषी ठहराया था और उनके सतत विरोध का जिक्र करते हुए एक संवाददाता सम्मेलन में कहा था, ”मुझे लगता है कि सुश्री बनर्जी ने ‘ट्रिगर’ दबा दिया.” वर्ष 2008 में स्थानीय समाचार पत्रों में प्रकाशित एक खुले पत्र में उन्होंने पश्चिम बंगाल के लोगों से आग्रह किया कि वे इन दो स्थितियों के बीच चयन करें कि वे बुद्धदेव भट्टाचार्जी की सरकार के तहत ‘आधुनिक बुनियादी ढांचा और औद्योगिक विकास’ चाहते हैं या ‘राज्य को टकराव, आंदोलन, अराजकता और हिंसा के विनाशकारी राजनीतिक माहौल में डूबा हुआ देखना चाहते हैं.
हालांकि, बनर्जी और टीएमसी ने टाटा पर राजनीतिक पूर्वाग्रह का आरोप लगाया और दोहराया कि उनका विरोध औद्योगीकरण का नहीं बल्कि उपजाऊ कृषि भूमि के जबरन अधिग्रहण का है. सिंगूर से हटने के तुरंत बाद ‘टाटा मोटर्स’ ने घोषणा की कि वह नैनो संयंत्र को गुजरात के साणंद में स्थानांतरित करेगी. तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वागत किया जिसके परिणामस्वरूप नैनो संयंत्र की तेजी से स्थापना हुई और उत्पादन शुरू हुआ.
सिंगूर आंदोलन ने पश्चिम बंगाल की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया और ममता बनर्जी को प्रमुखता दी, क्योंकि भूमि अधिग्रहण के प्रति उनके उग्र विरोध ने ग्रामीण मतदाताओं को प्रभावित किया और उनकी पार्टी टीएमसी को 2009 के आम चुनाव में 19 सीट मिली जो 2004 में सिर्फ एक सीट जीत सकी थी.
इसने अंतत: ममता को 2011 में वाम मोर्चे के तीन दशक पुराने शासन को समाप्त करने और पश्चिम बंगाल में हाशिए पर रहने वाले लोगों और ग्रामीण समुदायों के खेवनहार के रूप में अपनी प्रतिष्ठा को मजबूत करने में सक्षम बनाया. इसने अंतत: उन्हें 2011 में वाम मोर्चे के तीन दशकों से अधिक शासन को समाप्त करने और पश्चिम बंगाल के हाशिए पर रहने वाले और ग्रामीण समुदायों के लिए एक चैंपियन के रूप में अपनी प्रतिष्ठा को मजबूत करने में सक्षम बनाया.
वर्ष 2011 में सत्ता में आने के तुरंत बाद ममता बनर्जी की सरकार ने नैनो संयंत्र के लिए किसानों से ली गई जमीन वापस करने का आदेश दिया, जिसके बाद पुलिस ने इस पर रातोंरात कब्जा कर लिया. जब टाटा मोटर्स ने फैसले का विरोध किया तो अदालती लड़ाई शुरू हुई, लेकिन अंतत:, 2016 में उच्चतम न्यायालय ने भूमि को उसके मूल मालिकों को वापस करने का आदेश दिया. इसके परिणामस्वरूप इस वीरान या परित्यक्त फैक्टरी को ध्वस्त कर दिया गया.
टाटा ने जेएलआर खरीद लिया था अपमान का बदला
असफलता से सफलता की कहानी लिखना तो कोई रतन टाटा से सीखे. 1999 में टाटा समूह की बड़ी यात्री कार टाटा इंडिका से अपेक्षित लाभ न मिलने पर अपने यात्री वाहन खंड को फोर्ड मोटर्स को बेचने का फैसला करने के बाद, कंपनी के कुछ अधिकारियों द्वारा कथित तौर पर अपमानित किए जाने से आहत रतन टाटा ने अपनी रणनीति बदली और न केवल सफलता हासिल की बल्कि 2008 में फोर्ड की जेएलआर को खरीद लिया.
टाटा समूह की बड़ी यात्री कार टाटा इंडिका पेश किए जाने के एक वर्ष बाद भी अपेक्षित लाभ नहीं दे रही थी. हताश होकर रतन टाटा के नेतृत्व में टाटा मोटर्स के शीर्ष अधिकारियों ने फोर्ड मोटर्स के यात्री वाहन खंड को प्रमुख अमेरिकी वाहन विनिर्माता को संभावित रूप से बेचने का अनुरोध स्वीकार कर लिया. कुछ लोगों ने टाटा को कारोबार बेचने की सलाह दी थी और फोर्ड के अधिकारी बातचीत करने के लिए बॉम्बे हाउस पहुंचे थे.
