नहीं रहे अंग्रेजों के जमाने के ‘जेलर’, 84 की उम्र में असरानी का निधन; अंतिम समय में पत्नी से कही थी ये बात

अमिताभ बच्चन, शबाना आजमी, अक्षय कुमार एवं अन्य ने अभिनेता असरानी के निधन पर शोक जताया

मुंबई/नयी दिल्ली. फिल्म ‘शोले’ में जेलर का किरदार निभाकर मशहूर हुए कॉमेडियन और एक्टर असरानी का सोमवार दोपहर निधन हो गया। वह बीते चार दिन से मुंबई के आरोग्यानिधि अस्पताल में भर्ती थे। जहां आज दोपहर तीन बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। 84 वर्षीय असरानी के निधन के कारण का अभी पता नहीं चल पाया है। आज शाम ही उनका अंतिम संस्कार हो गया है।

असरानी का अंतिम संस्कार आज सांताक्रूज पश्चिम स्थित शास्त्री नगर श्मशान घाट पर हुआ। वहां कोई भी फिल्मी हस्ती मौजूद नहीं थी। दरअसल, असरानी ने आज सुबह ही अपनी पत्नी मंजू से कहा था कि वे अपने अंतिम समय में कोई भीड़ नहीं चाहते, न ही लोगों को परेशान करना चाहते। वे शांतिपूर्वक जाना चाहते हैं। ऐसे में एक्टर के निधन के बाद पत्नी मंजू ने असरानी के सचिव से अनुरोध किया था कि वह किसी को भी इसकी जानकारी न दें।

असरानी को पहला ब्रेक
पढ़ाई पूरी होने के बाद असरानी ने 1960 से लेकर 1962 तक साहित्य कलभाई ठक्कर से अभिनय सीखा। साल 1962 में काम तलाशने के लिए वह मुंबई गए। 1963 में असरानी की मुलाकात किशोर साहू और ऋषिकेश मुखर्जी से हुई। उन्होंने असरानी को पेशेवर रूप से अभिनय सीखने की सलाह दी। 1964 में असरानी ने फिल्म संस्थान पुणे में दाखिला लिया और अभिनय सीखा। असरानी को सबसे पहला ब्रेक फिल्म ‘हरे कांच की चूड़ियां’ में मिला। इस फिल्म में उन्होंने अभिनेता बिश्वजीत के दोस्त का किरदार निभाया।

राजेश खन्ना के साथ की 25 फिल्में
पहली फिल्म में अपने अभिनय से सबका दिल जीतने वाले असरानी ने साल 1967 में गुजराती फिल्म में मुख्य किरदार निभाया। उन्होंने 4 और गुजराती फिल्मों में अभिनय किया। साल 1971 के बाद से असरानी को फिल्मों में कॉमेडियन का किरदार या अभिनेता के दोस्त का किरदार मिलने लगा। उन्होंने 1970 से लेकर 1979 तक 101 फिल्मों में काम किया। फिल्म ‘नमक हराम’ में काम करने के बाद असरानी और राजेश खन्ना दोस्त बन गए। इसके बाद राजेश खन्ना जिस फिल्म में काम करते, वह निर्माताओं से कहते कि असरानी को भी काम दें। असरानी ने राजेश खन्ना के साथ 25 फिल्मों में काम किया।

असरानी की हिट फिल्में
असरानी ने 1970 के दशक में कई फिल्मों में कॉमेडियन का किरदार निभाया। इन फिल्मों में ‘शोले’, ‘चुपके चुपके’, ‘छोटी सी बात’, ‘रफू चक्कर’, ‘फकीरा’, ‘हीरा लाल पन्नालाल’ और ‘पति पत्नी और वो’ शामिल हैं। कई फिल्मों में कॉमेडियन का किरदार निभाने वाले असरानी ने ‘खून पसीना’ में सीरियस रोल भी निभाया है।

2000 के दशक में असरानी ने कई कॉमेडी फिल्मों में यादगार अभिनय किया। इसमें ‘चुप चुप के’, ‘हेरा फेरी’, ‘हलचल’, ‘दीवाने हुए पागल’, ‘गरम मसाला’, ‘भागम भाग’ और ‘मालामाल वीकली’ शामिल हैं।

अमिताभ बच्चन, शबाना आजमी, अक्षय कुमार एवं अन्य ने अभिनेता असरानी के निधन पर शोक जताया

अमिताभ बच्चन और अक्षय कुमार के साथ ही अजय देवगन, शबाना आजमी और कंगना रनौत सहित कई मशहूर हस्तियों ने जाने-माने अभिनेता एवं हास्य कलाकार असरानी के निधन पर शोक व्यक्त किया और इसे “फिल्म उद्योग के लिए एक बड़ी क्षति” बताया.

