कोचिंग संस्कृति ‘गैस चैंबर’ से कम नहीं, विज्ञापन पर होने वाले खर्च की जांच करने की जरूरत : धनखड़

Author: Yogesh Kumar Sahu
UPDATED: Mon, 29 Jul 2024 07:12 PM
कोचिंग संस्कृति ‘गैस चैंबर’ से कम नहीं, विज्ञापन पर होने वाले खर्च की जांच करने की जरूरत : धनखड़
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नयी दिल्ली. राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ ने सोमवार को कहा कि कोचिंग सेंटरों की संस्कृति किसी ”गैस चैंबर” से कम नहीं है. साथ ही उन्होंने अखबारों में विज्ञापनों पर होने वाले भारी खर्च की जांच करने की आवश्यकता पर बल दिया. दिल्ली के एक कोचिंग सेंटर में जलभराव के कारण ‘यूपीएससी’ के तीन अ्भ्यियथयों की मौत की घटना पर सोमवार को राज्यसभा में नियम 176 के तहत अल्पकालिक चर्चा हुई.

चर्चा की अनुमति देते हुए धनखड़ ने कहा, ”मुझे लगता है कि देश के युवा जनसांख्यिकीय लाभांश को पोषित किया जाना चाहिए. मुझे यह भी लगता है कि कोचिंग वस्तुत? व्यवसाय बन गई है.” उन्होंने कोचिंग सेंटरों द्वारा अर्जित की जाने वाली बड़ी रकम की ओर भी इशारा किया. उन्होंने कहा, ”कोचिंग उच्च रिटर्न वाला एक फलता-फूलता उद्योग बन गया है…जब भी हम अखबार का पहला पन्ना पढ़ते हैं तो एक या दो पेज विज्ञापनों के होते हैं…विज्ञापन पर खर्च किया जाने वाला हर पैसा छात्रों से आ रहा है, हर नयी इमारत छात्रों (के पैसों) से आ रही है.” कोचिंग संस्कृति की तुलना ”गैस चैंबर” से करते हुए सभापति ने कहा, ”ऐसे देश में जहां अवसर बढ़ रहे हैं, यह एक समस्या बन रहा है… वे गैस चैंबर से कम नहीं हैं.” उन्होंने सदस्यों से युवाओं को देश में उपलब्ध विभिन्न रोजगार और कौशल अवसरों के बारे में बताने का आग्रह किया.

धनखड़ ने सदन में कुछ दलों के नेताओं द्वारा चर्चा के लिए बुलाए जाने और सदन के कामकाज को सुनिश्चित करने के लिए सुझाव देने के लिए अध्यक्ष के कक्ष में नहीं आने और नजरअंदाज करने के चलन पर भी दुख जताया. उन्होंने कहा, ”मुझे अपनी पीड़ा साझा करने दें, मुझे अपना दर्द साझा करने दें. अनदेखी करने का यह आचरण न केवल अभूतपूर्व है, बल्कि संसदीय शिष्टाचार को कमजोर करता है. निश्चित रूप से एक स्वस्थ प्रथा नहीं है.”

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