नेपाल में 2015 के विनाशकारी भूकंप से बेघर हुए लोगों को जिस गांव में नयी जिंदगी शुरू करने के लिए बसाया गया था, वह करीब 11 साल बाद आई भीषण बाढ़ में पूरी तरह तबाह हो गया। इस त्रासदी ने आपदा पीड़ितों को असुरक्षित स्थानों पर बसाने के खतरों को एक बार फिर उजागर कर दिया है।खाल्टे गांव में रहने वाले छेकू लामा ने बताया कि जब बाढ़ आई तो उन्होंने लोगों को जान बचाकर भागने के लिए आगाह किया और खुद ऊंचाई वाले स्थान की ओर दौड़ पड़े। कुछ लोग उनके पीछे भी भागे, लेकिन उनमें से अधिकतर लोग जीवित नहीं बच सके।
लामा ने बताया कि नेपाल के रसुवा जिले में स्थित खाल्टे गांव को 2015 के भूकंप में आसपास के गांव तबाह होने के बाद अस्थायी बस्ती के रूप में बसाया गया था लेकिन एक संकरी घाटी में त्रिशूली नदी के किनारे बसे इस गांव के घर बाढ़ से सुरक्षित नहीं थे। 26 अगस्त को जब बाढ़ का पानी अचानक गांव में घुसा तो लोगों के पास जान बचाकर निकलने के बहुत कम रास्ते थे। स्थानीय निवासियों के अनुसार, कम से कम 375 लोग लापता बताए गए हैं। पूरा गांव बाढ़ में तबाह हो गया।
नेपाल अब भी उस विनाशकारी बाढ़ से उबरने की कोशिश कर रहा है, जिसमें चीन की सीमा से लगे पहाड़ी इलाके में 1,400 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी और हजारों लोग लापता हो गए थे। पिछले सप्ताह उत्तर-मध्य नेपाल में अचानक आई एक और बाढ़ में कम से कम पांच लोग लापता हो गए। पिछले एक दशक में नेपाल में भूकंप, भूस्खलन और बाढ़ के कारण हजारों लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े लेकिन जिन अस्थायी बस्तियों में उन्हें बसाया गया, उनमें से कई आपदाओं की दृष्टि से असुरक्षित इलाकों में थीं। खाल्टे की तबाही ने इस प्रकार के पुनर्वास के खतरों को उजागर कर दिया है।
बाढ़ से बचे लोगों का कहना है कि सरकार को केवल आपात राहत और अस्थायी आश्रय देने तक सीमित नहीं रहना चाहिए बल्कि विस्थापितों को ऐसी सुरक्षित और स्थायी जगह उपलब्ध करानी चाहिए, जहां वे दोबारा अपना जीवन शुरू कर सकें। नेपाल में 2015 में आए भूकंप में लगभग 9,000 लोगों की मौत हो गई थी। इस भूकंप में कई ऐसे गांव तबाह हो गए थे, जहां परिवार पीढि़यों से रह रहे थे। सरकार की पुनर्वास योजना के तहत खतरे वाले इलाकों में रह रहे लगभग 257 परिवारों को खाल्टे में बसाया गया था। हालांकि, बाद में भूवैज्ञानिक आकलन में भूस्खलन और हिमस्खलन के खतरे को देखते हुए इस क्षेत्र को ‘रेड जोन’ यानी अत्यधिक जोखिम वाले क्षेत्र में रखा गया।
खाल्टे के निवासी बाम बहादुर तमांग अब एक सरकारी राहत केंद्र में रह रहे हैं। उन्होंने बताया कि उन्होंने और कई अन्य लोगों ने खाल्टे में बसाए जाने के फैसले का विरोध किया था, लेकिन आखिरकार उन्हें वहां जाने के लिए मजबूर होना पड़ा। तमांग ने कहा, ”सरकार अब हमें जहां भी बसाए, उसे पहले यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वह जगह सुरक्षित हो। हम कोई मवेशी नहीं हैं, जिन्हें एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जाए।”
तमांग की ंिचता बताती है कि विस्थापितों के पुनर्वास की चुनौती केवल सुरक्षित जमीन तलाशने तक सीमित नहीं है। किसी अस्थायी बस्ती को रहने लायक स्थायी स्थान बनाने के लिए वहां स्कूल, स्वास्थ्य सेवाएं, सड़कें और आजीविका के साधन भी उपलब्ध होने चाहिए। नेपाल सरकार का कहना है कि वह बाढ़ पीड़ितों के लिए एक नया शहर बसाने की योजना बना रही है, जहां उद्योग, अस्पताल और स्कूल होंगे।
सरकार ने यह भी कहा है कि विस्थापितों को बाढ़ में तबाह हुई बस्तियों में वापस नहीं भेजा जाएगा। सरकार पुर्निनर्माण कार्यों में निजी निर्माण कंपनियों को शामिल करने पर भी विचार कर रही है। इसके तहत एक ऐसी व्यवस्था अपनाई जा सकती है, जिसमें कंपनियां भूमालिकों के सहयोग से घर बनाएंगी। नेपाल ने बाढ़ के खतरे को कम करने के लिए पहले भी कई कदम उठाए हैं। इनमें नदियों के जलस्तर की निगरानी, समय रहते चेतावनी देने वाली प्रणालियां विकसित करना और स्थानीय समुदायों को आपदाओं से निपटने के लिए तैयार करना शामिल है।
इसके बावजूद दूरदराज की पहाड़ी घाटियों में भूस्खलन और हिमनद झीलों के अचानक फटने से आने वाली बाढ़ का खतरा बना हुआ है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि बढ़ते तापमान और पहाड़ी क्षेत्रों की अस्थिरता के कारण नेपाल के लिए निगरानी व्यवस्था को बेहतर बनाना और समय रहते चेतावनी देने वाली प्रणालियों को मजबूत करना पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है।