कला में अश्लीलता कितनी सही, कितनी गलत

Author: Yogesh Kumar Sahu
UPDATED: Tue, 29 Oct 2024 08:57 PM
कला में अश्लीलता कितनी सही, कितनी गलत
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नयी दिल्ली. कलाकार अकबर पदमसी ने वर्ष 1954 में मुंबई की जहांगीर आर्ट गैलरी में पहली बार अपनी तस्वीरों का प्रदर्शन किया और उन्हें पेंटिंग ‘लवर्स 1’ और ‘लवर्स 2’ को लेकर गिरफ्तार कर लिया गया था. पदमसी ने अपनी पेंटिंग में एक पुरुष और महिला को नग्न दिखाया था. इस घटना के 25 वर्ष बाद 1979 में पदमसी के समकालीन एफएन सूजा की हस्तलिखित पांडुलिपि और 62 रेखाचित्र दिल्ली के सीमा शुल्क विभाग ने ‘अश्लीलता’ के आरोप में जब्त कर लिए थे. यह पांडुलिपि और रेखाचित्र अमेरिका से भारत में एक प्रकाशक को हवाई डाक के जरिए भेजे गए थे. हालांकि सूजा के चित्रों वाली पेंटिंग और हवाई डाक को बाद में छोड़ दिया गया. अगर मौजूदा दौर की बात करें, तो चीजें बहुत ज्यादा नहीं बदली हैं.

इतिहास, भारत के सबसे प्रसिद्ध और सबसे सफल कलाकारों में से एक दिवंगत पदमसी से जुड़े किस्सों को फिर से दोहरा रहा है और इससे बरसों पुरानी बहस एक बार फिर नये सिरे से शुरू होती दिखाई दे रही है कि आखिर कला क्या वास्तव में अश्लील हो सकती है? और यदि ऐसा है, तो क्या यह भारतीय नैतिक मानदंडों के अनुरूप नहीं है? बम्बई उच्च न्यायालय ने पिछले सप्ताह शुक्रवार को एक आदेश में कहा था, “हर नग्न तस्वीर या यौन मुद्राओं को दर्शाने वाले हर चित्र को अश्लील नहीं कहा जा सकता.” अदालत ने सीमा शुल्क विभाग को सूजा और पदमसी की 2023 में जब्त की गई कलाकृतियों को छोड़ने का आदेश दिया. इन कलाकृतियों को इस आधार पर जब्त किया गया कि ये ‘अश्लील सामग्री’ है. सूजा प्रगतिशील कलाकारों के समूह (पीएजी) के सह-संस्थापक भी थे.

कवि और कला समीक्षक अशोक वाजपेयी ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, “कला बुरी हो सकती है, अत्याचारी हो सकती है, असहनीय हो सकती है लेकिन कला अश्लील नहीं हो सकती क्योंकि 20वीं सदी की इन सभी कलाओं ने दुनिया भर में एक ऐसी आक्रामक भावना पैदा की है जो नैतिकता और अश्लीलता सहित सभी सीमाओं को लेकर सवाल उठाती है.” कई कलाकारों और प्रदर्शनी संचालकों के अनुसार, कला में अश्लीलता देखना मुख्य रूप से औपनिवेशिक अतीत और सांस्कृतिक निरक्षरता के बोझ से उपजा है. डीएजी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) और प्रबंध निदेशक आशीष आनंद ने लोगों को कला के प्रति संवेदनशील रहने को कहा. उन्होंने कहा कि भारत में हमेशा से ही मानव शरीर का सम्मान किया जाता रहा है.

आनंद ने कहा, “शरीर कब से अश्लील हो गया? हम भारत में हमेशा इसका सम्मान करते आए हैं. अजंता, खजुराहो, कोणार्क को देखिए हमारी लघु चित्रकला परंपरा, यहां तक ??कि हमारी कविता और साहित्य भी इससे अछूता नहीं है.” उन्होंने कहा, “हम भले ही सीमा शुल्क विभाग द्वारा की गयी जब्तियों की घटनाओं से नाराज हो सकते हैं लेकिन इसका सकारात्मक उपयोग संवेदनशीलता की कमी के कारण मूल्यों की समझ न होने की ओर लोगों का ध्यान आर्किषत करने के लिए किया जा सकता है.” व्यवसायी और कला संग्रहकर्ता मुस्तफा कराचीवाला ने अपनी कंपनी ‘बीके पोलीमेक्स प्राइवेट लिमिटेड’ के जरिये 2022 में लंदन में आयोजित दो अलग-अलग नीलामियों से सात कृतियां हासिल की थीं.

बम्बई उच्च न्यायालय ने कराचीवाला की याचिका पर सुनवाई करते हुए सख्त टिप्पणियां कीं और कलाकृति को “विकृत और अनुचित” बताते हुए जब्त करने के मुंबई सीमा शुल्क आदेश को रद्द कर दिया. आनंद की बात दोहराते हुए वाजपेयी ने कहा कि भारत में खजुराहो, कोणार्क जैसे मंदिर और कामसूत्र जैसा साहित्य यह साबित करता है कि ‘पवित्रता और कामुकता’ अलग-अलग हैं क्योंकि यह भारतीय परंपरा का हिस्सा नहीं है.

वाजपेयी ने कहा, “हमने नग्नता और प्रेम-प्रसंग को खुलेआम गढ़ा है और ये सब मंदिर वास्तुकला का हिस्सा हैं. इसलिए यह धारणा कि पवित्रता व कामुकता, भौतिक व आध्यात्म अलग-अलग हैं और भारतीय परंपरा की धारणा नहीं है. फोटोग्राफर और कला समीक्षक राम रहमान ने सहमति जताते हुए कहा, “कला में कामुकता का चित्रण अश्लील नहीं है.” रहमान ने कहा, “…यह जीवन की सच्चाई है और यह दुनिया भर की कला में मौजूद है. चाहे वह जापानी प्रिंट हो या यूरोपीय पेंटिंग….यह प्राकृतिक जीवन का एक हिस्सा है.”

अश्लील कला के आरोप में सामाजिक बहिष्कार का सबसे र्चिचत मामला एम.एफ. हुसैन का है, जिन्हें 2006 में देश छोड़ना पड़ा और 2011 में निर्वासन में ही उनकी मृत्यु हो गई. हुसैन पर हिंदू देवी-देवताओं को नग्न अवस्था में चित्रित करने के कारण धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का आरोप लगाया गया था, जिसके बाद उन्हें धमकियां मिलीं. उन्होंने अपने अंतिम वर्ष दोहा और लंदन में बिताए.

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