राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार पाने वालों की रहीं अनूठी उपलब्धियां

Author: Yogesh Kumar Sahu
UPDATED: Tue, 05 Sep 2023 08:10 PM
राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार पाने वालों की रहीं अनूठी उपलब्धियां
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नयी दिल्ली/पाठशाला. पुस्तकालय स्वचालन से लेकर विज्ञान संग्रहालय की स्थापना तक, 11 वर्षों तक सभी कार्यदिवस पर उपस्थित रहने से लेकर स्कूल परिसर और शौचालयों की स्वयं सफाई करना – ये कुछ उपलब्धियां हैं जो राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार पाने वाले 75 विजेताओं के नाम हैं.

पुरस्कार पाने वालों में 50 स्कूल शिक्षक, उच्च शिक्षण संस्थानों के 13 शिक्षक और कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय के 12 शिक्षक शामिल हैं. केरल के पलक्कड़ में केंद्रीय विद्यालय के शिक्षक मुजीब रहमान ने 2007 में एक सॉफ्टवेयर विकसित किया, जो भारत में कई स्कूल पुस्तकालयों तक मुफ्त पहुंच प्रदान करता है.

रहमान को प्रदान किए गए प्रशस्ति पत्र में लिखा है, ”उन्होंने ऑनलाइन सेवाओं तक आसान पहुंच उपलब्ध कराने के लिए लाइब्रेरी वेबसाइट और एक मोबाइल ऐप डिजाइन किया है. एक आईटी विशेषज्ञ के रूप में, उन्होंने 600 पुस्तकालय अध्यक्ष को सफलतापूर्वक प्रशिक्षित किया है.” राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए चयनित अरुणाचल प्रदेश के रामकृष्ण मिशन स्कूल के नेताई चंद्र डे पिछले 11 वर्षों से सभी कार्य दिवसों पर स्कूल में उपस्थित रहे हैं.

नेताई को प्रदान किए गए प्रशस्ति पत्र में लिखा है, ”डे ने स्कूल में एक विज्ञान संग्रहालय और एक विज्ञान प्रयोगशाला स्थापित करने के लिए जबरदस्त प्रयास किए हैं. वह पिछले 11 वर्षों से सभी कार्य दिवसों पर स्कूल में उपस्थित रहे हैं. वह औपचारिक शिक्षा प्रदान करने के अलावा छात्रों के चरित्र निर्माण की दिशा में कड़ी मेहनत कर रहे हैं.” मणिपुर के चिंगमेई उच्चतर प्राथमिक विद्यालय के निंगथौजम बिनॉय सिंह स्कूल परिसर और शौचालयों की खुद नियमित तौर पर सफाई करते हैं.

सिंह को प्रदान किए गए प्रशस्ति पत्र में कहा गया है, ”सिंह ने अपने स्कूल का जीर्णोद्धार किया, जो उनके शामिल होने के समय खराब स्थिति में था. उन्होंने बुनियादी ढांचे को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसके लिए उन्होंने कुछ कार्यों के वास्ते स्वयं के पैसे भी खर्च किए. उन्होंने स्कूल छोड़ने वाले बच्चों के माता-पिता को उन्हें स्कूल भेजने के लिए प्रेरित किया.” कश्मीर के अनंतनाग में सरकारी माध्यमिक विद्यालय के रियाज अहमद शेख ने एक नामांकन अभियान की पहल की, जिसमें घर-घर जाकर लोगों को बच्चों को स्कूल भेजने के लिए समझाया गया, जिसके परिणामस्वरूप स्कूल छोड़ चुके 30 छात्रों को वापस लाया गया.

अंतरराष्ट्रीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान, बेंगलुरु के एसोसिएट प्रोफेसर दिनेश बाबू जे. ने एक यूपीएससी आभासी वास्तविकता साक्षात्कार मंच विकसित किया है. प्रोफेसर दिनेश के पुरस्कार उद्धरण में कहा गया है, ”यह अत्याधुनिक तकनीक एआई और आभासी वास्तविकता को नियोजित करती है, जिसमें पांच आभासी साक्षात्कारकर्ता शामिल होते हैं जो उम्मीदवारों का ऑनलाइन मूल्यांकन करते हैं. ये साक्षात्कारकर्ता अनुवर्ती प्रश्नों को शामिल करते हुए भारतीय इतिहास, संविधान और वर्तमान मामलों जैसे विविध विषयों पर उम्मीदवारों की कुशलता से जांच करते हैं.” आईआईटी खड़गपुर की प्रोफेसर सुमन चक्रवर्ती ने भारत में पहली ‘माइक्रोफ्लुइडिक्स प्रयोगशाला’ की स्थापना की, जो विश्व स्तर पर प्रसिद्ध प्रयोगशालाओं में से एक है.

