
श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की कार्यशैली में आज से बहुत कुछ बदलने वाला है। दरअसल, ट्रस्ट आज अपने पहले मुख्य कार्यकारी अधिकारी यानी चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर (सीईओ) के नाम का एलान कर दिया है। एयर मार्शल (रिटायर्ड) जितेंद्र मिश्र को राम मंदिर तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का पहला सीईओ नियुक्त किया गया है। इस नई सीईओ व्यवस्था के लागू होने का मतलब है कि राम मंदिर को चलाने का जो तंत्र पहले से कायम था, अब वह बदल जाएगा और इसकी जगह एक प्रशासनिक व्यवस्था ले लेगी। यह बदलाव ऐसे समय में किए गए हैं, जब राम मंदिर में हुई दान चोरी को लेकर निगरानी और जवाबदेही प्रणाली पर सवाल उठाए गए थे।
पहले जानें- कब-क्यों हुई राम मंदिर की व्यवस्था बदलने की चर्चा?
राम मंदिर में दान में कई वर्षों से हो रही चोरी का पहला खुलासा मई-जून में हुआ था। इन खुलासों और जांच में मंदिर की ही व्यवस्था से जुड़े लोगों की संलिप्तता पाए जाने के बाद निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र ने मंदिर प्रबंधन में सुधार के लिए तिरुमला तिरुपति देवस्थानम (टीटीडी) मॉडल को अपनाने का सुझाव दिया। उन्होंने तिरुपति मॉडल की तर्ज पर राम मंदिर के प्रबंधन के लिए एक स्वतंत्र मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) की नियुक्ति का सुझाव दिया था।
नृपेंद्र मिश्र ने एक इंटरव्यू में बताया था कि तिरुपति में कमिश्नर-रैंक का एक मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) नियुक्त होता है, जो कि आईएएस स्तर का प्रशासनिक अधिकारी होता है। यह सीईओ आमतौर पर पांच से सात साल तक वहां रहकर पूरा कामकाज संभालता है। उन्होंने कहा कि राम मंदिर के लिए नियुक्त होने वाले सीईओ के पास उत्तर प्रदेश में काम करने का अनुभव होना चाहिए, ताकि वह अयोध्या और राज्य की व्यवस्था को ठीक से समझ सके।
जिस मंदिर में देखा गया सीईओ तंत्र, वह कहां स्थित?
नृपेंद्र मिश्रा ने जिस तिरुमला तिरुपति मंदिर मॉडल की बात छेड़ी थी, वह मंदिर आंध्र प्रदेश में स्थित है। यह मंदिर शेषाचलम पर्वत श्रृंखला की सातवीं चोटी वेंकटाद्रि पर बसा हुआ है। यह एक पहाड़ी शहर है जो समुद्र तल से लगभग एक किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थित है और दस वर्ग मील से ज्यादा के जंगल के इलाके में फैला हुआ है। शेषाचलम की इन सात चोटियों को नाग आदिशेष के फनों का प्रतीक माना जाता है, जिसके कारण श्रद्धालु अक्सर इसे सात पहाड़ियों का मंदिर के नाम से भी पुकारते हैं।
तिरुपति के पीठासीन देवता भगवान श्री वेंकटेश्वर, भगवान विष्णु का एक रूप हैं, जिन्हें कलियुग के दौरान मानवता को कठिनाइयों से उबारने के लिए पृथ्वी पर अवतरित माना जाता है; इसलिए श्रद्धालु अक्सर उन्हें कलियुग प्रत्यक्ष दैवम यानी ‘इस युग का साक्षात भगवान’ कहते हैं।
कैसे काम करता है मंदिर में सीईओ वाला प्रशासनिक तंत्र?
तिरुमला तिरुपति मंदिर के जिस मॉडल की आज दुनियाभर में चर्चा होती है, वह कोई नया या हालिया स्वरूप नहीं है। इसकी पहली बार शुरुआत 1970 के दशक में हुई थी। दरअसल, 1970 के दशक के अंत तक मंदिर के संसाधन और दान में भारी बढ़ोतरी हो चुकी थी, जिससे पुराने नियमों के तहत कई फैसले लेने में देरी होती थी। इतने बड़े संस्थान के लिए यह व्यवस्था अपर्याप्त थी। आखिरकार 1979 में एक स्वतंत्र कानून लाया गया, जिसे बाद में 1987 के ‘टीटीडी अधिनियम’ के तौर पर और मजबूत किया गया। यही कानून आज भी मंदिर के प्रशासन का संचालन करता है।
आज तिरुमला तिरुपति देवस्थानम कोई निजी ट्रस्ट नहीं है, बल्कि आंध्र प्रदेश सरकार का एक वैधानिक निकाय है जो सीधे राज्य के प्रति जवाबदेह है।
राम मंदिर में इस मॉडल को लागू करने से क्या बदलेगा?
अगर उत्तर प्रदेश के राम मंदिर में सीईओ की नियुक्ति के बाद इसी तरह का मॉडल लागू किया जाता है तो मंदिर का पूरा प्रशासनिक ढांचा स्पष्ट रूप से दो स्तरों में बंट जाएगा।
पहला ढांचा: ट्रस्ट बोर्ड (नीतियां बनाने वाली इकाई)
राज्य सरकार की ओर से नियुक्त इस बोर्ड में राजनीतिक, न्यायिक, धार्मिक और व्यावसायिक क्षेत्रों के सदस्य होते हैं, जो मंदिर की व्यापक नीतियां तय करते हैं।
दूसरा ढांचा: कार्यकारी अधिकारी (दैनिक प्रशासन देखने वाली इकाई)
मंदिर का रोजमर्रा का कामकाज एक कमिश्नर-रैंक के सेवारत आईएएस अधिकारी द्वारा संभाला जाता है, जिसे एग्जीक्यूटिव ऑफिसर (ईओ) कहते हैं। वह वित्त, सुरक्षा और तीर्थयात्रियों के कल्याण की देखरेख करता है और ट्रस्ट बोर्ड के सदस्य-सचिव के रूप में भी कार्य करता है।
इस तरह, यह प्रणाली नीतियां बनाने वाले बोर्ड और उन्हें लागू करने वाले पेशेवर प्रशासक (सीईओ/ईओ) के बीच शक्तियों और जिम्मेदारियों का स्पष्ट बंटवारा सुनिश्चित करती है।



