केंद्र सरकार ने न्यायालय से कहा : चुनाव लड़ने के लिए मुफ्त उपहार की संस्कृति चरम तक पहुंची

Author: Yogesh Kumar Sahu
UPDATED: Thu, 11 Aug 2022 10:21 PM
केंद्र सरकार ने न्यायालय से कहा : चुनाव लड़ने के लिए मुफ्त उपहार की संस्कृति चरम तक पहुंची

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नयी दिल्ली. केंद्र सरकार ने बृहस्पतिवार को उच्चतम न्यायालय में कहा कि चुनाव लड़ने के लिए ‘मुफ्त उपहार संस्कृति’ को ‘चरम’ के स्तर तक बढ़ा दिया गया है और अगर कुछ राजनीतिक दल यह समझते हैं कि जन कल्याणकारी उपायों को लागू करने का यही एकमात्र तरीका है तो यह ‘त्रासदी’ की ओर ले जाएगा.

तीन अगस्त के आदेश के जवाब में केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि जब तक विधायिका या निर्वाचन आयोग कोई कदम नहीं उठाता, तब तक शीर्ष अदालत को ‘व्यापक राष्ट्रीय हित’ में यह दिशानिर्देश जारी करना चाहिए कि राजनीतिक दलों को “क्या करना है, क्या नहीं.” सरकार ने चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों द्वारा किए गए मुफ्त के लोकलुभावन वादों के मुद्दे की समीक्षा के लिए एक विशेषज्ञ पैनल की स्थापना पर प्रधान न्यायाधीश एन. वी. रमण की अध्यक्षता वाली पीठ को अपनी सिफारिशें प्रस्तुत कीं.

मेहता ने कहा, ‘‘हाल ही में कुछ पार्टियों द्वारा मुफ्त उपहारों के वितरण के आधार पर चुनाव लड़ा जाता है. यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश के चुनावी परिप्रेक्ष्य में कुछ दल समझते हैं कि मुफ्त उपहारों का वितरण ही समाज के लिए ‘कल्याणकारी उपायों’ का एकमात्र तरीका है. यह समझ पूरी तरह से अवैज्ञानिक है और इससे आर्थिक त्रासदी आएगी.” सरकार ने राय दी कि केंद्रीय वित्त सचिव, राज्यों के वित्त सचिवों, मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के एक-एक प्रतिनिधि, 15वें वित्त आयोग के अध्यक्ष, भारतीय रिजर्व बैंक के एक प्रतिनिधि और नीति आयोग के सीईओ को प्रस्तावित पैनल का हिस्सा बनाया जा सकता है.

केंद्र ने कहा कि पैनल में राष्ट्रीय करदाता संगठन के एक प्रतिनिधि या भारत के पूर्व नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक को शामिल किया जा सकता है. मेहता ने कहा कि फिक्की और सीआईआई जैसे वाणिज्यिक संगठनों के प्रतिनिधियों और बिजली क्षेत्र की वितरण कंपनियों के प्रतिनिधियों को भी इस समिति का सदस्य बनाया जा सकता है.

शीर्ष अदालत वकील अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें चुनाव के दौरान मुफ्त उपहार का वादा करने वाले राजनीतिक दलों को इससे रोकने और चुनाव आयोग से उनके चुनाव चिह्नों को छीन लेने और उनका पंजीकरण रद्द करने के लिए अपनी शक्तियों के इस्तेमाल की मांग की गयी है. शीर्ष अदालत ने तीन अगस्त को केंद्र, नीति आयोग और वित्त आयोग जैसे हितधारकों को मुफ्त के मुद्दे पर विचार-मंथन करने के लिए कहते हुए संकेत दिया था कि वह इस मुद्दे से निपटने के लिए सरकार को उपाय सुझाने के वास्ते एक तंत्र स्थापित करने का आदेश दे सकता है.

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