
नयी दिल्ली/मुंबई: आपातकाल के 21 महीनों के दौरान सरकार ने कला और सिनेमा जगत पर कठोर सेंसरशिप लागू की थी। इस दौरान ऐसी कई फिल्मों को अपनी विषयवस्तु को लेकर सेंसरशिप का सामना करना पड़ा था, जिनका निर्माण पूरा हो गया था या उन्हें बनाया जा रहा था।
यहां उन प्रमुख फिल्मों की सूची दी गई है जिन्हें आपातकाल के दौरान प्रतिबंधित किया गया, जिन पर रोक लगायी गयी या जिन्हें सेंसरशिप का सामना करना पड़ा:
1) आंधी
माना जाता है कि यह फिल्म तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के जीवन से प्रेरित है। गुलजार की 1975 में आयी इस फिल्म को रिलीज होने के कुछ समय बाद ही प्रतिबंधित कर दिया गया था। हालांकि, फिल्म निर्माताओं ने कहा कि यह एक काल्पनिक कहानी है, लेकिन सुचित्रा सेन द्वारा निभाए गए मुख्य किरदार आरती देवी और इंदिरा गांधी के बीच समानताओं को नज़रअंदाज करना मुश्किल था, खासकर उनके बालों में सफ़ेद धारियां। आपातकाल खत्म होने के बाद फिल्म से प्रतिबंध हटा लिया गया था।
2) किस्सा कुर्सी का
फिल्म निर्माता अमृत नाहटा द्वारा उस वक्त के राजनीतिक परिदृश्य पर व्यंग्य करते हुए बनाई गई इस फिल्म के ‘नेगेटिव’ को नष्ट कर दिया गया था और इसके ंिप्रट को तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री वी.सी. शुक्ला ने जब्त कर लिया था, जो इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी के करीबी थे।
फिल्म का मुख्य किरदार गंगाराम संजय गांधी पर आधारित था और इसमें शबाना आज़मी, राज बब्बर, राज किरण और उत्पल दत्त भी थे। नाहटा ने फिल्म को दोबारा बनाया और इसे 1978 में रिलीज किया। हालांकि, फिल्म के इस संस्करण को भी सेंसरशिप का सामना करना पड़ा।
3) आंदोलन
लेख टंडन द्वारा निर्देशित यह फिल्म 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से संबंधित थी। यह एक भारतीय शिक्षक के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपने गृहनगर में ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार के खिलाफ विद्रोह शुरू करता है।
राकेश पांडे और नीतू ंिसह अभिनीत इस फिल्म को आपातकाल के दौरान सेंसरशिप का सामना करना पड़ा।
4) चंदा मरुथा
पी लंकेश के प्रिय नाटक ‘‘क्रांति बंटू क्रांति’’ पर आधारित यह कन्नड़ फिल्म आपातकाल लगने से ठीक पहले बनाई गई थी। इसका निर्देशन पट्टाभि राम रेड्डी ने किया था और इसमें उनकी पत्नी स्रेहलता रेड्डी ने अभिनय किया था। स्रेहलता को जेल में डाल दिया गया था और पैरोल पर रिहा होने के पांच दिन बाद ही उनकी मृत्यु हो गई थी।
5) नसबंदी
आई एस जौहर द्वारा निर्देशित यह फिल्म आपातकाल के दौरान चलाए गए जबरन नसबंदी अभियान पर व्यंग्य थी। इस फिल्म में उस समय के प्रमुख अभिनेताओं अमिताभ बच्चन, शशि कपूर, मनोज कुमार और राजेश खन्ना के ‘डुप्लीकेट’ (हमशक्ल) थे। अपने विवादास्पद विषय के कारण फिल्म पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, लेकिन राजनीतिक माहौल बदलने के बाद 1978 में इसे रिलीज किया गया।
7) क्रांति की तरंगें
आनंद पटवर्धन द्वारा बनाए गए पहले वृत्तचित्र में बिहार में जेपी आंदोलन की शुरूआत और 1975 में आपातकाल लागू होने से पहले यह कैसे एक राष्ट्रीय आंदोलन बन गया था, इस पर बात की गई थी। आनंद ने 1975 में जब यह फिल्म बनाई थी, तब उनकी उम्र सिफऱ् 25 साल थी और उन्होंने उस समय जन आंदोलन और नागरिक अशांति को दिखाया था, जब मुख्यधारा का मीडिया सरकार के बढ़ते दबाव में था। आपातकाल के दौरान चोरी-चुपके व्यापक रूप से इसका प्रसार किया गया था।
“स्क्रीन पर देखें अपनी प्रधानमंत्री को”: आपातकाल के दौरान गुलज़ार की ‘आंधी’ पर प्रतिबंध क्यों लगा
साल 1975 में ‘आंधी’ फिल्म के सिनेमाघरों में प्रर्दिशत होने के बीच इसे प्रस्तुत करने के लिए रूस पहुंचे गीतकार-फिल्मकार गुलजार को खबर मिली कि फिल्म को भारत में प्रतिबंधित कर दिया गया है. चुनावों की पृष्ठभूमि में बनाई गई फिल्म “आंधी” एक प्रेम कहानी है, जिसमें एक होटल प्रबंधक (संजय कुमार) और उनकी अलग रह रही पत्नी (सुचित्रा सेन) के बीच की कहानी दिखाई गई है. वे कई सालों बाद फिर से मिलते हैं जब सेन राजनीतिक नेता बन जाती हैं. लेखिका सबा महमूद बशीर की 2019 में आई “गुलज.ार की आंधी: इनसाइट्स इनटू द फिल्म” किताब फिल्म से जुड़े विवाद और इसकी रिलीज के दौरान देश में राजनीतिक माहौल पर प्रकाश डालती हैं.
