नाबालिग से दुष्कर्म का मामला: न्यायालय ने आसाराम की याचिका पर राजस्थान सरकार से जवाब मांगा

Author: Nandkishoryadav
UPDATED: Tue, 30 Jun 2026 02:26 PM
नाबालिग से दुष्कर्म का मामला: न्यायालय ने आसाराम की याचिका पर राजस्थान सरकार से जवाब मांगा
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नयी दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने नाबालिग से दुष्कर्म के 2013 के एक मामले में स्वयंभू बाबा आसाराम द्वारा दायर उस याचिका पर राजस्थान सरकार से मंगलवार को जवाब मांगा, जिसमें उसने अपनी दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखने वाले राजस्थान उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती दी है।

न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने आसाराम की सजा पर रोक लगाने से इनकार करते हुए राजस्थान सरकार को नोटिस जारी किया और दो सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। न्यायालय ने जेल अधिकारियों को आसाराम को मेडिकल सुविधाएं देने का निर्देश दिया और कहा कि जमानत देने पर तभी विचार किया जाएगा, जब उनकी सेहत बहुत ज्यादा खराब हो।

पीठ ने मौखिक रूप से कहा, ”हम अभी जमानत नहीं दे रहे हैं। राज्य सरकार की दलील सुनने के बाद ही इस बात पर विचार करेंगे कि क्या जमानत देने की कोई गंभीर आवश्यकता है, जैसे कि ऐसी स्थिति जिसमें उसके जीवन को खतरा हो।” सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता डीएस नायडू ने कहा कि आसाराम की उम्र 80 साल से ज्यादा हो गयी है और वह कई तरह की बीमारियों से जूझ रहा है।

राजस्थान उच्च न्यायालय ने 27 मई को इस मामले में आसाराम की दोषसिद्धि को बरकरार रखा था, लेकिन उसे भारतीय दंड संहिता (भादंसं) और बाल यौन अपराध संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के तहत बच्चे के सामूहिक दुष्कर्म और प्रवेशन (पेनिट्रेटिव) यौन शोषण के आरोपों से बरी कर दिया था।
उच्च न्यायालय ने आसाराम को भादंसं की धारा 376(डी) तथा पॉक्सो अधिनियम की धारा 5(जी)/6 के तहत लगाए गए आरोपों से बरी कर दिया था। अदालत ने उसे आपराधिक साजिश से संबंधित आईपीसी की धारा 120(बी) के आरोप से भी दोषमुक्त कर दिया था।

हालांकि, उच्च न्यायालय की पीठ ने भादंसं की धारा 376(2)(एफ) के तहत आसाराम की दोषसिद्धि को बरकरार रखा, जो नाबालिग से दुष्कर्म से संबंधित है। इसके साथ ही निचली अदालत द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा भी बरकरार रखी गयी। उच्च न्यायालय ने इसके अलावा भादंसं की कई अन्य धाराओं के तहत भी उसकी दोषसिद्धि को बरकरार रखा। इनमें धारा 342 (गैरकानूनी तरीके से बंधक बनाना), धारा 370(4) (मानव तस्करी), धारा 506 (आपराधिक धमकी), धारा 509 (महिला का शील भंग करना) और धारा 354(ए) (यौन उत्पीड़न) शामिल हैं। साथ ही पॉक्सो अधिनियम की धारा 7/8 और किशोर न्याय अधिनियम की धारा 23 के तहत भी उसकी दोषसिद्धि को बरकरार रखा गया।

पीठ ने इसके अतिरिक्त भादंसं की धारा 376 तथा पॉक्सो अधिनियम की धारा 34 के तहत भी आसाराम की दोषसिद्धि को कायम रखा। उच्च न्यायालय ने इस मामले के सह-आरोपी संचिता गुप्ता उर्फ शिल्पी और शरत चंद्र को सभी आरोपों से बरी कर दिया। आसाराम को 25 अप्रैल, 2018 को अपने आश्रम में एक नाबालिग शिष्या के यौन उत्पीड़न का दोषी ठहराया गया था। इसके बाद उसे भारतीय दंड संहिता, पॉक्सो अधिनियम और किशोर न्याय अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।

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