रोहिंग्या मुसलमानों को ले जा रही नौका इंडोनेशिया के असेह प्रांत के नजदीक डूबी

रोहिंग्या के लगातार रहने से राष्ट्रीय सुरक्षा पर गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं: केंद्र

बंदा असेह/नयी दिल्ली. दर्जनों रोहिंग्या मुसलमानों को ले जा रही एक नौका बुधवार को इंडोनेशिया के उत्तरी तट पर पलट गई. नौका में सवार छह लोगों को बचाने वाले स्थानीय मछुआरों ने यह जानकारी दी. बचाए गए लोगों ने बताया कि नौका पर और भी लोग सवार थे. तत्काल हताहतों की संख्या के बारे में जानकारी नहीं मिल सकी है.

मछुआरों ने एसोसिएटेड प्रेस को बताया कि बचाए गए चार महिलाओं और दो पुरुषों को समतिगा उप-जिले में एक अस्थायी आश्रय केंद्र ले जाया गया है. उन्होंने बताया कि शरणार्थियों से भरी नौका असेह प्रांत में कुआला बुबोन समुद्र तट से लगभग 25 किमी दूर पलटी.
असहे बारात जिले में एक आदिवासी मछली पकड़ने वाले समुदाय के नेता अमीरुद्दीन ने बताया कि बचाए गए लोगों ने जानकारी दी है कि नाव पूर्व की ओर जा रही थी तभी उसमें रिसाव होने लगा और फिर तेज धाराओं ने उसे असेह के पश्चिम की ओर धकेल दिया. बचाए गए छह लोगों ने कहा कि अन्य लोग पलटी हुई नौका पर जिंदा रहने की जद्दोजहद कर रहे थे.

म्यांमा में उग्रवाद के खिलाफ सेना के अभियान के बाद करीब 740,000 रोहिंग्या देश छोड़कर बांग्लादेश में शरण लिए हुए हैं. बांग्लादेश में भीड़भाड़ वाले शिविरों से हजारों लोग पड़ोसी देशों में भागने की कोशिश कर रहे हैं. इंडोनेशिया में नवंबर के बाद से शरणार्थियों की संख्या में बढ़ोतरी देखी जा रही है. इससे उसे मदद के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से गुहार लगानी पड़ी है. असेह पहुंचने वाले रोहिंग्या को साथी मुसलमानों से द्वेषपूर्ण व्यवहार का सामना करना पड़ता है.

पिछले साल, लगभग 4,500 रोहिंग्या नाव से म्यांमा और पड़ोसी बांग्लादेश के शरणार्थी शिविरों से भाग गए. इनमें से दो-तिहाई महिलाएं और बच्चे थे. संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी के मुताबिक, पिछले साल 569 रोहिंग्या बंगाल की खाड़ी और अंडमान सागर को पार करते समय मारे गए या लापता हो गए. यह समुदाय में, 2014 के बाद शरण के लिए भागने के दौरान हुई मौतों की सबसे अधिक संख्या है.

रोहिंग्या के लगातार रहने से राष्ट्रीय सुरक्षा पर गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं: केंद्र

केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय से कहा है कि विदेशियों को शरणार्थी के रूप में ”सभी मामलों में स्वीकृति” नहीं दी जा सकती है, विशेष रूप से तब, जब ऐसे ज्यादातर लोग अवैध रूप से देश में घुस चुके हैं. केंद्र ने दावा किया कि रोहिंग्या के लगातार अवैध प्रवास से राष्ट्रीय सुरक्षा पर गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं.

उच्चतम न्यायालय में दायर एक हलफनामे में केंद्र ने कहा है कि भारत ने 1951 के शरणार्थी दर्जे के संबंध में संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी समझौते पर या शरणार्थियों की स्थिति से संबंधित प्रोटोकॉल, 1967 पर हस्ताक्षर नहीं किये हैं और इस प्रकार, किसी भी वर्ग के व्यक्तियों को शरणार्थी के रूप में मान्यता दी जानी है या नहीं, यह एक ”शुद्ध नीतिगत निर्णय” है.

हलफनामा उस याचिका के संबंध में दायर किया गया है, जिसमें केंद्र को उन रोहिंग्याओं को रिहा करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है, जिन्हें जेलों या हिरासत केंद्रों या किशोर गृहों में बिना कोई कारण बताए या विदेशी अधिनियम के प्रावधानों के कथित उल्लंघन के लिए हिरासत में लिया गया है.

इसमें कहा गया है, ”दुनिया की सबसे बड़ी आबादी और सीमित संसाधनों वाले विकासशील देश के रूप में, देश के अपने नागरिकों को प्राथमिकता देना आवश्यक है. इसलिए, विदेशियों को शरणार्थी के रूप में पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया जा सकता है, खासकर ऐसी स्थिति में जब ज्यादातर विदेशियों ने अवैध रूप से देश में प्रवेश किया है.” उच्चतम न्यायालय के 2005 के एक फैसले का हवाला देते हुए हलफनामे में कहा गया है कि इसमें अनियंत्रित आव्रजन के खतरों को दर्शाया गया है. इसमें कहा गया है, ”रोहिंग्याओं का भारत में रहना पूरी तरह से अवैध होने के अलावा, राष्ट्रीय सुरक्षा के संबंध में गंभीर खतरा पैदा करता है.”

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