“शोले”, “छोटी सी बात” और “अभिमान” जैसी फिल्मों में अपने अभिनय से दर्शकों को मंत्रमुग्ध करने वाले एवं उद्योग के सबसे सम्मानित चरित्र कलाकारों में से एक असरानी का सोमवार दोपहर 84 वर्ष की आयु में निधन हो गया. ‘शोले’, ‘अभिमान’, ‘चुपके-चुपके’, ‘नमक हराम’ और कई अन्य फिल्मों में असरानी के साथ काम करने वाले बच्चन ने उन्हें ‘सबसे प्रतिभाशाली सहयोगी’ के रूप में याद किया. जया बच्चन को फिल्मों में लाने में असरानी की अहम भूमिका थी. जया बच्चन का उस समय नाम जया भादुड़ी था. दोनों ने एफटीआईआई से पढ.ाई की थी.

बच्चन ने अपने ब्लॉग पर लिखा, ”हमने एक और….असरानी सर को खो दिया है, जो एक अत्यंत प्रतिभाशाली सहकर्मी थे और फिल्म संस्थान में जया के शिक्षक थे. यह अचानक हुआ है और दुखद है….” शबाना आजमी ने कहा कि वह असरानी के निधन की खबर सुनकर स्तब्ध हैं. शबाना आजमी पुणे स्थित भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान (एफटीआईआई) की पूर्व छात्रा हैं जहां से असरानी ने भी पढ.ाई की थी.

उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ”असरानी सर फिल्म संस्थान में हमारे उच्चारण शिक्षक थे और उनके बोलने का तरीका बहुत सुंदर था. आज के जमाने में कोई यह भी नहीं जानता कि उच्चारण भी कोई चीज होती है और मुझे यह सुनकर बहुत दुख हुआ. यह एक ऐसी क्षति है जिसे पूरा भारत लंबे समय तक महसूस करेगा.” अक्षय ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर असरानी के साथ एक तस्वीर साझा की और आगामी फिल्म “हैवान” के लिए उनकी हालिया शूटिंग को याद किया. अक्षय ने प्रियदर्शन की कई फिल्मों जैसे “गरम मसाला”, “हेरा फेरी”, “भागम भाग” और “दे दना दन” में असरानी के साथ काम किया है.

उन्होंने लिखा, ”असरानी जी के निधन पर शोक व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं हैं. एक सप्ताह पहले ही ‘हैवान’ की शूटिंग के दौरान हम गले मिले थे. वह बहुत प्यारे मनुष्य थे….” उन्होंने कहा, ”मेरी सभी बेहतरीन फिल्मों ‘हेराफेरी’ से लेकर ‘भागम भाग’, ‘दे दना दन’, ‘वेलकम’ और अब हमारी आगामी फिल्म ‘भूत बंगला’ और ‘हैवान’ तक… मैंने उनके साथ काम किया और उनसे बहुत कुछ सीखा. यह हमारे उद्योग के लिए बहुत बड़ी क्षति है. ईश्वर की आप पर कृपा हो असरानी सर, हमें हंसने के लाखों कारण देने के लिए. ओम शांति.” अजय ने कहा कि “बोल बच्चन” और “ऑल द बेस्ट” जैसी फिल्मों में असरानी के साथ काम करना सम्मान की बात थी. उन्होंने कहा, ”असरानी जी के निधन की खबर सुनकर बहुत दुख हुआ. बचपन से ही उनके काम की सराहना करने से लेकर उनके साथ काम करना… यह सचमुच सम्मान की बात थी. आपकी गर्मजोशी, हास्य और विनम्रता हमेशा बरकरार रही. आपको हमेशा याद रखा जाएगा सर… ओम शांति.”

