मानवाधिकार की रक्षा के लिए केंद्र सरकार ने उठाया महत्वपूर्ण कदम : उपराष्ट्रपति धनखड़

Author: Yogesh Kumar Sahu
UPDATED: Wed, 12 Oct 2022 07:55 PM
मानवाधिकार की रक्षा के लिए केंद्र सरकार ने उठाया महत्वपूर्ण कदम : उपराष्ट्रपति धनखड़
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नयी दिल्ली. उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने बुधवार को कहा कि किसी भी तरह के विस्तार व विशेषकर भौगोलिक सीमाओं के विस्तार में मानवाधिकारों का उल्लंघन शामिल होता है और एक राष्ट्र के तौर पर भारत कभी इस तरह की नीति में विश्वास नहीं करता है. यहां राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के स्थापना दिवस कार्यक्रम में अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि भारतीय लोकाचार ऐसा है कि देश की ंिचता सिर्फ अपने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह पूरी दुनिया की परवाह करता है.

धनखड़ ने कहा, ‘‘ऐसा कोई देश नहीं है जो हमारे इस रिकॉर्ड की बराबरी कर सके.’’ उन्होंने कहा, ‘‘एक राष्ट्र के तौर पर हमने कभी विस्तारवादी नीति में विश्वास नहीं किया है. विशेषकर भौगोलिक सीमाओं में किसी भी तरह के विस्तार में चरम स्तर पर मानवाधिकार उल्लंघन शामिल होता है. इस राष्ट्र (भारत) ने ऐसा कभी नहीं किया है.’’ अपने संबोधन में उपराष्ट्रपति ने इस बात पर भी जोर दिया कि एक अवधारणा के तौर पर मानवाधिकार को केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गरिमा के संरक्षण के सीमित अर्थ में नहीं समेटा जा सकता है. इन्हें व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझना होगा.

उन्होंने कहा, ‘‘जब मानवाधिकारों के हनन की बात आती है, तो हम तटस्थ होने का जोखिम नहीं उठा सकते, हमें पक्ष लेना होगा.’’ धनखड़ ने कहा, ‘‘तटस्थता उत्पीड़न करने वाले की मदद करती है, पीड़ित की कभी नहीं. वास्तव में, एक तटस्थ व्यक्ति उत्पीड़न करने वाले से शायद ही अलग होता है. मौन हमेशा अत्याचारी को प्रोत्साहित करता है, पीड़ित को कभी नहीं करता. ऐसे परिदृश्य में सक्रिय होने के अलावा कोई विकल्प नहीं है और हमें हस्तक्षेप करना चाहिए.’’ उन्होंने कहा कि एक फलते-फूलते लोकतंत्र के लिए मानवाधिकार सर्वोपरि हैं. मानवाधिकारों के अभाव में लोकतांत्रिक मूल्यों का कोई महत्व नहीं है. मानवाधिकारों का पोषण ‘‘सम्मान और गरिमापूर्ण मानव अस्तित्व का अमृत’’ है.

इस मौके पर एनएचआरसी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) अरुण कुमार मिश्रा, उच्चतम न्यायालय के कई न्यायाधीश, राजनयिक और संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों के प्रतिनिधि मौजूद थे. पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल धनखड़ ने भी पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद की हिंसा पर एनएचआरसी की एक समिति की एक रिपोर्ट में जनवरी में की गई एक टिप्पणी का संदर्भ दिया कि राज्य में ‘‘कानून का शासन नहीं है और शासक का कानून’’ प्रचलित है.

उपराष्ट्रपति ने कहा कि इस दर्शन को केवल एक राज्य तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह दुनिया के किसी भी हिस्से में लागू हो सकता है जहां कानून का शासन न होकर शासक का कानून हो सकता है. उन्होंने कहा कि यह एक परिवार, कारखाने या किसी प्रतिष्ठान में हो सकता है. उन्होंने कहा कि कानून का शासन होना चाहिए न कि शासक का कानून. उपराष्ट्रपति ने कहा कि पारदर्शी और जवाबदेह तंत्र के प्रभावशाली विकास के साथ-साथ शासन में सुगमता ने हाल के दिनों में मानवाधिकारों के फलने-फूलने के लिए स्वस्थ वातावरण प्रदान किया है.

धनखड़ ने रेखांकित किया कि भ्रष्टाचार की स्थिति में मानवाधिकारों से ‘‘समझौता’’ होता है. उन्होंने कहा कि गरीब और कमजोर लोग इस खतरे के आसान शिकार हैं. उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार पर लगातार हमले इस दिशा में एक उज्ज्वल संकेत हैं और वस्तुत: ‘‘भ्रष्टाचार के खिलाफ युद्ध’’ चल रहा है. उपराष्ट्रपति ने अपने संबोधन में कहा कि वंश, राजनीतिक संबद्धता, जाति, पंथ या क्षेत्र के आधार पर भ्रष्ट लोगों की रक्षा नहीं की जा सकती.

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