नयी दिल्ली/बेंगलुरु. कांग्रेस अध्यक्ष पद की दौड़ में मल्लिकार्जुन खड़गे, शशि थरूर और के. एन. त्रिपाठी आगे आये हैं जिसके लिए शुक्रवार को नामांकन का अंतिम दिन है. तीनों ही नेताओं ने अपने अपने नामांकन पत्र दाखिल कर दिए हैं और कर्नाटक से ताल्लुक रखने वाले वरिष्ठ नेता खड़गे स्पष्ट रूप से पसंदीदा उम्मीदवार के तौर पर उभरे हैं.
खड़गे (80) ने कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के साथ नामांकन पत्रों के अनेक सेट जमा किये. उनके प्रस्तावकों में आनंद शर्मा, पृथ्वीराज चव्हाण, मनीष तिवारी और भूपेंद्र हुड्डा जैसे नेता शामिल रहे जो पार्टी में बदलाव की मांग उठाने वाले नेताओं के समूह जी-23 में शामिल हैं. थरूर स्वयं जी-23 में शामिल रहे हैं. उन्होंने नामांकन पत्रों के पांच सेट दाखिल किये, वहीं झारखंड के पूर्व मंत्री त्रिपाठी ने कांग्रेस के केंद्रीय चुनाव प्राधिकरण के अध्यक्ष मधुसूदन मिस्त्री के समक्ष नामांकन पत्र दाखिल किये.
कांग्रेस अध्यक्ष पद की दौड़ में खड़गे पसंदीदा उम्मीदवार माने जा रहे हैं और यहां एआईसीसी मुख्यालय में उनके नामांकन पत्र दाखिल करते समय पार्टी के अनेक नेता साथ थे. खड़गे ने यहां संवाददाताओं से कहा, ‘‘मैं हमेशा वंचितों के हक की लड़ाई लड़ता रहा हूं और मैं कांग्रेस पार्टी के सिद्धांतों को कायम रखने के लिए और अधिक संघर्ष को तैयार हूं जिसके साथ मैं बचपन से जुड़ा हूं.’’ थरूर (66) ने चुनाव में अपने प्रतिद्वंद्वी खड़गे को पार्टी का ‘भीष्म पितामह’ करार दिया.
उन्होंने नामांकन पत्र दाखिल करने के बाद कहा, ‘‘भारत की एकमात्र ऐसी पार्टी की सेवा करना सम्मान की बात है जो अपने नेता का चुनाव खुली लोकतांत्रिक प्रक्रिया से करती है.’’ तिरुवनंतपुरम से लोकसभा सदस्य थरूर ने संवाददाताओं से कहा, ‘‘यह मैत्री मुकाबला होने जा रहा है. हम दुश्मन या प्रतिद्वंद्वी नहीं हैं. उनके (खड़गे के) प्रति किसी तरह का असम्मान नहीं बरता जाएगा लेकिन मैं अपने विचारों को प्रस्तुत करुंगा.’’
कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए नामांकन दाखिल करने का आज अंतिम दिन है. चुनाव के लिए मतदान 17 अक्टूबर को होगा और इसके परिणाम 19 अक्टूबर को घोषित किए जाएंगे. इसमें 9,100 प्रतिनिधियों को मताधिकार प्राप्त है. चुनाव के लिए आज जब उम्मीदवारों ने नामांकन पत्र दाखिल किए तब कांग्रेस मुख्यालय में गांधी परिवार से कोई भी मौजूद नहीं था.
गांधी परिवार के विश्वस्त खड़गे के रूप में कर्नाटक दे सकता है दूसरा कांग्रेस अध्यक्ष
अपने गृह राज्य कर्नाटक में ‘सोलिल्लादा सरदारा’ (कभी नहीं हारने वाला नेता) के रूप में मशहूर मापन्ना मल्लिकार्जुन खड़गे ने शुक्रवार को कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव के लिए नामांकन पत्र दाखिल किया. खड़गे गांधी परिवार के बहुत अधिक विश्वस्त माने जाते हैं.