काजोल ने अपने इंस्टाग्राम हैंडल पर अपनी नवीनतम सीरीज “द ट्रायल: प्यार कानून धोखा” का एक वीडियो साझा किया है, जिसमें उन्होंने असरानी के साथ काम किया है. उन्होंने लिखा, “यह खबर सुनकर मैं सदमे में हूं, मुझे यकीन है कि असरानी जी अब बेहतर जगह पर हैं. उनके प्रियजनों के प्रति मेरी गहरी संवेदना.” अभिनेत्री कंगना रनौत ने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी पर अभिनेता की एक तस्वीर साझा की और उनकी यादगार भूमिकाओं का जिक्र किया. उन्होंने लिखा, ”श्री गोवर्धन असरानी जी न केवल एक कलाकार थे, बल्कि हम सभी के जीवन का हिस्सा लगते थे और बचपन में अपनी जीवंत भूमिकाओं और चंचल किरदारों के माध्यम से उन्होंने लगभग हर परिवार के दिल में अपना घर बना लिया था. असरानी जी, आपकी बहुत याद आएगी, ओम शांति.”

अनुपम खेर ने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो अपलोड करते हुए लिखा, ”प्रिय असरानी जी! अपने व्यक्तित्व से दुनिया को एक बेहतर जगह बनाने के लिए धन्यवाद! ऑन स्क्रीन और ऑफ स्क्रीन! हम आपको भौतिक रूप में याद करेंगे! लेकिन सिनेमा और लोगों को हंसाने की आपकी क्षमता आपको आने वाले वर्षों तक जीवित रखेगी! ओम शांति.” अभिनेता राजकुमार राव ने कहा कि असरानी की विरासत हमेशा अमर रहेगी. उन्होंने कहा, ”असरानी सर हमारे बचपन को हंसी और मनोरंजन से भरपूर बनाने के लिए धन्यवाद… ओम शांति.” अभिनेता-फिल्मकार फरहान अख्तर ने असरानी की एक पुरानी तस्वीर पोस्ट की और कहा, “यह जानकर दुख हुआ कि असरानी जी अब हमारे साथ नहीं हैं. उनकी ऊर्जा, उत्साह ने स्क्रीन को जगमगा दिया और वह उतने ही गर्मजोशी से भरे, मजाकिया और प्यारे थे.” राजपाल यादव ने दिवंगत अभिनेता के साथ साझा की गई फिल्मों के दृश्यों का एक कोलाज पोस्ट किया.

उन्होंने लिखा, “असरानी साहब, आपकी एक लंबी पारी के दौरान कुछ फिल्मों का हिस्सा होने का सौभाग्य मुझे मिला. चाहे ‘भूल भुलैया’ हो, ‘ढोल’ हो, या हमारी आखिरी फिल्म ‘भूत बांग्ला’ हो, हर सीन को हिट करने में आपका विशेष योगदान रहा है.” उन्होंने कहा, “…आपकी विशेष टिप्पणियां हमेशा याद रहेंगी. आपकी आत्मा को शांति मिले! ओम शांति.” आयुष्मान खुराना ने असरानी के निधन पर एक पोस्ट फिर से साझा किया और कहा कि “ड्रीम गर्ल 2” में उनके साथ स्क्रीन साझा करना सम्मान की बात है.

जैकी श्रॉफ ने इंस्टाग्राम स्टोरी पर एक तस्वीर साझा करते हुए लिखा, “आपकी आत्मा को शांति मिले.” रकुल प्रीत सिंह ने कहा, “असरानी सर के निधन की खबर सुनकर बहुत दुख हुआ. उनकी आत्मा को शांति मिले. ओम शांति.” कुणाल खेमू ने कहा, “उनके साथ काम करने का सौभाग्य और सम्मान मिला. उन्हें पर्दे पर देखते हुए और उनकी बेहतरीन कॉमिक टाइमिंग देखकर खूब हंसा हूं. आपने हमें जो भी कहानियां सुनाईं, उन्हें हमेशा याद रखूंगा, सर, पर्दे पर और व्यक्तिगत रूप से. परिवार के लिए प्यार और प्रार्थनाएं.” उर्मिला मातोंडकर ने असरानी की तस्वीरों का एक कोलाज साझा करते हुए इंस्टाग्राम स्टोरी पर लिखा, “पागलपन, मस्ती और अंतहीन हंसी के लिए धन्यवाद.”

