पहलगाम आतंकी हमले के बाद 1,000 से अधिक भारतीय पाकिस्तान से स्वदेश लौटे

पूर्व आतंकियों की पाकिस्तानी पत्नियों ने कहा: कश्मीर में ही रहने दें या फिर ताबूत में भेज दें

लाहौर/बांदीपोरा/मुंबई. पिछले छह दिन में 1,000 से अधिक भारतीय वाघा सीमा के रास्ते पाकिस्तान से अपने घर लौट चुके हैं. पहलगाम आतंकी हमले के बाद वीजा रद्द होने के कारण उन्हें अपनी यात्राएं बीच में ही रोकनी पड़ी थीं. एक सरकारी अधिकारी ने ‘पीटीआई’ को बताया, ह्लपिछले छह दिन में 1,000 से अधिक भारतीय वाघा सीमा के रास्ते पाकिस्तान से अपने घर लौट चुके हैं. इसी तरह, सोमवार तक 800 से अधिक पाकिस्तानी स्वदेश लौट चुके हैं.ह्व उन्होंने कहा कि दोनों देशों के दीर्घकालिक वीजा रखने वालों को स्वदेश लौटने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. रविवार को 236 पाकिस्तानी स्वदेश लौटे और 115 भारतीय अपने वतन पहुंचे.

वाघा पर पाकिस्तान रेंजर्स और भारत के सीमा सुरक्षा बल ने आव्रजन की अनुमति देने से पहले स्वदेश भेजे गए नागरिकों के कागजात की गहन जांच की. आतंकवादियों ने कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल को गोलीबारी की थी जिसमें 26 लोग मारे गए, जो 2019 में पुलवामा हमले के बाद घाटी में सबसे घातक हमला था. नयी दिल्ली में सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीएस) ने बुधवार को अन्य बातों के अलावा अटारी में एकीकृत चेक पोस्ट को तत्काल प्रभाव से बंद करने का फैसला किया. अटारी-वाघा सीमा भारत में अमृतसर और पाकिस्तान में लाहौर के पास स्थित है.

पूर्व आतंकियों की पाकिस्तानी पत्नियों ने कहा: कश्मीर में ही रहने दें या फिर ताबूत में भेज दें

जम्मू-कश्मीर के बांदीपोरा में पुनर्वासित पूर्व आतंकवादियों की पाकिस्तानी पत्नियों ने कहा है कि वे अपने पुराने देश लौटने के बजाय मरना पसंद करेंगी. पूर्व आतंकवादियों के लिए 2010 की पुनर्वास नीति के तहत कश्मीर आईं पाकिस्तानी महिलाओं ने सरकार से गुहार लगाई है कि उन्हें (यहां) रहने दिया जाए या फिर ताबूत में भेज दिया जाए.

पूर्व आतंकी से विवाहित एलिजा रफीक 2013 में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की नीति के तहत कश्मीर आई थी. इस नीति के तहत उन आतंकवादियों के पुनर्वास की व्यवस्था की गई थी, जो हथियार प्रशिक्षण के लिए पाकिस्तान या पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) गए थे, लेकिन उन्होंने हिंसा का रास्ता छोड़ दिया और घाटी में वापस लौटना चाहते थे. वर्तमान में उत्तरी कश्मीर के बांदीपोरा में रह रही रफीक ने बताया कि पुलिस ने उसे देश छोड़ने को कहा है.

रफीक ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ”हमें देश छोड़ने को कहा गया है. मेरे तीन बच्चे हैं. उन्होंने मुझे मेरी सबसे छोटी बेटी को यहां छोड़कर जाने के लिए कहा है. वह छोटी है, मैं उसे यहां कैसे छोड़ सकती हूं.” उसने कहा, ”मैं अपने पति को यहां कैसे छोड़ सकती हूं. मैंने यहां घर बनाया. हम सरकार की नीति के कारण यहां आए…हमने क्या किया है? इसमें हमारा क्या गुनाह है? हमारे पास मतदाता पहचान पत्र, आधार कार्ड है. मैंने चुनाव में मतदान किया.” रूंधे गले से रफीक ने जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा से अपील की कि उन्हें कश्मीर में रहने दिया जाए, जो पिछले 12 वर्षों से उसका घर है.