टाटा मुख्यालय में हुई बैठक के दौरान अमेरिकी कंपनी ने कारोबार खरीदने में रुचि दिखाई. इसके बाद रतन टाटा के नेतृत्व में टाटा के शीर्ष अधिकारी बैठक के लिए अमेरिका पहुंच गए, जो करीब तीन घंटे तक चली. बैठक में उपस्थित एक व्यक्ति के अनुसार, फोर्ड के अधिकारियों ने डेट्रॉयट की बैठक में आए भारतीयों को ”अपमानित” किया. फोर्ड के अधिकारियों ने अपने मेहमानों से कहा, ” आपको कुछ भी पता नहीं है, आपने यात्री कार खंड क्यों शुरू किया” और भारतीय कंपनी का कारोबार खरीदकर उस पर एहसान करने की बात कही. सौदा टूट गया.
इस शर्मनाक अनुभव ने रतन टाटा को अपने लक्ष्यों पर और अधिक ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रेरित किया. उन्होंने इकाई को न बेचने का फैसला किया. इसके बाद जो हुआ वह असफलता से सफलता की कहानी रचने की एक बेहतरीन मिसाल है. दल ने बैठक के तुरंत बाद भारत लौटने का फैसला किया, जिसे वहां मौजूद व्यक्ति ने ”अपमानजनक” बताया. न्यूयॉर्क लौटते समय 90 मिनट की उड़ान में उदास रतन टाटा कुछ ही शब्द बोले. पूरे समय वह चुप से थे.
समूह के पुराने सदस्य प्रवीण काडले ने कुछ वर्ष पहले एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कहा था, ” यह 1999 की बात है और 2008 में फोर्ड की उसी जेएलआर को हमने खरीद लिया. फोर्ड के चेयरमैन बिल फोर्ड ने टाटा को धन्यवाद देते हुए कहा था कि ‘जेएलआर खरीदकर आप हम पर बड़ा एहसान कर रहे हैं’ .”’ टाटा समूह ने 2008 में फोर्ड से 2.23 अरब अमेरिकी डॉलर के सौदे में सेडान और स्पोर्ट्स यूटिलिटी वाहन बनाने वाले प्रतिष्ठित ब्रांड खरीद लिए थे.
अधिग्रहण के बाद, टाटा समूह ने मोटर वाहन उद्योग में सबसे शानदार बदलावों में से एक की पटकथा लिखी है और ब्रिटिश ब्रांड को कड़ी प्रतिस्पर्धा वाले वैश्विक कार बाजार में मजबूत इकाई के रूप में स्थापित करने में सफल रहा है. टाटा मोटर्स ने भले ही एक लंबा सफर तय किया है और भारत में बाजार हिस्सेदारी हासिल की है, लेकिन अब भी वह जेएलआर से अपने राजस्व का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अर्जित कर रहा है.
इस बीच, जगुआर लैंड रोवर ने रतन टाटा को श्रद्धांजलि देते हुए बृहस्पतिवार को कहा कि उनके प्रेरणादायक नेतृत्व से ब्रिटिश ब्रांड को दुनिया भर में अभूतपूर्व सफलता हासिल करने में मदद मिली. जेएलआर के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) एड्रियन मार्डेल ने बयान में कहा, ” रतन टाटा के निधन से पूरा जेएलआर परिवार बेहद दुखी है. उनकी व्यक्तिगत उपलब्धियां और विरासत समाज में बेमिसाल हैं. उन्होंने हमारे कारोबार और ब्रांड पर जो छाप छोड़ी है, वह किसी भी अन्य व्यक्ति की तुलना में कहीं अधिक है.” उन्होंने कहा कि टाटा समूह के पूर्व चेयरमैन ने ब्रिटिश वाहन विनिर्माता कंपनी के इतिहास में नये अध्याय लिखने की प्रेरणा दी है.
मार्डेल ने कहा, ” यह उनकी विलक्षण दूरदृष्टि ही थी कि टाटा ने 2008 में जेएलआर का अधिग्रहण किया और तब से लेकर अब तक हम जो कुछ भी हैं, वह उनके अटूट समर्थन तथा समर्पण से ही संभव हो पाया.” टाटा समूह के पूर्व चेयरमैन रतन नवल टाटा ने बुधवार रात साढ.े 11 बजे दक्षिण मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में अंतिम सांस ली. वह 86 वर्ष के थे.