असरानी ने अपने पांच दशक लंबे करियर के प्रत्येक युग में बड़े निर्देशकों के साथ काम किया तथा राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन और आमिर खान सहित शीर्ष सितारों के साथ स्क्रीन साझा किया. उन्होंने अपने हिंदी सिनेमा करियर की शुरुआत 1967 में फिल्म ‘हरे कांच की चूड़ियां’ से की और इसके बाद वह ‘मेरे अपने’, ‘शोले’, छोटी सी बात’, ‘अभिमान’, ‘कोशिश’, ‘परिचय’, ‘बावर्ची’, ‘चुपके-चुपके’, ‘रफू चक्कर’, ‘बालिका बधु’, ‘हीरालाल पन्नालाल’ और ‘पति पत्नी और वो’ में नजर आए.

असरानी को ‘मस्तीजादे’ में काम का था मलाल, छवि तोड़ने में मदद के लिए ऋषिकेश और गुलजार को देते श्रेय

दिग्गज अभिनेता असरानी ने एक बार हास्य में ब­ढ़ती अश्लीलता के बारे में खुलकर बात की थी और बताया था कि कैसे ऋषिकेश मुखर्जी, गुलजार और बासु चटर्जी जैसे फिल्म निर्माताओं ने उन्हें ऐसी भूमिकाएं दीं, जिनसे उन्हें एक हास्य कलाकार की छवि तोड़ने में मदद मिली.

असरानी का सोमवार को 84 वर्ष की आयु में निधन हो गया. उन्होंने 300 से अधिक फिल्मों में काम किया था और हिंदी सिनेमा के सबसे लोकप्रिय अभिनेताओं में से एक थे. असरानी ने 2016 में ‘पीटीआई-भाषा’ को दिये एक साक्षात्कार में कहा था कि यह ‘कॉमेडी आइकन’ महमूद थे जिन्होंने दोहरे अर्थ वाले संवादों की शुरुआत की थी, लेकिन बाद में इस प्रवृत्ति ने हिंदी सिनेमा में एक भद्दा मोड़ ले लिया, जिसमें ‘मस्तीजादे’ जैसी फिल्में शामिल हैं, जिसे करने पर उन्हें पछतावा हुआ था.

उन्होंने कहा था, ”महमूद साहब ने द्विअर्थी संवादों का इस्तेमाल शुरू कर दिया था और उनमें से कुछ कारगर भी रहे, तो कुछ ने इस फॉर्मूले का फायदा उठाने की कोशिश की. तब भी ये द्विअर्थी थे, लेकिन अब ये अश्लील हो गए हैं, बस कपड़े उतारने की नौबत आ गई है.” असरानी को 1975 में प्रर्दिशत ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘शोले’ से हास्य अभिनेता के रूप में लोकप्रियता मिली. उन्होंने कहा था कि फिल्म उद्योग की प्रकृति ऐसी है कि एक बार जब कोई कलाकार किसी विशेष भूमिका या शैली में प्रभाव डाल देता है, तो वह अक्सर उसी तक सीमित रह जाता है.

असरानी ने कहा था, ”फिल्मों में कोई भी जोखिम नहीं लेना चाहता. अगर कोई हास्य में अच्छा काम करता है, तो उसे सुरक्षित मानकर उसी तरह की भूमिका में दोबारा काम करने को कहा जाता है. फिर एलवी प्रसाद, बीआर चोपड़ा, ऋषिकेश मुखर्जी और गुलज.ार जैसे लोग भी थे जिन्होंने मुझे चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं दीं और सीमाओं को तोड़ा.” उन्होंने कहा था, ”बीआर चोपड़ा ने आम धारणा के विपरीत जाकर मुझे ‘निकाह’ में भूमिका दी. लोगों को हैरानी होती कि वह मुझे एक गंभीर फिल्म में क्यों ले रहे हैं, लेकिन उन्होंने लोगों से अपने काम से काम रखने को कहा, वह इतने आश्वस्त थे.” असरानी का मुखर्जी और गुलज.ार के साथ रचनात्मक रिश्ता था. वह हास्य से परे एक कलाकार के रूप में अपनी सीमा को पहचानने का श्रेय दोनों को देते थे.

