किशोरियों पर उच्च न्यायालय के फैसले में कुछ पैराग्राफ समस्या पैदा करने वाले : उच्चतम न्यायालय

Author: Yogesh Kumar Sahu
UPDATED: Thu, 04 Jan 2024 09:53 PM
किशोरियों पर उच्च न्यायालय के फैसले में कुछ पैराग्राफ समस्या पैदा करने वाले : उच्चतम न्यायालय
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नयी दिल्ली. उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि किशोरियों को ‘यौन इच्छाओं पर नियंत्रण रखने’ की सलाह देने संबंधी कलकत्ता उच्च न्यायालय के एक फैसले में कुछ पैराग्राफ ‘समस्या पैदा करने वाले’ हैं और इस तरह का निर्णय लिखना ‘बिल्कुल गलत’ है. पश्चिम बंगाल सरकार ने शीर्ष न्यायालय को सूचित किया कि उसने कलकत्ता उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देते हुए एक अपील दायर की है.

शीर्ष न्यायालय ने इस फैसले की पिछले साल आठ दिसंबर को आलोचना की थी और उच्च न्यायालय की कुछ टिप्पणियों को ‘अत्यधिक आपत्तिजनक और पूरी तरह से अवांछित’ करार दिया था.शीर्ष अदालत ने इस विषय में स्वत: संज्ञान लेते हुए एक रिट याचिका दायर की है. उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि फैसले लिखते समय न्यायाधीशों से उपदेश देने की उम्मीद नहीं की जाती है.
यह विषय बृहस्पतिवार को न्यायमूर्ति ए एस ओका और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आया.

पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता हुजेफा अहमदी ने पीठ को बताया कि राज्य ने उच्च न्यायालय के 18 अक्टूबर के फैसले के खिलाफ शीर्ष न्यायालय में एक अपील दायर की है. उन्होंने कहा, ”अपील आज इस अदालत की दूसरी पीठ के समक्ष सूचीबद्ध की गई.” पीठ ने कहा कि स्वत: संज्ञान वाली रिट याचिका और राज्य सरकार द्वारा दायर अपील की सुनवाई साथ में की जाएगी.

न्यायालय ने कहा, ”यह केवल टिप्पणियों के बारे में नहीं है. किस तरह के निष्कर्ष निकाले गए हैं, उन्हें देखिए. इस तरह के फैसले बिल्कुल गलत हैं…न्यायाधीशों ने किस तरह के सिद्धांतों का अनुसरण किया है.” सुनवाई के दौरान, अहमदी ने उच्च न्यायालय के फैसले के एक पैराग्राफ का उल्लेख किया. पीठ ने कहा कि फैसले के कुछ पैराग्राफ समस्या पैदा करने वाले हैं.

इसने कहा, ”हमने सभी पैराग्राफ को चिह्नित किया है. इस क्रम में, कई निष्कर्षों को रिकार्ड में रखा गया है. ये अवधारणाएं कहां से आईं, हम नहीं जानते. लेकिन जो कुछ भी कहा गया है हम उससे निपटना चाहते हैं. आपकी सहायता की जरूरत है.” पीठ ने रजिस्ट्री को स्वत: संज्ञान वाली रिट याचिका और राज्य द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका प्रधान न्यायाधीश की मंजूरी लेने के बाद 12 जनवरी को सूचीबद्ध करने को कहा.

उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था कि किशोरियों को अपनी यौन इच्छाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए और दो मिनट के आनंद के लिए खुद को सर्मिपत नहीं करना चाहिए. उच्च न्यायालय ने एक व्यक्ति की अपील पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की थी. व्यक्ति को यौन उत्पीड़न के अपराध को लेकर 20 साल कैद की सजा सुनाई गई थी. अदालत ने उसे बरी करते हुए कहा था कि यह मामला गैर उत्पीड़नकारी एवं आपसी सहमति से दो किशोरों के बीच बनाये गए यौन संबंध का है. उच्च न्यायालय ने यह भी कहा था कि यह प्रत्येक किशोरी का कर्तव्य/दायित्व है कि वह अपनी गरिमा की रक्षा करे…अपने शरीर की स्वायत्ता के अधिकार और अपनी निजता की रक्षा करे.

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