
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की सत्ता से बाहर हुए टीएमसी को तीन महीने हो चुके हैं। 15 साल सत्ता में रहने के बाद पार्टी दूसरी बार विपक्ष में है। लेकिन इस बार चुनौती सिर्फ चुनावी हार की नहीं है। सवाल पार्टी के अस्तित्व का भी है। क्या ममता बनर्जी बिखरती पार्टी को फिर से एकजुट कर पाएंगी? क्या टीएमसी अपनी पुरानी ताकत वापस हासिल करेगी या चुनावी हार बंगाल की प्रमुख विपक्षी पार्टी को स्थायी रूप से कई हिस्सों में बांट देगी?
ममता बनर्जी के सामने फिलहाल टीएमसी को दोबारा खड़ा करने की बड़ी चुनौती है। उन्हें ऐसा संगठन खड़ा करना होगा, जो सरकार में रहे बिना भी प्रभावी ढंग से काम कर सके। 15 साल तक सत्ता और संगठन एक ही राजनीतिक व्यवस्था का हिस्सा रहे। मंत्री, विधायक, नगर निकाय और जिला स्तर के नेता सत्ता के आसपास काम करते थे। सत्ता के साथ राजनीतिक प्रभाव और पहुंच का सीधा फायदा मिलता था। अब यह व्यवस्था खत्म हो गई है।
ममता बनर्जी के संपर्क में कई बागी नेता: घोष का दावा
ममता खेमे की प्रमुख आवाजों में से एक कुणाल घोष ने बागी गुट की कार्यवाही को ‘कॉमेडी शो’ बताया। उन्होंने कहा, ‘टीएमसी ममता बनर्जी के बराबर है। बाकी सब तमाशा है।’ घोष का दावा है कि छह बागी सांसद और आधे से अधिक असंतुष्ट विधायक अब भी ममता के संपर्क में हैं और वापस लौटना चाहते हैं। उनका आरोप है कि पुलिस के दबाव के कारण वे ऐसा नहीं कर पा रहे हैं।
बागी गुट की क्या कहानी?
बागी गुट की कहानी इससे बिल्कुल अलग है। उसका कहना है कि पुरानी टीएमसी अपनी राजनीतिक पहचान पहले ही खो चुकी है। ऋतब्रत खेमे से जुड़े संदीपन साहा ने कहा कि जिस विचारधारा के साथ पार्टी शुरू हुई थी, वह अब मौजूद नहीं है। उनका तर्क है कि यह बगावत केवल ममता बनर्जी के अधिकार को चुनौती देने की कोशिश नहीं है। उनके मुताबिक, इसका उद्देश्य ज्यादा लोकतांत्रिक तरीके से संगठन को फिर से हासिल करना है।
ऋतब्रत गुट की ताकत बढ़ने की एक बड़ी वजह अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव का विरोध भी है। असंतुष्ट नेताओं का आरोप है कि पहले के नेतृत्व ने पार्टी के मूल राजनीतिक चरित्र को छोड़ दिया। मदन मित्रा, फिरहाद हकीम और अरूप विश्वास समेत कई प्रमुख नेता ऋतब्रत खेमे की ओर चले गए हैं। यानी लड़ाई अब सिर्फ ममता बनर्जी बनाम बागी नेताओं की नहीं रह गई है। यह टीएमसी की दिशा और उसके राजनीतिक भविष्य की लड़ाई भी बन गई है।
सांसदों के टूटने से दीदी को लगा बड़ा झटका
तीसरा धड़ा टीएमसी से बाहर निकलकर अपनी अलग राजनीतिक जमीन तैयार कर रहा है। एनसीपीआई संसदीय समूह के नेताओं में शामिल सुदीप बंद्योपाध्याय ने कहा कि अलग हुए सांसदों ने ममता के नियंत्रण से बाहर एक राजनीतिक जगह बनाई है। उन्होंने कहा, ‘एनसीपीआई को चुनाव आयोग से मान्यता मिली हुई है और हम बंगाल के विकास के लिए केंद्र के साथ हाथ मिलाना चाहते हैं।’
यह बदलाव इसलिए अहम है क्योंकि टीएमसी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 नए गठन में चले गए हैं। इससे पार्टी की संसदीय ताकत में बड़ा बदलाव आया है। अब अगली बड़ी लड़ाई जमीनी संगठन को लेकर होगी।
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जब पहली बार विपक्ष की भूमिका में थीं ममता
2011 में ममता बनर्जी ने बंगाल की सबसे बड़ी विपक्षी नेता से खुद को सत्ता परिवर्तन की मुख्य नायिका में बदल दिया था। उन्होंने 34 साल के वाम शासन का अंत किया था। 2026 में स्थिति बिल्कुल उलट है। अब ममता को सरकार की प्रशासनिक मशीनरी, संरक्षण तंत्र और संस्थागत फायदे के बिना पार्टी को फिर से खड़ा करना है।
राजनीतिक विश्लेषक बिस्वनाथ चक्रवर्ती ने बताया कि टीएमसी का मॉडल सत्ता तक पहुंच पर बना था। जब वह धुरी बदलती है, तो पूरे ढांचे को नए सिरे से सोचना पड़ता है। टीएमसी का पुराना मॉडल ताकतवर स्थानीय नेताओं पर काफी निर्भर था। ये नेता ममता की राजनीतिक छवि को गांव और बूथ स्तर तक पहुंचाते थे। सत्ता जाने के बाद यह व्यवस्था हिल गई है। अब पार्टी को संगठन दोबारा खड़ा करना है। साथ ही अंदरूनी गुटों की लड़ाई से भी निपटना है।
टीएमसी में बिखराव भाजपा के लिए बड़ा मौका?
टीएमसी के संकट ने भाजपा के लिए बड़ा राजनीतिक अवसर पैदा कर दिया है। पश्चिम बंगाल बीजेपी अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने कहा है कि राजनीति में अहंकार की कोई जगह नहीं है। उनका कहना है कि मतदाताओं ने टीएमसी के अहंकार के खिलाफ अपना फैसला दिया है। भाजपा का लक्ष्य केवल ममता को चुनाव में हराना नहीं। अगर टीएमसी का जिला स्तर का संगठन भी बिखरता है, तो भाजपा को इसका बड़ा फायदा मिल सकता है। लेकिन बीजेपी के सामने भी चुनौती है।



