‘आप’ की नैया के खेवैया केजरीवाल को सहानुभूति भी नहीं मिली

नयी दिल्ली: दिल्ली के मुख्यमंत्री अरंिवद केजरीवाल ने अंतरिम जमानत पर 10 मई को तिहाड़ जेल से बाहर आने के बाद भीषण गर्मी में धुआंधार प्रचार किया और रैलियों तथा रोड शो में भारी भीड़ जुटाई लेकिन उनकी यह कोशिश राष्ट्रीय राजधानी में आम आदमी पार्टी (आप) को जीत नहीं दिला सकी।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को शिकस्त देने की कोशिश में केजरीवाल ने न केवल ‘आप’ उम्मीदवारों के लिए बल्कि इंडियन नेशनल डेमोक्रेटिक इंक्लूसिव अलायंस (इंडिया) में सहयोगी दलों के उम्मीदवारों के लिए भी प्रचार किया।

दिल्ली के अलावा उन्होंने महाराष्ट्र, झारखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों की भी यात्रा की। लेकिन उनकी रैलियों में उमड़ी भारी भीड़ वोट में तब्दील नहीं हो सकी और दिल्ली ‘आप’ को भाजपा के हाथों करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा।

पंजाब में ‘आप’ ने 13 सीट पर चुनाव लड़ा था, लेकिन वह सिर्फ तीन सीट ही जीत पाई। दिल्ली में उसकी सहयोगी कांग्रेस ने पंजाब में उसकी जीत की संभावनाओं पर नकेल कस दी और सात सीट अपने नाम कर ली।

‘आप’ ने देशभर में कुल 22 सीट पर चुनाव लड़ा था, जिनमें पंजाब की 13, दिल्ली की चार, गुजरात की दो, असम की दो और हरियाणा की एक सीट शामिल हैं। लेकिन पार्टी गुजरात, हरियाणा, दिल्ली और असम में एक भी सीट नहीं जीत पाई।

केजरीवाल को 21 मई को गिरफ्तार किया गया था। उनकी गिरफ्तारी के कारण ‘आप’ का चुनाव अभियान प्रभावित हो गया। पार्टी के घोषणापत्र, चुनाव लड़ने की रणनीति और लोगों से संपर्क साधने की गतिविधियों को लेकर निर्णय लेने में देरी हुई।

हालांकि, केजरीवाल की अनुपस्थिति में उनकी पत्नी सुनीता केजरीवाल ने नेतृत्व करने की कोशिश जरूर की। उनकी पार्टी के नेताओं ने कहा कि अंतरिम जमानत पर बाहर आने के बाद केजरीवाल बिना समय गंवाए पूरे जोश के साथ चुनाव प्रचार में कूद पड़े और उन्होंने पार्टी के अभियान में नयी ऊर्जा भर दी।

जेल से बाहर आने के बाद पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं को अपने पहले संबोधन में केजरीवाल ने भाजपा पर तंज कसते हुए कहा था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने ‘‘उत्तराधिकारी’’ केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के लिए वोट मांग रहे हैं क्योंकि मोदी 75 साल की उम्र में ‘‘रिटायर’’ हो जाएंगे।

पार्टी नेताओं ने फिर से एकजुट होकर ‘जेल का जवाब वोट से’ अभियान शुरू किया, जिसके तहत इसके वरिष्ठ नेताओं ने समर्थन जुटाने के लिए कई जनसभाओं का नेतृत्व किया, हस्ताक्षर अभियान और अन्य गतिविधियां शुरू कीं।

‘आप’ को उम्मीद थी कि केजरीवाल की गिरफ्तारी से लोगों में सहानुभूति पैदा होगी और यह पार्टी के पक्ष में काम करेगा, लेकिन जाहिर तौर पर ऐसा नहीं हुआ। दिल्ली, हरियाणा और चंडीगढ़ में उनकी पार्टी ने कांग्रेस के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा, लेकिन पंजाब में आम सहमति नहीं बन पाई। यह चुनाव केजरीवाल और ‘आप’ के लिए इस लिहाज से अहम था क्योंकि राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिलने के बाद ‘आप’ का यह पहला लोकसभा चुनाव था।

केजरीवाल ने पहली बार 2013 में कांग्रेस से बाहरी तौर पर मिले समर्थन से दिल्ली में ‘आप’ की सरकार बनाई थी। लेकिन यह सरकार सिर्फ 49 दिन ही चल पाई, क्योंकि केजरीवाल ने दिल्ली विधानसभा में जन लोकपाल विधेयक पारित न करवा पाने के कारण इस्तीफा दे दिया।

आप ने वर्ष 2015 और 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में शानदार जीत हासिल की लेकिन लोकसभा चुनावों में उसे आज तक कोई सफलता नहीं मिली है।

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