कई लोगों ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और सेन के किरदारों में समानताएं देखी थीं, जिनमें सफेद बाल, पहनावा और चलने का तरीका शामिल था, लेकिन आईके गुजराल के नेतृत्व वाले तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को इसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगा और फिल्म फरवरी में सिनेमाघरों में रिलीज हुई. फिर 25 जून 1975 को गांधी ने आपातकाल की घोषणा कर दी. उसी साल जुलाई में गुलज.ार मास्को में एक फिल्म महोत्सव में फिल्म पेश करने गए थे और तब उन्हें फिल्म पर प्रतिबंध का पता चला. उस समय यह फिल्म 20 हफ्तों से ज़्यादा समय से सिनेमाघरों में लगी हुई थी.
बशीर ने किताब में लिखा है, “उन्हें पता चला कि उन्हें शो से बाहर होना पड़ेगा, क्योंकि फिल्म भारत में प्रतिबंधित कर दी गई थी. निश्चित रूप से, यह एक फिल्म पत्रिका थी जिसने ‘आंधी’ पर एक फीचर प्रकाशित किया था, जिसका शीर्षक था, ‘अपने प्रधानमंत्री को स्क्रीन पर देखें’.” पुस्तक में गुलज.ार का साक्षात्कार भी शामिल है, जिसमें उन्होंने बताया कि कैसे प्रतिबंध के बाद वह वापस भारत आ गए.
गुलजार ने याद करते हुए कहा, “संजीव भी मेरे साथ थे. हमारे वापस आने के बाद, जे ओम प्रकाश जी (फिल्म के निर्माता) ने प्रतिबंध हटवाने के लिए बहुत प्रयास किए. हम पहले से ही 24वें सप्ताह में थे, इसलिए हमने दो दृश्यों को संशोधित करने का फैसला किया.” बाद में शामिल किए गए नए दृश्यों में से एक में आरती देवी इंदिरा गांधी के चित्र को देखती हुई उन्हें “आदर्श” कहती हैं.
गुलजार ने कहा, “उन्होंने हमसे वह हिस्सा जोड़ने को कहा. उन्होंने जोर दिया. तब तक फिल्म 23वें या 24वें सप्ताह में चल रही थी.” गुलज.ार ने ज.ोर देकर कहा कि मुख्य किरदार और इंदिरा गांधी के बीच कोई समानता नहीं थी, लेकिन उन्होंने आरती देवी के स्वभाव और हाव-भाव के लिए दिवंगत प्रधानमंत्री से कुछ प्रेरणा जरूर ली थी.
गुलजार ने कहा “उस समय, यह इंदिरा गांधी की जीवन कथा नहीं थी. लेकिन आज भी, उनके जैसा कोई नहीं है, इसलिए उन्हें ध्यान में रखना सबसे अच्छा व्यक्तित्व था. तदनुसार, यह वह संदर्भ था जिसे कोई भी अभिनेता दे सकता था – जिस तरह से वह चलती थीं, जिस तरह से वह सीढि.यों से उतरती थीं, जिस तरह से वह हेलीकॉप्टर से उतरती थीं.” उन्होंने कहा, “हमने उनके गुणों का अच्छे संदर्भ में उपयोग किया – इसलिए नहीं कि किरदार उन पर या उनके जीवन पर आधारित था. लेकिन फिर – विपक्षी दलों ने टिप्पणी की कि आरती देवी के चरित्र को शराब पीते हुए दिखाया गया है, और कुछ ने दो असंबंधित व्यक्तित्वों को जोड़ने का फैसला किया.” गुलज.ार के अनुसार, आग में घी डालने का काम फ.ल्मि के विज्ञापनों और पोस्टरों ने किया.
पुस्तक में बशीर ने लिखा है कि इस बात पर बहस करना बेबुनियाद है कि क्या “आंधी” इंदिरा गांधी के जीवन पर आधारित है, लेकिन वास्तविक और फिल्म के किरदारों के बीच समानताएँ काफ.ी हद तक चौंकाने वाली हैं. उन्होंने लिखा “आरती देवी और श्रीमती गांधी दोनों की शादी टूट चुकी थी. अगर आरती देवी पर एक रैली में पत्थर फेंके गए थे, तो 1967 में उड़ीसा के भुवनेश्वर के पास एक रैली में श्रीमती गांधी पर भी पत्थर फेंके गए थे. विवाह टूटने के इस संयोग और फिरोज गांधी के इलाहाबाद में एक होटल चलाने के तथ्य ने आलोचकों और दर्शकों को यह विश्वास दिलाया कि ‘आंधी’ इंदिरा गांधी की कहानी थी.”
