भारत 2030 तक विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होगा: धनखड़

देहरादून. उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने शुक्रवार को कहा कि भारत 2030 तक जापान और जर्मनी को पीछे छोड़कर विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा. यहां यूनाइटेड फोरम ऑन फारेस्ट (यूएनएफएफ) के तहत आयोजित ‘कंट्री लेड इनीशिएटिव’ के समापन समारोह को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि दो दशक पहले हम ‘फ्रेजाइल फाइव’ में आते थे, लेकिन अब हम विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गए हैं.

उन्होंने कहा कि 2022 में हम ब्रिटेन और फ्रांस को पीछे छोड़कर दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बने और अब इस बात के पूरे संकेत है कि इस दशक के अंत तक हम जापान और जर्मनी को पीछे छोड़कर विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएंगे .
धनखड़ ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष सहित विश्व के अन्य संगठनों ने भारत को निवेश और अवसरों के लिहाज से सबसे ‘चमकदार गंतव्य’ माना है .

इस संबंध में उन्होंने कहा कि हमारा डिजिटल लेनदेन अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी के कुल डिजिलटल लेनदेन का चार गुना है और इससे दुनिया हतप्रभ है. उन्होंने कहा कि भारत में प्रति व्यक्ति इंटरनेट डाटा उपयोग भी अमेरिका और चीन के कुल डाटा खपत से भी ज्यादा है.

उन्होंने कहा कि हजारों सालों से हमारी सभ्यता में ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना रही है जिसका अर्थ है,’एक पृथ्वी, एक परिवार और एक भविष्य’. उन्होंने कहा कि भारत की अध्यक्षता में हुई जी20 की बैठक में भी यही आदर्श वाक्य था . इस संबंध में कोविड-19 का जिक्र करते हुए धनखड़ ने कहा कि आने वाले समय में चुनौतियां किसी एक देश को प्रभावित नहीं करेंगी बल्कि उनका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा.

उन्होंने कहा कि दुनिया में जलवायु परिवर्तन कोविड से भी बड़ी चुनौती है जिसका समाधान एक देश नहीं कर सकता. उन्होंने कहा कि इसके लिए सभी देशों को मिलकर युद्धस्तर पर इसका हल निकालना होगा. वनों के हर साल 2.4 बिलियन मीट्रिक टन कार्बन सोख लेने का जिक्र करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि इसका मतलब साफ है कि जंगल ही जलवायु परिवर्तन का हल है.

इस संबंध में उन्होंने कहा कि 2030 तक भारत अपनी बिजली की जरूरत को नवीनीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से पूरा करेगा. उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन केंद्र सरकार की एक बहुत बड़ी पहल है जो रोजगार, उद्यम और जलवायु परिवर्तन के संबंध में बहुत सारे मसलों को हल करेगी. उन्होंने जोर देकर कहा कि वनों के संरक्षण के लिए उनपर निर्भर समुदायों की भागीदारी आवश्यक है.

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