दुश्मन की गोली पीठ पे नहीं, छाती पे खानी है : करगिल के शहीद के अपनी मां को अंतिम शब्द

द्रास. करगिल में 1999 में युद्ध छिड़ने पर अपने सैनिक बेटे के भविष्य को लेकर चिंतित मां कांता देवी ने बार-बार ग्रेनेडियर उदयमान सिंह से घर लौट आने के लिए कहा लेकिन बेटा घर नहीं लौटा और एक दिन उसने अपनी मां से कहा, ‘दुश्मन की गोली पीठ ने नहीं, छाती पे खानी है.’ अपने शहीद बेटे को याद करते हुए रो पड़ीं कांता देवी ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ”उसके बाद मैं कुछ नहीं कह पायी और वह हमारी अंतिम बातचीत थी.” जम्मू के रहने वाले उदयमान सिंह को 18 साल की उम्र में 18 ग्रेनेडियर्स में कमीशन मिला था. करगिल युद्ध के दौरान 18 ग्रेनेडियर्स को दो अन्य बटालियन के साथ मिलकर टाइगर हिल पर कब्जा करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी.

अपने मिशन पर जब बटालियन हमला करने के लिए आगे बढ.ी तो पहाड़ी पर पहुंचते ही उसे दुश्मन की भीषण गोलीबारी का सामना करना पड़ा. सिंह की इसी भीषण लड़ाई में मौत हो गई और उन्हें युद्ध के दौरान अदम्य साहस का प्रदर्शन करने के लिए ‘सेना मेडल’ से सम्मानित किया गया.

24वें करगिल विजय दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए लामोचन व्यू प्वाइंट पहुंचीं कांता देवी ने बताया कि उन्होंने अभी भी अपने बेटे के गोलियों से छलनी बटुए को संभाल कर रखा हैं बेटे के जाने के दुख में जार-जार रोतीं कांता देवी आगे कहती हैं, ”उसपर (बटुए) खून का निशान है और कुछ मुड़े-तुड़े से नोट रखे हैं. मैं चाहती हूं कि उस बटुए को मेरी चिता पर मेरे साथ जलाया जाए. एक मां के लिए अपने बेटे की मौत से बड़ा दुख नहीं होता है. उसे मेरी चिता को अग्नि देना था, लेकिन वह मुझसे पहले ही चला गया.” उन्होंने कहा, ”लेकिन, उसके शब्द और देश के प्रति उसका समर्पण मुझे गौरवान्वित कर देते हैं.” अपने सालभर लंबे सैनिक के करियर में जब भी सिंह घर आते थे, उनके परिवार वाले पड़ोसियों में मिठाइयां बांटा करते थे.

कांता देवी ने बताया, ”पता नहीं क्यों, लेकिन मुझे हमेशा लगता था कि उसकी घर वापसी पर उत्सव मनाना चाहिए. मां के दिल को सब पता होता है. जब अंतिम बार वह गया तो मुझे पता था कि वह अब नहीं लौटेगा.” लद्दाख की ऊंची पहाड़ियों पर घुसपैठ करके गुपचुप तरीके से घुस आयी पाकिस्तानी सेना को वापस भगाने के लिए 1999 में भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन विजय’ के नाम से भीषण जवाबी कार्रवाई की थी.

करगिल के युद्ध में भारतीय सैनिकों ने कठिन मौसमी परिस्थितियों, चुनौतीपूर्ण भौगोलिक क्षेत्र में बेहद मुश्किल लड़ाई लड़ी और द्रास, करगिल तथा बटालिक सेक्टर से दुश्मन को खदेड़ दिया था. पाकिस्तान पर भारत की जीत की खुशी में हर साल 26 जुलाई को करगिल विजय दिवस मनाया जाता है.

कैप्टन विक्रम बत्रा का युद्ध उद्घोष ‘ये दिल मांगे मोर’ आज भी करगिल की चोटियों से गूंजता है: भाई
करीब 24 वर्ष पहले हुए करगिल युद्ध में कैप्टन विक्रम बत्रा ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए दुश्मनों से लोहा लिया और इस दौरान वह वीरगति को प्राप्त हो गए. बत्रा के भाई विशाल का कहना है कि कैप्टन विक्रम का युद्ध उद्घोष ‘ये दिल मांगे मोर’ आज भी करगिल की चोटियों से गूंजता है.

विशाल बत्रा 24वें करगिल विजय दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए यहां आए थे. उनके लिए यहां आना किसी तीर्थस्थल पर आने के बराबर है. विशाल ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ”जब भी मैं यहां हमारे युवा अधिकारियों तथा सैनिकों के पराक्रम को देखने आता हूं तो मेरे अंदर गर्व का भाव आता है, साथ ही पुरानी यादें भी ताजा हो जाती हैं. आज भी बिलकुल वैसा ही महसूस होता है जैसा उस वक्त होता था. हम अब भी उसे (कैप्टन विक्रम) ‘ये दिल मांगे मोर’ कहते सुन सकते हैं. उन्होंने कहा कि उन्हें देश में लोगों से जो प्यार मिलता है, उससे वह अभिभूत हैं.

विशाल बत्रा ने कहा, ”लेकिन व्यक्तिगत तौर पर यह बेहद मुश्किल यात्रा रही है…इतने वर्ष बीतने के बाद भी मेरे परिवार को शांति नहीं मिली है.” कैप्टन विक्रम बत्रा 24 साल की उम्र में 1999 में करगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तानी सेना से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए थे. उन्हें युद्धकाल का सर्वोच्च वीरता पुरस्कार ‘परमवीर चक्र’ मरणोपरांत दिया गया था. उनके अदम्य साहस के कारण उन्हें प्यार से ‘द्रास का टाइगर’, ‘करगिल का शेर’ और ‘करगिल का हीरो’ आदि कहा जाता है.

विशाल बैंक में काम करते हैं और उन्होंने कैप्टन के युद्ध उद्घोष ‘ये दिल मांगे मोर’ का टैटू अपने हाथ पर बनवा रखा है. उन्होंने कहा कि युद्ध स्मारक आना किसी तीर्थस्थल पर आने जैसा है. उन्होंने कहा, ”जिस तरह का प्यार मुझे अधिकारियों से तथा शहीदों के परिवारों से मिलता है, वह मुझे अलग तरह के भाव से भर देता है. मैं उसे यहां महसूस कर सकता हूं, वह अब भी है…..” कियारा आडवाणी और सिद्धार्थ मल्होत्रा की 2021 में आई फिल्म ‘शेरशाह’ कैप्टन विक्रम बत्रा की कहानी पर आधारित है. भारतीय सेना ने 1999 में लद्दाख की अहम चोटियों पर कब्जा करने वाली पाकिस्तानी सेना को खदेड़ने के लिए भीषण जवाबी हमला किया था. करगिल विजय दिवस भारत की पाकिस्तान पर जीत की याद में मनाया जाता है.

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