रफीक ने कहा, ”मैं उपराज्यपाल साहब से अपील करती हूं कि कृपया हमारे साथ बेरहमी न करें. हमने कोई पाप नहीं किया है. कृपया हमें यहां रहने दें. अगर नहीं, तो हमें मार दें और हमारी लाशों को सीमा पार भेज दें.” एक और पाकिस्तानी महिला जाहिदा बेगम ने कहा कि वह कश्मीर में शांति से रहना चाहती है.

बेगम ने कहा, ”पुलिस ने मुझे जाने को कहा है. मैं वापस नहीं जाना चाहती. मेरी दो बेटियां हैं, मरियम और आमना. मेरा बेटा फैजान 10 साल का है और वे मुझे उसे यहीं रखने को कह रहे हैं. मैं वापस नहीं जाना चाहती, मुझे माफ कर दें. मैं यहीं रहना चाहती हूं.” बेगम ने अपना निवास प्रमाण पत्र, आधार, मतदाता पहचान पत्र और राशन कार्ड दिखाया, जिसके बारे में उन्होंने कहा कि ये सरकार द्वारा जारी किए गए हैं. बेगम ने कहा, ”इससे मेरे बच्चों की जिंदगी तबाह हो जाएगी. मैं 15 साल से यहां रह रही हूं, मैंने अच्छी जिंदगी जी है और मैं शांति से रहना चाहती हूं. मेरे बच्चे भी वापस नहीं जाना चाहते.”

मुस्लिम व्यक्ति को बेटी की अभिरक्षा देने से अदालत का इनकार

बंबई उच्च न्यायालय ने एक मुस्लिम व्यक्ति को कोई राहत देने से सोमवार को इनकार कर दिया, जिसने पत्नी पर नाबालिग बेटी को जबरन साथ ले जाने का आरोप लगाया था. अदालत ने कहा कि धर्म के आधार पर कोई निर्णय नहीं किया जा सकता और बच्चे का कल्याण अधिक महत्वपूर्ण है.

व्यक्ति ने उच्च न्यायालय में दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में कहा कि वह और उसकी पत्नी दोनों मुसलमान हैं और मुस्लिम कानून के तहत पिता को बच्चे का स्वाभाविक अभिभावक माना जाता है, इसलिए तीन साल की बच्ची की अभिरक्षा याचिकाकर्ता को सौंपी जानी चाहिए. याचिका में कहा गया है कि पाकिस्तान में पैदा हुई याचिकाकर्ता की पत्नी 1995 में भारतीय नागरिक बन गई थी और फिलहाल दिल्ली में है, लेकिन उसे (पिता को) आशंका है कि वह बच्ची के साथ भारत से चली जाएगी.

न्यायमूर्ति एस. वी. कोतवाल और न्यायमूर्ति एस. एम. मोदक की खंडपीठ ने सोमवार को याचिका खारिज कर दी और कहा कि धर्म के बजाय बच्ची के कल्याण पर विचार किया जाना चाहिए. उच्च न्यायालय ने कहा, “लिहाजा, ऐसे मामलों में न्यायालय के समक्ष पक्षकार का धर्म ही एकमात्र विचारणीय बिंदु नहीं है. नाबालिग का धर्म भी एक विचारणीय बिंदु है, लेकिन यह निर्णायक कारक नहीं है.” अदालत ने कहा, “हमारे विचार में, तीन साल की बच्ची के लिए उसकी मां की देखरेख में रहना उसके लिए सही होगा. मां अपने और अपनी बेटी के लिए पर्याप्त पैसा कमा कर रही है.” दोनों ने 2019 में शादी की थी और 2022 में उनके यहां बेटी पैदा हुई थी.

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