असरानी ने मुखर्जी के निर्देशन में ‘अभिमान’, ‘चुपके-चुपके’ और ‘बावर्ची’ जैसी प्रशंसित फिल्मों में काम किया. गुलजार के साथ उन्होंने ‘कोशिश’ और ‘चैताली’ जैसी फिल्मों में काम किया, जिससे उन्हें गंभीर और भावनात्मक भूमिकाएं निभाने का मौका मिला. असरानी ने मुखर्जी की 1973 में प्रर्दिशत फिल्म ‘अभिमान’ में अपनी भूमिका को अपने दिल के सबसे करीब बताया था. अमिताभ बच्चन और जया भादुड़ी अभिनीत इस फिल्म में उन्होंने बच्चन के करीबी दोस्त और सचिव की भूमिका निभाई थी.

उन्होंने याद करते हुए कहा था, ”मुझे लगा कि यह किरदार निभाना मुश्किल है. लेकिन ऋषिकेश मुखर्जी ही थे जिन्होंने मुझे समझाया और मुझे इस किरदार को सहजता से निभाने के लिए प्रेरित किया.” असरानी ने 1960 के दशक के अंत में अपने करियर की शुरुआत की थी. उन्होंने हिंदी सिनेमा में कॉमेडी के विकास और यह कैसे दो अलग-अलग ”धाराओं” से प्रभावित हुआ, इस बारे में भी बात की थी.
उन्होंने कहा था, ”हिंदी फ.ल्मिों में कॉमेडी को लेकर शुरुआत में दो विचारधाराएं थीं. एक था ‘बिमल रॉय स्कूल’, जिसके प्रवर्तकों में ऋषिकेश मुखर्जी, गुलज.ार, एलवी प्रसाद, बासु चटर्जी और बासु भट्टाचार्य शामिल थे. उनकी फिल्में यथार्थवादी होती थीं और कॉमेडी सूक्ष्म.”

असरानी ने कहा था, ”फिर ‘मद्रास स्कूल’ आया, जिसमें मुख्य कहानी से अलग एक अलग कॉमेडी ट्रैक था. जीतेंद्र, मैं और कादर खान समेत कई लोगों ने इसे किया. यह कुछ सालों तक चला… इसमें कॉमेडी ज.ोरदार तो थी, फिर भी घरेलू थी.” असरानी ने 2016 की फिल्म ‘मस्तीजादे’ में अपनी भूमिका पर अफसोस जताते हुए कहा था कि उन्हें इसमें काम करने में र्शिमंदगी महसूस हुई. उन्होंने कहा, ”यह बहुत भयानक है (इन दिनों फिल्मों में अश्लीलता). मुझे नहीं पता था कि फिल्म इस तरह बनेगी.” असरानी ने कहा था कि वह अपने करियर में दोहरे अर्थ वाले संवाद बोलने से दूर रहे हैं.

हास्य कलाकार के साथ चरित्र अभिनेता भी थे असरानी

असरानी सिर्फ हास्य अभिनेता नहीं थे, बल्कि एक शांत चरित्र अभिनेता भी थे, जो उन कई फिल्मों का हिस्सा रहे जो अब हिंदी सिनेमा के सुनहरे दौर का प्रतीक हैं. गोवर्धन कुमार असरानी को फिल्म प्रशंसक असरानी के नाम से ही जानते हैं. उनका निधन दिवाली वाले दिन सोमवार को दोपहर में हुआ और उसी दिन शाम को उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया जिसकी बहुत ज्यादा खबर नहीं फैली क्योंकि पूरा देश रोशनी के त्योहार का जश्न मना रहा था. वह 84 वर्ष के थे.

उन्हें हमेशा फिल्म ‘शोले’ के जेलर के रूप में याद किया गया और आगे भी किया जाएगा, जिनका संवाद ”हम अंग्रेज.ों के ज.माने के जेलर हैं” 50 साल बाद भी दोहराया जाता है. उसी साल बासु चटर्जी की ”छोटी सी बात” आई, जिसमें असरानी ने चिकनी-चुपड़ी बात करने वाले नागेश की भूमिका निभाई, जो विद्या सिन्हा के साथ नायक अमोल पालेकर के रिश्ते में बाधा डालने की कोशिश करता है. उन्होंने गुलजार की ‘खुशबू’ में मददगार भाई की भूमिका निभाई. आश्चर्यजनक रूप से, 1975 में उन्होंने ऋषिकेश मुखर्जी की ”चैताली” में एक नकारात्मक भूमिका भी निभाई.