यदि खड़गे चुनाव जीतते हैं, तो वह अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) के अध्यक्ष बनने वाले एस निजांिलगप्पा के बाद कर्नाटक के दूसरे नेता होंगे. जीतने पर वह जगजीवन राम के बाद इस पद पर आसीन होने वाले दूसरे दलित नेता भी होंगे. लगातार नौ बार विधायक चुने गये खड़गे 50 साल से अधिक समय से राजनीति में सक्रिय हैं. 80 वर्षीय खड़गे के सियासी सफर का ग्राफ उत्तरोत्तर चढ़ाव दिखाता है. उन्होंने अपना सियासी सफर गृह जिले गुलबर्ग (कलबुर्गी) में एक यूनियन नेता के रूप में किया.
वर्ष 1969 में वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए और गुलबर्ग शहरी कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बने.
चुनावी मैदान में खड़गे अजेय रहे और वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने कर्नाटक (खासकर हैदराबाद-कर्नाटक क्षेत्र)को अपने चपेट में लेने वाली नरेंद्र मोदी लहर के बावजूद गुलबर्ग से 74 हजार मतों के अंतर से जीत हासिल की. उन्होंने वर्ष 2009 में लोकसभा चुनाव के मैदान में कूदने से पहले गुरुमितकल विधानसभा चुनाव से नौ बार जीत दर्ज की. वह गलुबर्ग से दो बार लोकसभा सदस्य रहे.
हालांकि, वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में खड़गे को भाजपा नेता उमेश जाधव के हाथों गुलबर्ग में 95,452 मतों से हार का सामना करना पड़ा. खड़गे के कई दशकों के सियासी सफर में यह उनकी पहली हार थी. खड़गे ने कर्नाटक विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका निभाने के अलावा वर्ष 2008 के विधानसभा चुनाव में केपीसीसी प्रमुख के रूप में काम किया.
लोकसभा में वर्ष 2014 से 2019 तक खड़गे कांग्रेस पार्टी के नेता रहे, हालांकि वह लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता नहीं बन सके क्योंकि कांग्रेस सांसदों की संख्या सदन की कुल संख्या की 10 प्रतिशत से कम थी. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार में खड़गे ने केंद्रीय कैबिनेट मंत्री के रूप में श्रम एवं रोजगार, रेलवे और सामाजिक न्याय एवं सशक्तिकरण विभाग संभाला. जून, 2020 में उन्हें कर्नाटक से राज्यसभा के लिए निर्विरोध निर्वाचित किया गया और वह फिलहाल उच्च सदन में विपक्ष के 17वें नेता हैं, उन्होंने पिछले साल फरवरी में गुलाम नबी आजाद की जगह ली.
जब कभी कर्नाटक में उनको दावेदार के रूप में पेश करके दलित मुख्यमंत्री की बात उठी तो उन्होंने कई बार कहा, ‘‘आप क्यों बार-बार दलित कहते रहते हैं? ऐसा मत कहिये. मैं एक कांग्रेसी हूं. ’’ मिजाज और प्रकृति से सौम्य खड़गे कभी किसी बड़ी राजनीतिक समस्या या विवाद में नहीं फंसे. बीदर के वारावट्टी में एक गरीब परिवार में जन्मे खड़गे ने स्कूली पढ़ाई के अलावा स्रातक और वकालत की पढ़ाई गुलबर्ग में की.
राजनीति में आने से पहले वह वकालत के पेशे में थे. वह बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं और गुलबर्ग के बुद्ध विहार परिसर में निर्मित सिद्धार्थ विहार ट्रस्ट के संस्थापक हैं. 13 मई, 1968 को उन्होंने राधाबाई से विवाह रचाया और दोनों के दो पुत्रियां और तीन बेटे हैं. उनके एक बेटे प्रियांक खड़गे विधायक हैं और पूर्व मंत्री रहे हैं.