टाटा : एक ‘भला आदमी’ जो अखबार हॉकर से भी करते थे बातचीत, जरूरत पड़ने पर की थी उसकी मदद
दुनिया के सबसे प्रभावशाली उद्योगपतियों में शामिल रतन टाटा के निधन ने उन्हें अखबार देने वाले हॉकर हरिकेष सिंह को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि उसके जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी कोविड-19 है या टाटा का इस दुनिया से रूखसत होना.
हरिकेष (39) को बुधवार तक लगता था कि वैश्विक महामारी कोविड-19 उसके जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी थी. दरअसल, संक्रमण की रोकथाम के लिए लागू लॉकडाउन के दौरान उसका अखबार वितरण का कारोबार बुरी तरह से प्रभावित हुआ था और लंबे समय तक अनिश्चितता का माहौल बना हुआ था.
हालांकि, अब कम से कम 14 अखबार लेने वाले अपने पसंदीदा ग्राहक (रतन टाटा) के निधन ने सिंह को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि उसके जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी क्या है – कोविड-19 महामारी या रतन टाटा का निधन.
दो दशक से अधिक समय तक टाटा के घर में अखबार देने वाले सिंह ने कहा, “वह एक बहुत अच्छे इंसान थे. वह गरीबों के मसीहा थे.” सिंह ने वर्ष 2001 में टाटा के घर में अखबार देना शुरू किया था. उस वक्त टाटा कोलाबा की बख्तावर इमारत के एक अपार्टमेंट में रहते थे. बाद में वह इसी इमारत के बगल में एक निजी बंगले ‘हलकाई’ में रहने लगे. सिंह की आंखों के सामने आज भी वह दृश्य घूमता है, जब टाटा सुबह अपने बंगले के गार्डन में बैठकर मुस्कराते चेहरे के साथ उसका दिया अखबार पढ.ते थे.
उसका कहना है कि टाटा हाथ हिलाकर उसका अभिवादन स्वीकार करते और कई बार उसका हालचाल भी पूछते. उसके मुताबिक, संक्षिप्त बातचीत के वे पल उसके जेहन में मौजूद है. सिंह ने बताया कि कुछ साल पहले उसके एक रिश्तेदार के कैंसर से पीड़ित होने की बात सामने आई, जिसके बाद रतन टाटा ने टाटा मेमोरियल अस्पताल को पत्र लिखकर उसका त्वरित उपचार सुनिश्चित करने को कहा और उसे पांच लाख रुपये की आर्थिक मदद भी दी.
सिंह के अनुसार, हालांकि महामारी के दौरान रतन टाटा की अखबार पढ.ने की आदत भी बदल गई. उसने बताया कि टाटा ने उससे अखबार लेना बंद कर दिया और सिर्फ दो समाचार पत्र मंगवाने लगे, जो टाटा समूह द्वारा संचालित ताज महल होटल से कागज के लिफाफे में रखकर आते थे.
बृहस्पतिवार को सिंह ने अखबार बांटने का काम जल्दी निपटा लिया और टाटा को अंतिम विदाई देने के लिए कोलाबा बाइलेन पहुंच गए, जहां हजारों लोग पहले से मौजूद थे. इनमें हुसैन शेख (57) भी अंधेरी से वहां पहुंचा था. हुसैन अक्सर टाटा की पसंदीदा र्मिसडीज बेंज की सफाई करता था. जब उसकी बेटी की शादी हुई, तब टाटा ने घर के एक स्टाफ सदस्य के जरिये उसे 50,000 रुपये भेजवाए.
हुसैन 1993 से पास के प्रेसिडेंट हाउस में काम करता था, जहां उसे टाटा परिवार के सदस्यों के लिए काम करने का भी मौका मिला. वह रतन टाटा से आखिरी बार 15 साल पहले मिला था. हुसैन ने कहा कि भीड़ में शामिल हर शख्स का रतन टाटा के साथ कोई न कोई व्यक्तिगत जुड़ाव रहा है. उसने कहा कि यही वजह है कि कार्य दिवस होने के बावजूद दूर-दूर से हजारों लोग उन्हें अंतिम विदाई देने मुंबई आए हैं.