असरानी ने छह दशकों में 300 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया जिनमें उनकी कई भूमिकाएं भुला दी गईं तो कई ऐसी थीं जो हमेशा याद रखी जाएंगी. असरानी ”अभिमान” (1973) में चंदर के रूप में भी प्रसिद्ध हुए थे. अमिताभ बच्चन-जया बच्चन अभिनीत यह फिल्म उनकी निजी तौर पर पसंदीदा फिल्म थी, जिसे निभाने के लिए मुखर्जी ने उन्हें राज.ी किया था. एक तरह से, मुखर्जी ने उन्हें एक ऐसे चरित्र कलाकार के रूप में तैयार किया जो एक खास तरह की सिनेमाई संवेदनशीलता का प्रतिनिधित्व करता था. उन्हें चमकने का मंच देने वालों में गुलजार और बासु चटर्जी भी शामिल थे.

असरानी ने ‘बावर्ची’ (1972) में एक ऐसे संगीतकार की भूमिका निभाई जो अपनी ही दुनिया में खोया रहता है, वहीं क्लासिक कॉमेडी ‘चुपके-चुपके’ (1975) में एक ऐसे दोस्त की भूमिका निभाई जो हास्य कथानक को आगे ब­ढ़ाता है. ‘नमक हराम’ (1973) में उन्होंने नायिका के भाई की भूमिका निभाई. इन सभी का निर्देशन मुखर्जी ने किया था. गुलजार ने एक कलाकार के रूप में असरानी की विविधता को समझने की कोशिश की और उन्हें ‘मेरे अपने’, ‘परिचय’, ‘कोशिश’ और ‘अचानक’ में लिया.

असरानी ने 2016 में ‘पीटीआई-भाषा’ को दिए एक साक्षात्कार में कहा था, ”जहां तक हिंदी फिल्मों में कॉमेडी का सवाल है, शुरुआत में दो विचारधाराएं थीं. एक थी ‘बिमल रॉय स्कूल’, जिसके प्रवर्तकों में ऋषिकेश मुखर्जी, गुलजार, एल वी प्रसाद, बासु चटर्जी और बासु भट्टाचार्य जैसे लोग शामिल थे.” उन्होंने कहा था, ” उसके बाद ‘मद्रास स्कूल’ आया जो एक अलग तरह की कॉमेडी लेकर आया. इसमें जितेंद्र, मैं और अन्य हास्य अभिनेताओं के साथ कादर खान थे. यहां कॉमेडी अधिक मुखर थी.” असरानी एक ऐसे अभिनेता थे जिन्होंने समय के साथ खुद को ढाल लिया. 1980 और 1990 के दशक में जैसे-जैसे फिल्मों का लहजा बदलता गया, वैसे-वैसे असरानी भी ढलते गए.

इस दौर में ‘हिम्मतवाला’, ‘एक ही भूल’, ‘कामचोर’ और ‘बीवी हो तो ऐसी’ फिल्में आईं. 1990 के दशक में ‘बड़े मियां छोटे मियां’, ‘घरवाली बाहरवाली’ जैसी फिल्में आईं. डेविड धवन की ‘हीरो नंबर 1’, ‘दीवाना मस्ताना’ और ‘बड़े मियां छोटे मियां’ जैसी हास्य फिल्मों में गोविंदा के साथ उनकी केमिस्ट्री ने उन्हें दर्शकों की एक नई पी­ढ़ी से परिचित कराया. अपने अभिनय करियर के अंतिम चरण में, असरानी के सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी प्रियदर्शन थे, जिन्होंने उन्हें ‘हेरा फेरी’, ‘चुप चुप के’, ‘गरम मसाला’ और ‘भूल भुलैया’ में भूमिकाएं दीं.