गुलजार ने याद किया कि बाद में वे मास्को गए थे, जहाँ उनकी मुलाकात गुजराल से हुई, जो सोवियत संघ में भारतीय राजदूत के रूप में काम कर रहे थे. उन्होंने कहा “गुजराल साहब ने मुझे बताया कि यह संजय (गांधी) थे जिन्होंने विवाद को अच्छी तरह से नहीं लिया. अन्यथा, दूसरों की ओर से कोई आपत्ति नहीं थी. मुझे अपना जवाब भी याद है, कि यह उन चीजों में से एक है जो लोकतंत्र में होती हैं.”
मेरे पिता की फिल्म ‘किस्सा कुर्सी का’ पर प्रतिबंध लगाते समय हमारे लिए स्थिति नाजुक थी: राकेश
फिल्म निर्माता दिवंगत अमृत नाहटा के बेटे राकेश नाहटा का कहना है कि उनके पिता को ‘किस्सा कुर्सी का’ नाम की राजनीतिक परिदृश्य पर व्यंग्यात्मक फिल्म के लिए उन्हें जान से मारने की तक धमकियां मिली लेकिन इसके बावजूद उन्होंने समझौता करने से इनकार कर दिया था.
‘किस्सा कुर्सी का’ फिल्म आपातकाल के दौरान प्रतिबंधित कर दी गई थी और 1975 की ये कहानी नेता गंगाराम के ईद-गिर्द घूमती है. गंगाराम नेता हैं जो कथित तौर पर अनुचित साधनों का उपयोग करते हुए वोट पाने की कोशिश करते है. फिल्म में गंगाराम की भूमिका मनोहर सिंह ने निभाई जबकि इसमें शबाना आज.मी, राज बब्बर, राज किरण और उत्पल दत्त भी अन्य भूमिकाओं में थे. फिल्म के ‘नेगेटिव’ को नष्ट कर दिया गया था और इसके प्रिंट को तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री वी.सी. शुक्ला ने जब्त कर लिया था, जो इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी के करीबी थे.
राकेश ने कहा, ”जब फिल्म को मंजूरी के लिए सेंसर बोर्ड के पास भेजा गया तो बाधाएं शुरू हो गईं. शुरुआत में 11 सदस्यों ने फिल्म देखी और फिर काफी समय तक कोई जवाब नहीं आया.” यह एक वर्ष का संघर्ष था और इस दौरान सेंसर बोर्ड से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिलने के कारण मेरे पिता काफी निराश थे.
राकेश ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, ”इसके बाद फिल्म को पुनरीक्षण समिति के पास भेजा गया, जिसमें 22 सदस्य थे, हालांकि उन्होंने कुछ नहीं कहा. बाद में यह न्यायाधिकरण के पास चली गई. मेरे पिता ने सोचा कि शायद फिल्म का एक समिति से दूसरी समिति में जाना सेंसर बोर्ड की सामान्य प्रक्रिया है.” उस दौर को सरकार के विरोध में खड़े किसी भी व्यक्ति के लिए कठिन समय बताते हुए राकेश ने कहा कि उनके पिता की फिल्म नष्ट हो गई.
राकेश याद करते हैं, ”जब फ.ल्मि न्यायाधिकरण के पास थी, तब सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के सचिव ने सख़्ती से कहा था, ‘यह फ.ल्मि पास नहीं होगी और इस पर प्रतिबंध लगाया जाएगा क्योंकि यह देश के ख.लिाफ. है.’ उस समय, जो कोई भी देश के ख.लिाफ. काम करता था, उसे या तो जेल में डाल दिया जाता था या उसका काम बर्बाद कर दिया जाता था. यही मेरे पिता के साथ हुआ, उनकी फ.ल्मि बर्बाद कर दी गई.”
राकेश ने कहा, ”उन्होंने मेरे पिता को बहुत प्रताड़ित किया, उन्हें कई बार जान से मारने की धमकियां मिलीं.” आपातकाल के बाद जनता पार्टी में शामिल हुए कांग्रेस के नेता अमृत नाहटा ने इस फिल्म का पुर्निनर्माण किया और 1978 में इसे रिलीज किया, लेकिन इसकी पटकथा वही रही और अधिकतर कलाकार भी बरकरार रहे. राकेश अब ‘किस्सा कुर्सी का- 3’ फिल्म बनाने पर काम कर रहे हैं, जो इस बात पर प्रकाश डालेगी कि मूल फिल्म को कैसे प्रतिबंधित और नष्ट किया गया था.