शशि थरूर : अपनी शर्तों पर चलने वाला मुखर नेता
तिरुवनंतपुरम से सांसद शशि थरूर ने शुक्रवार को कांग्रेस के अध्यक्ष पद के चुनाव के लिए नामांकन दाखिल कर यह दिखा दिया कि वह कोई ‘क्वॉकरवोजÞर’ नहीं हैं. ‘क्वॉकरवोजÞर’ थरूर का ही ईजाद किया गया एक शब्द है, जिसका अर्थ एक प्रभावशाली तीसरे पक्ष के इशारों पर काम करने वाला व्यक्ति होता है.
बेस्टसेलर किताबों के लेखक, संयुक्त राष्ट्र के पूर्व राजनयिक और 83 लाख से अधिक फॉलोअर के साथ सोशल मीडिया की सबसे लोकप्रिय हस्तियों में शुमार थरूर ने वास्तव में यह साबित किया है कि वह किसी ‘क्वॉकरवोजÞर’ (कठपुतली के लिए प्रयुक्त राजनीतिक शब्दावली) के बिल्कुल विपरीत हैं और स्वतंत्र सोच वाले एक ऐसे व्यक्ति हैं, जो अपनी शर्तों पर चलता है.
जब कांग्रेस के अध्यक्ष पद की दौड़ में शामिल होने वाले संभावित चेहरों को लेकर अटकलों का बाजार गर्म था और पार्टी के उनके ज्यादातर सहयोगी विचार-विमर्श और मंथन की प्रक्रिया में जुटे थे, तब थरूर पहले ऐसे नेता के रूप में सामने आए, जिसने यह चुनाव लड़ने की घोषणा की. 66 वर्षीय थरूर ने शुक्रवार को नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि पर कांग्रेस के केंद्रीय चुनाव प्राधिकारी मधुसूदन मिस्त्री के कार्यालय में गांधी परिवार के वर्चस्व वाली पार्टी के शीर्ष पद के लिए होने वाले चुनाव के वास्ते अपना नामांकन दाखिल किया.
थरूर फिलहाल कांग्रेस में एक बागी नेता के रूप में देखे जाते हैं. वह 2020 में पार्टी संगठन में बड़े पैमाने पर सुधार की मांग को लेकर सोनिया गांधी को पत्र लिखने वाले ‘जी-23’ समूह के नेताओं में शामिल हैं. कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में थरूर का मुकाबला मल्लिकार्जुन खड़गे से है, जिन्हें बड़े पैमाने पर वरिष्ठ नेताओं का समर्थन हासिल होने की खबरें हैं और जिनकी जीत की संभावना काफी अधिक मानी जा रही है.
थरूर ने ‘पीटीआई-भाषा’ को दिए विशेष साक्षात्कार में कहा, ‘‘कांग्रेस सब कुछ ठीक करने में जितना ज्यादा समय लेगी, हमारे पारंपरिक वोट बैंक के लगातार खिसकने और उसके हमारे राजनीतिक प्रतिर्स्पिधयों की ओर आर्किषत होने का जोखिम उतना ही अधिक रहेगा.’’ उन्होंने कहा, ‘‘यही कारण है कि मैं लंबे समय से पार्टी के भीतर निष्पक्ष एवं पारदर्शी चुनाव कराने का मुखर समर्थक रहा हूं, जिसमें अध्यक्ष पद का चुनाव भी शामिल है.’’ थरूर के पेशेवर सफर पर करीबी नजर रखने वाले लोग दो बात कहते हैं—वह अप्रत्याशित कदम उठाने से नहीं हिचकिचाते और अपने समक्ष मौजूद बाधाओं से विचलित हुए बिना लड़ाई लड़ने को तैयार रहते हैं.
