शिवसेना UBT में दरार: उद्धव ठाकरे से बगावत, संसदीय दल की बैठक से सांसद नदारद; सात दिनों में मांगा गया जवाब

मुंबई: शिवसेना (यूबीटी) के सांसदों के पाला बदलने की अफवाहों के बीच सांसद राजाभाऊ वाजे ने अपनी स्थिति साफ कर दी है। उन्होंने मीडिया से कहा कि वह उद्धव ठाकरे के साथ हैं और हमेशा रहेंगे। यह बयान उन चर्चाओं के बाद आया है जिनमें दावा किया जा रहा था कि यूबीटी के कुछ सांसद एकनाथ शिंदे गुट में शामिल हो सकते हैं।

मामले में संजय राउत ने गंभीर आरोप लगाया है कि उनके सांसदों को पाला बदलने के लिए 15-15 करोड़ रुपये का ऑफर दिया जा रहा है। महाराष्ट्र में ‘ऑपरेशन टाइगर’ की चर्चा है, जिसके तहत दावा किया जा रहा है कि यूबीटी के नौ में से सात सांसद शिंदे गुट के संपर्क में हैं। हालांकि, सांसद अरविंद सावंत ने इन खबरों को खारिज करते हुए कहा कि सभी सांसद उद्धव ठाकरे की बैठक में मौजूद थे।

दूसरी ओर, भाजपा नेता चंद्रशेखर बावनकुले ने इन आरोपों को गलत बताया है। उन्होंने कहा कि भाजपा का इससे कोई लेना-देना नहीं है। बावनकुले के अनुसार, उद्धव ठाकरे को खुद सोचना चाहिए कि उनके लोग उन्हें छोड़कर क्यों जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि सांसदों पर पैसे के लिए दल बदलने का आरोप लगाना ठीक नहीं है।

‘यह रणनीति नहीं, विश्वासघात है’: बागी सांसदों पर भड़के संजय राउत
बैठक में तीन लोकसभा सांसद- अरविंद सावंत, राजभाऊ वाजे और अनिल देसाई शामिल हुए। संजय राउत खुद राज्यसभा सदस्य के तौर पर इस बैठक में मौजूद थे। राउत ने साफ तौर पर कहा कि जो सांसद इस बैठक में नहीं आए, उन्होंने पार्टी व्हिप का उल्लंघन किया है। पार्टी ने अब इन सांसदों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी है। उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी करके जवाब मांगा जाएगा। उन्होंने कहा पार्टी उनकी सदस्यता रद्द करने पर भी विचार करेंगी।

संजय राउत ने बागी रुख अपनाने वाले सांसदों पर निशाना साधते हुए कहा कि कल जब वे स्पीकर से मिले थे, तो उसकी तस्वीर सार्वजनिक हुई थी। उन्होंने चुनौती दी कि अगर अन्य 6 सांसद भी स्पीकर से मिले हैं, तो उनकी तस्वीर दिखाई जाए। राउत ने इसे रणनीति नहीं विश्वासघात करार दिया। उन्होंने आगे कहा कि ये सांसद अभी भी पार्टी के सदस्य हैं और पार्टी के चुनाव चिन्ह पर ही चुनाव जीते हैं। अगर वे पार्टी व्हिप का उल्लंघन करते हैं, तो उन्हें कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा। राउत ने भाजपा पर भी हमला बोला। उन्होंने कहा कि भाजपा ने देश और खासकर महाराष्ट्र की राजनीति को गंदा कर दिया है, जिसकी कीमत उन्हें चुकानी पड़ेगी।

