यौन अपराध मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता संबंधी दिशानिर्देश प्रसारित करने का निर्देश

Author: Nandkishoryadav
UPDATED: Wed, 15 Jul 2026 02:35 PM
यौन अपराध मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता संबंधी दिशानिर्देश प्रसारित करने का निर्देश
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नयी दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने यौन अपराधों के पीड़ितों के प्रति अदालतों के दृष्टिकोण को अधिक संवेदनशील और सहानुभूतिपूर्ण बनाने के उद्देश्य से राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (एनजेए) द्वारा तैयार व्यापक दिशानिर्देशों को देशभर में प्रसारित करने का निर्देश दिया। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। पीठ ने आदेश दिया कि इस रिपोर्ट को देश के सभी उच्च न्यायालयों, जिला न्यायालयों, राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों, राज्य विधि विभागों और अभियोजन निदेशालयों को भेजा जाए।

पीठ ने सभी अभियोजन निदेशालयों को यह सुनिश्चित करने का भी निर्देश दिया कि ये दिशानिर्देश संबंधित सभी अधिकारियों तक पहुंचाए जाएं। साथ ही पुलिसर्किमयों को इस बात के प्रति संवेदनशील बनाया जाए कि यौन अपराध के मामलों में प्राथमिकी दर्ज करते समय और आरोपपत्र दाखिल करते समय किन सुरक्षा उपायों का पालन किया जाना चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश ने इस रिपोर्ट को ‘एक उल्लेखनीय रिपोर्ट’ और ‘टीम का सराहनीय प्रयास’ करार दिया, साथ ही भोपाल स्थित राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति के कार्य की प्रशंसा की। ये निर्देश वर्ष 2025 में एक मामले में स्वत: संज्ञान लेते हुए शुरू की गई कार्यवाही से जुड़े हैं।

यह कार्यवाही इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस विवादित फैसले के बाद शुरू हुई थी, जिसमें कहा गया था कि एक नाबालिग लड़की के स्तन पकड़ना और उसकी सलवार का नाड़ा खोलने का प्रयास करना केवल बलात्कार की ‘तैयारी’ है, न कि ‘बलात्कार का प्रयास’।
इस फैसले की व्यापक आलोचना हुई थी और बाल अधिकार संगठन ‘जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन’ ने इसे चुनौती दी थी।

उच्चतम न्यायालय ने 26 मार्च को यौन अपराधों, विशेषकर महिलाओं और बच्चों से जुड़े मामलों में न्यायिक आदेशों में इस्तेमाल की जाने वाली असंवेदनशील भाषा और शब्दावली पर भी स्वत: संज्ञान लिया था। बाद में न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला रद्द करते हुए कहा कि यह ‘स्पष्ट रूप से त्रुटिपूर्ण’ है और आपराधिक न्यायशास्त्र के स्थापित सिद्धांतों के विपरीत है।

अदालत ने उस मामले में आरोपी के खिलाफ पॉक्सो अधिनियम के तहत बलात्कार के प्रयास का आरोप फिर से बहाल कर दिया।
इसके साथ ही उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी को निर्देश दिया था कि वह यौन उत्पीड़न के पीड़ितों से जुड़े मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता सुनिश्चित करने के लिए व्यापक दिशानिर्देश तैयार करने के वास्ते एक विशेषज्ञ समिति गठित करे।
समिति को अपनी रिपोर्ट तीन महीने के भीतर पेश करने का निर्देश दिया गया था।

बाल अधिकार संगठन की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता एच. एस. फूलका ने न्यायालय के इस कदम का स्वागत किया।
उन्होंने कहा, ”ऐसे दिशानिर्देशों की लंबे समय से आवश्यकता महसूस की जा रही थी। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की असंवेदनशील टिप्पणियों ने इन्हें बिल्कुल अनिवार्य बना दिया था। अब जरूरी है कि इनका पूरी निष्ठा और प्रभावी ढंग से पालन किया जाए, ताकि यौन उत्पीड़न और ंिहसा झेल चुकी महिलाओं और बच्चों को सम्मानजनक तरीके से न्याय मिल सके।”

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