1956 में लंदन में जन्मे थरूर ने दिल्ली के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफंस कॉलेज से अर्थशास्त्र में स्रातक किया था. वह सेंट स्टीफंस कॉलेज के छात्र संघ के अध्यक्ष भी थे. उन्होंने अमेरिका के मेडफोर्ड स्थित फ्लेचर स्कूल आॅफ लॉ एंड डिप्लोमेसी से स्रातकोत्तर की पढ़ाई पूरी करने के बाद 1978 में वहां से पीएचडी की डिग्री हासिल की.
थरूर ने राजनीतिक रूढ़िवादिता को तोड़ते हुए संयुक्त राष्ट्र में एक सफल राजनयिक के रूप में पहचान बनाई. संयुक्त राष्ट्र में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने शीत युद्ध के बाद शांति बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई और महासचिव के वरिष्ठ सलाहकार के अलावा संचार और सार्वजनिक सूचना के लिए अवर-महासचिव के रूप सेवाएं दीं.
2006 में थरूर को संयुक्त राष्ट्र के महासचिव पद के लिए हुए चुनाव में भारत के आधिकारिक उम्मीदवार के रूप में चुना गया था. इस चुनाव में दक्षिण कोरियाई राजनयिक बान की मून ने जीत दर्ज की थी और थरूर कुल सात उम्मीदवारों में दूसरे स्थान पर रहे थे.
बड़ी बाधाओं से विचलित हुए बिना कड़ी लड़ाई लड़ने का थरूर का जज्बा पहली बार इसी चुनाव में प्रर्दिशत हुआ था. तीन साल बाद वह एक अंतरराष्ट्रीय सिविल सेवक के रूप में सेवानिवृत्त हुए और 2009 में सक्रिय राजनीति में कदम रखते हुए कांग्रेस के टिकट पर पहली बार तिरुवनंतपुरम से सांसद चुने गए.
थरूर का सियासी सफर भले ही 53 साल की उम्र में शुरू हुआ था, लेकिन लोकसभा चुनाव जीतने के बाद उन्हें एक राजनेता के रूप में लंबी छलांगें लगाईं. कांग्रेस की केरल इकाई के कुछ नेताओं ने थरूर को बाहरी बताते हुए उनकी उम्मीदवारी का विरोध किया था. हालांकि, थरूर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी पर बड़े अंतर से जीत दर्ज करने में कामयाब रहे थे.
उन्हें कांग्रेस नीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार में केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री नियुक्त किया गया था.
थरूर राजनीतिक चर्चाओं के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने की कला में माहिर हैं. साल 2013 तक वह ट्विटर पर भारत के सबसे ज्यादा फॉलो किए जाने वाले नेता थे. इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्विटर पर सबसे ज्यादा फॉलो किए जाने वाले नेता के रूप में थरूर की जगह ले ली.
थरूर एक मुखर नेता के रूप में पहचाने जाते हैं, जो अक्सर अपनी राजनीतिक गतिविधियों और ऐसे शब्दों के इस्तेमाल के कारण सुर्खियों में रहता है, जिसका अर्थ समझने के लिए शब्दकोष का सहारा लेना पड़ता है. वह गाहे-बगाहे विवादों से भी घिरे रहते हैं.
मिसाल के तौर पर 2009 में अपने राजनीतिक करियर के शुरुआती दिनों में थरूर ने हवाई यात्रा के संबंध में ‘कैटल क्लास’ टिप्पणी की थी, जिसके लिए उन्हें माफी भी मांगनी पड़ी थी. थरूर पर मंत्री पद पर रहते हुए केरल के कोच्चि शहर की एक क्रिकेट टीम में संदिग्ध दिलचस्पी रखने का आरोप भी लगाया गया था. उन्होंने अप्रैल 2010 में केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था.
जनवरी 2014 में थरूर के निजी जीवन में एक दुखद मोड़ आया, जब उनकी पत्नी सुनंदा पुष्कर दिल्ली के एक लक्जरी होटल के एक कमरे में संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाई गई थीं. दंपति होटल में ठहरे थे, क्योंकि उस समय थरूर के आधिकारिक बंगले का नवीनीकरण किया जा रहा था.