महाराष्ट्र में ऑपरेशन टाइगर पर क्या बोले राज्य के नेता?
महाराष्ट्र में राजनीतिक पाला बदलने की इस कवायद को ऑपरेशन टाइगर भी कहा जा रहा है। राज्य के नेता इस मामले में अपनी-अपनी राय भी जाहिर कर रहे हैं। धुले में शिवसेना के विधान परिषद सदस्य (एमएलसी) चंद्रकांत रघुवंशी ने कहा, ‘महाराष्ट्र में ‘ऑपरेशन टाइगर’ हो चुका है। आज छह सांसदों ने एकनाथ शिंदे पर भरोसा जताया है और शिवसेना में शामिल हो गए हैं… यह अच्छी बात है कि वे हमारे साथ जुड़ गए हैं। मैं उनका स्वागत करता हूं।’

उद्धव को असली झटका जून 2022 में कैसे?
शिवसेना के स्थापना काल के बाद पार्टी में पहली बार 1991 में छगन भुजबल ने 17 विधायकों के साथ पार्टी छोड़ी थी। भुजबल ने बालासाहेब ठाकरे की कार्यशैली और पार्टी में अपनी उपेक्षा का आरोप लगाते हुए बगावत की थी। तब भुजबल ने कांग्रेस का दामन थामा था जो शिवसेना के इतिहास का पहला बड़ा राजनीतिक विद्रोह था। लेकिन, 2003 में उद्धव ठाकरे के शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष बनने के बाद पार्टी चार बार टूटी। 2005 में पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे ने उद्धव को पार्टी का उत्तराधिकारी बनाने का विरोध किया और पार्टी छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए थे।

दूसरा विद्रोह 2006 में हुआ था जब चचेरे भाई राज ठाकरे ने अलग होकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) की स्थापना की थी। असली झटका जून 2022 में लगा, जब एकनाथ शिंदे ने 40 विधायकों के साथ बगावत की थी। इस विद्रोह से उद्धव का सीएम पद, पार्टी का नाम और चुनाव निशान भी छिन गया। इस टूट के बाद ही उद्धव की शिवसेना (यूबीटी) लोकसभा चुनाव में 9 और विधानसभा चुनाव में 20 सीटों तक ही सिमट कर रह गई।

बीएमसी में भी टूटा वर्चस्व
बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) पर 30 साल का वर्चस्व भी इस साल जनवरी में हुए चुनाव में टूट गया। अभी एकनाथ शिंदे की बगावत के 4 साल भी पूरे नहीं हुए कि शिवसेना (यूबीटी) के 9 में से 6 सांसद उद्धव से अलग होग नया गुट बना लिया है।

बाल ठाकरे के समय एक बार, उद्धव के कार्यकाल में चार बार टूट चुकी शिवसेना
महाराष्ट्र की राजनीति में खुद को बाघ के रूप में पेश करने वाली शिवसेना में टूट का इतिहास बनता जा रहा है। 1966 में शिवसेना के संस्थापक प्रमुख बालासाहेब ठाकरे ने संगठन को मजबूत जनाधार दिया, लेकिन पार्टी में कई बार बड़े विभाजन भी हुए। बाल ठाकरे के समय में जहां शिवसेना में एक बड़ी टूट दर्ज हुई, वहीं उद्धव के नेतृत्व में पार्टी को कई बड़े झटके झेलने पड़े। ताजा मामला शिवसेना (यूबीटी) के 6 सांसदों का विद्रोह है जिससे ठाकरे ब्रांड की साख को एक बार फिर बट्टा लगा हैं।

सांसदों की बगावत पर भड़के संजय राउत ने उनके लिए आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया और गाली-गलौज की। उन्होंने मीडिया से यहां तक कहा कि मेरे बयान को काटना मत, ऐसे ही चलाना। पर उनकी भाषा पर विवाद बढ़ा तो राउत ने बचाव करते हुए कहा, यह कोई गाली-गलौज नहीं है। मराठी व महाराष्ट्र में ऐसी ही भाषा बोली जाती है। यह हमारी आम भाषा है। सामने वाले को जो भाषा समझ आए, उसमें बात करनी चाहिए। मुझे अच्छी तरह पता है कि कब और किस भाषा का इस्तेमाल करना है।

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