डा. संजय पांडेय
सुकमा. छत्तीसगढ़ के गांवों में पंचायत भवन अब सिर्फ सरकारी बैठकों और कागजी कामकाज की जगह नहीं रह गए हैं। सरकार की पंचायत कैफे योजना के जरिए इन्हीं पंचायतों में महिलाओं के लिए रोजगार और आत्मनिर्भरता का नया रास्ता तैयार किया जा रहा है। योजना के तहत 10-12 महिलाओं का समूह बनाकर उन्हें कैफे संचालन से जोड़ा जाता है। इससे महिलाएं अपने गांव में रहकर नियमित आमदनी हासिल कर रही हैं।
योजना के तहत महिलाओं के समूह को करीब 6 लाख रुपये का ऋण उपलब्ध कराया जाता है। ग्राम पंचायत की ओर से कैफे के लिए भवन तैयार कर उपलब्ध कराया जाता है। खास बात यह है कि योजना में सरकार की ओर से दिया गया योगदान महिलाओं से वापस नहीं लिया जाता। इससे समूह पर शुरुआती आर्थिक बोझ कम रहता है और महिलाएं कारोबार को धीरे-धीरे आगे बढ़ा सकती हैं।
एक पंचायत कैफे से आमतौर पर 10-12 महिलाएं जुड़ती हैं। कैफे के संचालन, भोजन और अन्य सेवाओं से होने वाली आय समूह की महिलाओं के लिए रोजगार का जरिया बनती है। योजना से जुड़ी महिलाओं की आमदनी अलग-अलग हो सकती है, लेकिन कई महिलाओं को हर महीने करीब 25-30 हजार रुपये तक की आय हो रही है। इस मॉडल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि महिलाओं को रोजगार के लिए गांव से बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ती। वे अपने ही क्षेत्र में रहकर काम करती हैं और परिवार की आय में सीधे योगदान देती हैं।
सिर्फ कैफे नहीं, आत्मनिर्भरता का मॉडल
पंचायत कैफे को साय सरकार केवल भोजन या चाय-नाश्ते की दुकान के रूप में नहीं देख रही है। इसका उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं को सामूहिक रूप से कारोबार से जोड़ना और उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाना है। समूह के रूप में काम करने से महिलाएं जिम्मेदारियां बांटती हैं, संचालन सीखती हैं और कमाई का अनुभव हासिल करती हैं। ग्रामीण इलाकों में जहां महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर सीमित होते हैं, वहां पंचायत कैफे उनके लिए स्थानीय स्तर पर आय का नया माध्यम बन रहा है।
पूरे राज्य में विस्तार की तैयारी
इस पहल को सफल मॉडल के रूप में देखते हुए मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सरकार इसे पूरे छत्तीसगढ़ में विस्तार देने की दिशा में काम कर रही है। लक्ष्य है कि अधिक से अधिक ग्राम पंचायतों में महिलाओं के समूहों को इस तरह के रोजगार से जोड़ा जाए, ताकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी बढ़े और उन्हें अपने पैरों पर खड़े होने का अवसर मिले।पंचायत कैफे की पहल इस मायने में भी महत्वपूर्ण है कि इसमें सरकारी सहायता, पंचायत का बुनियादी ढांचा और महिलाओं की मेहनत तीनों को एक साथ जोड़ा गया है। अगर यह मॉडल बड़े स्तर पर सफल होता है, तो गांवों में महिलाओं के लिए स्थायी स्थानीय रोजगार का एक मजबूत नेटवर्क तैयार हो सकता है।
20 रुपये की चाय से 150 रुपये तक थाली
पंचायत कैफे में गांव के लोगों को 20 रुपये में कुल्हड़ और अदरक की चाय से लेकर 150 रुपये की स्पेशल थाली तक उपलब्ध है। मेन्यू में पोहा, समोसा, इडली-सांभर, पराठा, भजिया, पूरी-सब्जी जैसे नाश्ते के साथ मैगी, नूडल्स, सैंडविच और मंचूरियन जैसे फास्ट फूड भी शामिल हैं। भोजन में सादी थाली 100 रुपये और स्पेशल थाली 150 रुपये में मिल रही है।कैफे में हॉट कॉफी 40 रुपये, ब्लैक कॉफी 30 रुपये, पोहा और समोसा 20 रुपये, इडली-सांभर 30 रुपये तथा आलू-गोभी पराठा 50 रुपये में उपलब्ध है। वहीं वेज नूडल्स 80 रुपये, वेज मंचूरियन 100 रुपये और पनीर सैंडविच 100 रुपये में मिल रहा है।
चाय बेचने से आगे, कारोबार चलाने की सीख
योजना की खासियत यह है कि महिलाओं को केवल आर्थिक सहायता देकर छोड़ने के बजाय उन्हें सामूहिक रूप से कारोबार चलाने का अवसर मिलता है। खरीदारी, खाना तैयार करना, ग्राहकों से व्यवहार, बिक्री, हिसाब- किताब और रोजाना की आय-व्यय का प्रबंधन इन सबकी जिम्मेदारी समूह की महिलाएं संभालती हैं। इससे वे घरेलू कामकाज से बाहर निकलकर कारोबार के फैसले लेने और अपनी आमदनी बढ़ाने का अनुभव हासिल कर रही हैं।
पंचायत कैफे का यह मॉडल गांव में एक साथ दो जरूरतें पूरी करता है। एक तरफ महिलाओं के लिए स्थानीय स्तर पर रोजगार और स्वरोजगार का रास्ता खुलता है, वहीं दूसरी ओर पंचायत भवन आने वाले ग्रामीणों और कर्मचारियों को किफायती दर पर चाय, नाश्ता और भोजन उपलब्ध होता है।
यानी 20 रुपये की चाय से शुरू होने वाला यह कारोबार महिलाओं के लिए सिर्फ कैफे चलाने की कहानी नहीं, बल्कि अपने पैरों पर खड़े होने और गांव में अपना व्यवसाय खड़ा करने की नई शुरुआत है।
देखिए पंचायत कैफे का वीडियो :