बाद में दिल्ली पुलिस ने थरूर के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498ए (एक महिला के पति या उसके पति के रिश्तेदार द्वारा उसके साथ क्रूरता करना) और 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत आरोप तय किए थे. हालांकि, पिछले साल दिल्ली की एक अदालत ने उन्हें इस मामले में बरी कर दिया.
2014 में पत्नी की मौत के दुख से गुजर रहे थरूर ने तिरुवनंतपुरम से दूसरी बार लोकसभा चुनाव जीता. हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लहर के बीच इस चुनाव में उनकी जीत का अंतर 2009 के 99,998 मतों से घटकर 15,000 वोटों से कुछ अधिक रह गया था.
2019 में उन्होंने अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उम्मीदवार कुम्मनम राजशेखरन को 99,989 मतों के अंतर से हराकर लगातार तीसरी बार तिरुवनंतपुरम सीट पर जीत दर्ज की.
जुलाई 2020 में थरूर के खाते में तिरुवनंतपुरम लोकसभा क्षेत्र का सबसे लंबे समय तक प्रतिनिधित्व करने का रिकॉर्ड जुड़ गया. उन्होंने कांग्रेस के ए चार्ल्स का रिकॉर्ड तोड़ते हुए यह उपलब्धि हासिल की, जिन्होंने 1984 से 1991 के बीच 4,047 दिन तिरुवनंतपुरम लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया था. एक सक्रिय सांसद और सदन के सर्वश्रेष्ठ वक्ताओं में शुमार थरूर संसद की विदेश मामलों की स्थायी समिति के अध्यक्ष भी रह चुके हैं. वह वर्तमान में सूचना एवं प्रौद्योगिकी और संचार से जुड़े संसदीय पैनल के अध्यक्ष हैं.
बहरहाल, ऐसी चर्चा हैं कि सरकार ने कांग्रेस से इस संसदीय पैनल की अध्यक्षता वापस लेने का फैसला कर लिया है.
हमेशा अपने मन की बात जाहिर करने के लिए जाने जाने वाले थरूर ने समय-समय पर दोहराया है कि पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को जी-23 समूह के नेताओं द्वारा भेजे गए पत्र का हस्ताक्षरकर्ता होने का उनका एकमात्र मकसद पार्टी संगठन में सुधार लाना है.
हालांकि, पार्टी के कई नेताओं ने उन्हें बागी के तौर लिया है और गांधी परिवार के कुछ वफादारों ने उन पर समय-समय पर निशाना साधा है. थरूर एक प्रतिष्ठित लेखक भी रहे हैं और उन्होंने ‘द ग्रेट इंडियन नॉवेल’, ‘एन एरा आॅफ डार्कनेस’, ‘व्हाई आई एम अ ंिहदू’ और ‘द पैराडॉक्सिकल प्राइम मिनिस्टर’ सहित लगभग 23 लोकप्रिय किताबें लिखी हैं.
उन्होंने कई प्रतिष्ठित पुरस्कार और सम्मान भी हासिल किए हैं, जिनमें ‘द ग्रेट इंडियन नॉवेल’ के लिए यूरेशियन क्षेत्र में वर्ष की सर्वश्रेष्ठ पुस्तक के लिए राष्ट्रमंडल लेखक पुरस्कार, स्पेन के महाराजा का कमांडर आॅफ द आॅर्डर आॅफ चार्ल्स तृतीय सम्मान, ‘एन एरा आॅफ डार्कनेस’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार और फ्रांस का शेवेलियर दि ला लीजियन दि’आॅनर शामिल है. कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में थरूर की संभावनाओं का सार उर्दू शायर मजरूह सुल्तानपुरी की इन पंक्तियों ‘मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंजिल… मगर लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया’ में छिपा हुआ है, जो उन्होंने (थरूर ने) बीते हफ्ते खुद ट्वीट की थीं.