विभाजन के बाद पाकिस्तान से आए एक मध्यमवर्गीय सिंधी परिवार में 1941 में जन्मे असरानी चार बहनों और तीन भाइयों के साथ जयपुर में पले-ब­ढ़े. उन्होंने सेंट जेवियर्स स्कूल से प­ढ़ाई की और राजस्थान कॉलेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त की. उन्होंने जयपुर में आकाशवाणी में एक वॉयस आर्टस्टि के रूप में काम करते हुए अपनी शिक्षा जारी रखी. उन्हें अपने पिता के कालीन व्यवसाय में कोई दिलचस्पी नहीं थी और वह फिल्मों में काम करने पर अड़े रहे. उन्होंने पुणे के प्रसिद्ध भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान (एफटीआईआई) में दाखिला लिया.

उनके अभिनय करियर की शुरुआत 1960 के दशक की शुरुआत में हुई, जहां उन्होंने मुंबई आने से पहले गुजराती फिल्मों में छोटी-छोटी भूमिकाएं निभाईं. उनकी पहली हिंदी फिल्म ‘हरे कांच की चूड़ियां’ (1967) थी, लेकिन ऋषिकेश मुखर्जी की ‘सत्यकाम’ (1969) और ‘गुड्डी’ (1971) ने उन्हें पहचान दिलाई.

‘शोले’ फिल्म में जेलर की भूमिका शायद असरानी के लिए ही थी: सिप्पी
निर्देशक रमेश सिप्पी ने कहा है कि दिग्गज अभिनेता असरानी को “शोले” फिल्म में सनकी जेलर की भूमिका निभाने के लिए हमेशा याद रखा जाएगा और ऐसा लगता है कि यह भूमिका केवल उन्हीं के लिए थी. सोमवार को 84 वर्ष की आयु में अभिनेता का निधन होने के बाद शोक व्यक्त करते हुए ‘शोले’ के निर्देशक सिप्पी ने कहा कि जब वे हाल ही में मिले थे, तो असरानी ‘बिल्कुल ठीक’ लग रहे थे.

सिप्पी ने ‘पीटीआई-भाषा’ को दिए साक्षात्कार में कहा, “यह (निधन) अचानक हुआ… उन्होंने बहुत काम किया, लेकिन यह (‘शोले’ में उनकी भूमिका) सबसे अलग थी. मैं उन्हें लंबे समय तक याद रखूंगा. यह किरदार केवल उन्हीं के लिए था.” इस फिल्म में असरानी का किरदार चार्ली चैपलिन की फिल्म “द ग्रेट डिक्टेटर” पर आधारित था, जो हिटलर पर कटाक्ष था. “शोले” फिल्म की कहानी सलीम खान और जावेद अख्तर ने लिखी थी. सिप्पी ने कहा कि उन्होंने पहली बार असरानी के साथ “सीता और गीता” में काम किया था और जिस तरह से अभिनेता ने अपने किरदार को निभाया, उससे वे बहुत प्रभावित हुए.

सिप्पी ने याद करते हुए कहा, “फिर ‘शोले’ आई, जो सलीम-जावेद ने लिखी. उन्होंने मेरे साथ इस पर चर्चा की. हम सभी ने सोचा कि असरानी सही व्यक्ति होंगे. हमने उन्हें बुलाया, उनके साथ इस पर चर्चा की. वह यह भूमिका निभाने के लिए बहुत खुश थे.” फिल्म निर्माता ने जेलर का किरदार अत्यंत नैर्सिगक तरीके से निभाने के लिए असरानी की प्रशंसा की.

सिप्पी ने कहा, “उन्होंने इसे नैर्सिगक रूप से निभाया; ऐसा लगा जैसे वह इस भूमिका के लिए ही बने हों. हिटलर एक ऐसा व्यक्ति है जिसके बारे में किताबें लिखी गई हैं, कहानियां सुनाई गई हैं, उसके आचरण और उसके द्वारा की गईं हत्याओं ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा.” सिप्पी (78) ने कहा, “लेकिन इस पर (हिटलर पर) एक हास्य किरदार एक बेहतरीन विचार था… उन्होंने (असरानी) इतना अच्छा काम किया कि लोग आज तक उन्हें याद करते हैं. इस किरदार को कभी नहीं भुलाया जा सकेगा.”

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