सिडनी. विदेश मंत्री एस जयशंकर ने मंगलवार को यहां कहा कि भारत के लिए चीन के साथ संबंधों में ढाई साल ‘‘बहुत कठिन’’ रहे, जिसमें 40 साल बाद सीमा पर हुआ पहला रक्तपात भी शामिल है. उन्होंने जोर देकर कहा कि उन्होंने बींिजग के साथ संवाद माध्यम को खुला रखा क्योंकि पड़ोसियों को एक-दूसरे से बात करनी पड़ती है.
जयशंकर ने आॅस्ट्रेलिया के साथ भारत के संबंधों के बढ़ते महत्व और सुरक्षा-केंद्रित क्वाड के सदस्यों के रूप में दोनों देशों के हितों पर लोवी इंस्टिट्यूट में अपने संबोधन के बाद सवालों के जवाब में यह टिप्पणी की. विदेश मंत्री ने एक सवाल के जवाब में कहा, “चीन के साथ संबंधों में हमारे लिए ढाई साल बहुत कठिन थे, जिसमें 40 साल बाद सीमा पर हुआ पहला रक्तपात शामिल है और जहां हमने वास्तव में 20 सैनिकों को खो दिया.”
वर्ष 2009 से 2013 तक चीन में भारत के राजदूत रहे मंत्री ने कहा, ‘‘लेकिन हमारा प्रयास, मेरा प्रयास संवाद माध्यम को चालू रखने का रहा है. वास्तव में, उसके बाद की सुबह, मैंने अपने समकक्ष वांग यी को फोन किया और उनसे यह सुनिश्चित करने का आग्रह किया कि चीनी पक्ष की ओर से कोई तनाव भड़काने वाला या जटिलता पैदा करने वाला काम नहीं किया जाए.’’ उन्होंने कहा, ‘‘कूटनीति संचार के बारे में है. यह सिर्फ चीन के साथ संबंधों में नहीं है, यहां तक कि (अन्य देशों) के संबंध में भी … यदि राजनयिक एक-दूसरे के साथ संवाद नहीं करेंगे, तो वे किस तरह की कूटनीति करेंगे?” उन्होंने कहा कि आखिर में देशों को एक-दूसरे के साथ बात करनी पड़ती है.
भारत लगातार यह कहता रहा है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर शांति और स्थिरता द्विपक्षीय संबंधों के समग्र विकास के लिए महत्वपूर्ण है. गतिरोध को हल करने के लिए भारत और चीन की सेनाओं ने कोर कमांडर स्तर की 16 दौर की बातचीत की है.
पैंगोंग झील क्षेत्रों में हिंसक झड़प के बाद पांच मई, 2020 को पूर्वी लद्दाख में सीमा गतिरोध शुरू हुआ था. दोनों देशों ने 12 सितंबर को पूर्वी लद्दाख में गोगरा-हॉटस्प्रिंग्स क्षेत्र में पेट्रोंिलग प्वाइंट-15 से अग्रिम पंक्ति के अपने सैनिकों को पीछे हटा लिया था और वहां बनाए गए अस्थायी बुनियादी ढांचे को नष्ट कर दिया था.
बुनियादी ढांचे को निशाना बनाना और आम नागरिकों की जान लेना कहीं भी स्वीकार्य नहीं: जयशंकर
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने मंगलवार को कहा कि बुनियादी ढांचे को निशाना बनाना और आम नागरिकों की जान लेना दुनिया के किसी भी हिस्से में स्वीकार्य नहीं है. उन्होंने रूस- यूक्रेन संघर्ष में दोनों पक्षों के कूटनीति तथा वार्ता के रास्ते पर लौटने की जरूरत पर जोर दिया और कहा कि “यह संघर्ष किसी की भी मदद नहीं कर रहा है.” जयशंकर ने आॅस्ट्रेलिया के साथ भारत के संबंधों के बढ़ते महत्व और सुरक्षा-केंद्रित क्वाड के सदस्यों के रूप में दोनों देशों के हितों पर लोवी इंस्टिट्यूट में अपने संबोधन के बाद सवालों के जवाब में यह टिप्पणी की.
उन्होंने सोमवार को रूस द्वारा यूक्रेन की राजधानी कीव समेत प्रमुख यूक्रेनी शहरों को निशाना बनाकर किए गए मिसाइल हमलों पर एक सवाल के जवाब में कहा, “हमारा वास्तव में मानना है कि बुनियादी ढांचे को निशाना बनाना और आम नागरिकों की जान लेना दुनिया के किसी भी हिस्से में स्वीकार्य नहीं है.” यूक्रेन पर सोमवार को हुए हमलों को 24 फरवरी को शुरू हुए संघर्ष के बाद से रूस का सबसे भीषण हमला माना जा रहा है.
जयशंकर ने संघर्ष को हल करने के लिए कूटनीति और बातचीत के रास्ते पर लौटने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा, “यह संघर्ष किसी की मदद नहीं कर रहा है.” उन्होंने कहा कि यह संघर्ष आज दुनिया के एक बड़े हिस्से को नुकसान पहुंचा रहा है क्योंकि लोगों का दैनिक जीवन बहुत ही हानिकारक तरीके से प्रभावित हो रहा है. जयशंकर ने कहा, “और जिन देशों के साथ हम अपनी पहचान करते हैं, उनमें से अधिकतर देश वास्तव में निराश महसूस कर रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि उनकी समस्याओं की उपेक्षा की जा रही है.”
उनकी टिप्पणी ऐसे समय आई जब भारत ने यूक्रेन के चार क्षेत्रों पर मॉस्को के “अवैध” कब्जे की ंिनदा करने के लिए एक मसौदा प्रस्ताव पर एक दिन पहले संयुक्त राष्ट्र महासभा में गुप्त मतदान की रूस की मांग को अस्वीकार करने के लिए मतदान किया. भारत ने 100 से अधिक अन्य देशों के साथ सार्वजनिक मतदान के समर्थन में वोट दिया.
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने सोमवार को कहा था कि शत्रुता को बढ़ाना किसी के हित में नहीं है और भारत तनाव को कम करने वाले सभी प्रयासों का समर्थन करने के लिए तैयार है. भारत ने अभी तक यूक्रेन पर रूस के आक्रमण की ंिनदा नहीं की है और कहा है कि संकट को कूटनीति एवं बातचीत के माध्यम से हल किया जाना चाहिए. भारत संयुक्त राष्ट्र महासभा और सुरक्षा परिषद में यूक्रेन संघर्ष पर मतदान से अनुपस्थित रहा है.