शिक्षक पुरस्कार : परित्यक्त और दिव्यांग बच्चों की देखभाल करने वाले असम के शिक्षक को पुरस्कार
असम के बालाजी जिले में रहने वाले एक शिक्षक का जीवन अपने आप में एक ऐसी मिसाल है कि कैसे छोड़े हुए बच्चों की मदद करने के उनके मिशन ने बहुत से दिव्यांग बच्चों की जिंदगियों को बेहतर बनाने का काम किया है. इस साल के राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के लिए चयनित कुमुद कलिता को शुरू में पड़ोसियों ने पागल कहा लेकिन इन बच्चों को घर व शिक्षा देने के उनके मिशन को आज समाज के अलग-अलग वर्गों द्वारा सराहा जा रहा है.

पाठशाला उच्च माध्यमिक विद्यालय में शिक्षक 59 वर्षीय कलिता विशेष जरूरतों वाले बच्चों के लिए अनाथालय और देखभाल केंद्र चलाते हैं, जिसका नाम ‘तपोबन’ है. कलिता द्वारा दान की गई जमीन पर बने इस सेंटर में उनकी जीवन भर की कमाई लगी हुई है, जिसमें करीब 25 बच्चे रहते हैं और पास के इलाकों से विभिन्न अक्षमता वाले लगभग 90 अन्य बच्चे डे केयर सुविधा प्राप्त करते हैं.

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से पुरस्कार प्राप्त करने वाले कलिता ने नयी दिल्ली से फोन पर ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, ”जब मैंने ‘तपोबन’ को बनाने की ठानी थी तो बहुत से लोगों ने पागल कहकर मेरा मजाक उड़ाया था. लेकिन अब मुझे हर वर्ग से मदद से मिल रही है. हमारे पास संरक्षक हैं, जो नियमित रूप से यहां आते हैं और हमारी वित्तीय जरूरतों को पूरा करने में मदद करते हैं.” कलिता के दिमाग में परित्यक्त और विशेष जरूरतों वाले अनाथ बच्चों की मदद का विचार गुवाहाटी विश्वविद्यालय में अपनी स्नातकोत्तर की पढ़ाई के दौरान आया था और उसी दौरान वे ऐसे बच्चों की मदद करने वाले संगठन के संपर्क में आए.

उन्होंने कहा, ”लोग शारीरिक और मानसिक रूप से अक्षम बच्चों की मदद तो करना चाहते हैं लेकिन उन्हें अपनाने से कतराते हैं. इललिए मैंने उनके लिए अपनी तरफ से कुछ करने का प्रयास किया.” कलिता और उनकी पत्नी ने पहले बच्चे के रूप में मस्तिष्क पक्षाघात से पीड़ित दो साल की बच्ची को अपनाया था, जिसे 2009 में गुवाहाटी के कामाख्या मंदिर की सीढि.यों पर कोई छोड़ गया था.
कलिता ने कहा कि तपोबन से 13 बच्चों को वैध रूप से विभिन्न लोगों द्वारा गोद लिया गया है, जिसमें से एक बच्चे को उसके गोद लेने वाले परिजन अपने साथ यूरोप ले गए हैं.

संस्थान से जुड़े स्थानीय निवासी हिरेन कलिता ने बताया, ”तपोबन में रहकर पढ़ाई कर रहे बच्चे पिछले कुछ वर्षों से मैट्रिक परीक्षाओं में शामिल हो रहे हैं. उनमें से कुछ ने सफलतापूर्वक परीक्षाओं को उत्तीर्ण भी किया है.” उन्होंने कहा, ”इलाके के नागरिक होने के नाते हमें कलिता जो भी कर रहे हैं उस पर गर्व हैं और हम भी अपनी ओर से सहयोग दे रहे हैं.” तपोबन में सभी प्रकार की देखभाल की जाती है, जिसमें शुरुआती हस्तक्षेप, फिजियोथेरेपी, स्पीच थेरेपी, ऑक्यूपेशनल थेरेपी, ब्रेल शिक्षा और संगीत व योग में प्रशिक्षण शामिल है.
कलिता को अलग-अलग पुरस्कार के रूप में काफी प्रशंसा भी मिली है, जिसमें असम के मुख्यमंत्री की ओर से बेस्ट कम्युनिटी एक्शन अवार्ड, रोटरी वोकेशनल एक्सिलेंस अवार्ड, सुशिब्रत रॉयचौधरी मेमोरियल पुरस्कार, राज्य स्तरीय सर्वश्रेष्ठ शिक्षक पुरस्कार और दिल्ली बाल अधिकार संरक्षण आयोग द्वारा चिल्ड्रन चैंपियन पुरस्कार शामिल हैं.

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