भारत का इतिहास वीरता का रहा है लेकिन इसे जानबूझकर दबा दिया गया: प्रधानमंत्री

Author: Nandkishoryadav
UPDATED: Fri, 25 Nov 2022 06:14 PM
भारत का इतिहास वीरता का रहा है लेकिन इसे जानबूझकर दबा दिया गया: प्रधानमंत्री
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नयी दिल्ली. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुक्रवार को कहा कि भारत अपनी विरासत का जश्न मनाकर और औपनिवेशिक काल के दौरान साजिश के तहत लिखे गए इतिहास के पन्नों में खोए अपने गुमनाम बहादुरों को याद करके अपनी पिछली गलतियों को सुधार रहा है.
उन्होंने कहा कि भारत का इतिहास वीरता का रहा है लेकिन इसे जानबूझकर दबा दिया गया जबकि जरूरत, आजादी के बाद भारत को गुलाम बनाने वाले विदेशियों के एजेंडे को बदलने की थी.

मोदी यहां स्थित विज्ञान भवन में पूर्ववर्ती अहोम साम्राज्य के जनरल लचित बोड़फूकन की 400वीं जयंती पर साल भर आयोजित कार्यक्रमों के समापन समारोह को संबोधित कर रहे थे. उन्होंने कहा, ‘‘भारत का इतिहास सिर्फ गुलामी का इतिहास नहीं है. भारत का इतिहास योद्धाओं का इतिहास है, अत्याचारियों के विरूद्ध अभूतपूर्व शौर्य और पराक्रम दिखाने का इतिहास है. भारत का इतिहास वीरता की परंपरा का रहा है.’’

उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन दुर्भाग्य से हमें आजादी के बाद भी वही इतिहास पढ़ाया जाता रहा जो गुलामी के कालखंड में साजिशन रचा गया था. देश के कोने-कोने में भारत के सपूतों ने आतताइयों का मुकाबला किया लेकिन इस इतिहास को जानबूझकर दबा दिया गया.’’ प्रधानमंत्री ने कहा कि आजादी के बाद जरूरत थी कि गुलाम बनाने वाले विदेशियों के एजेंडे को बदला जाता, लेकिन ऐसा नहीं किया गया.

उन्होंने लचित बोड़फूकन की वीरता का उल्लेख करते हुए सवाल किया कि क्या उनका शौर्य मायने नहीं रखता और क्या देश की संस्कृति व पहचान के लिए मुगलों के खिलाफ युद्ध में लड़ने वाले असम के हजारों लोगों का बलिदान कोई मायने नहीं रखता? उन्होंने कहा, ‘‘हम सब जानते हैं कि अत्याचारों से भरे लंबे कालखंड में अत्याचारियों पर विजय की भी हजारों गाथाएं हैं. जय, त्याग और तर्पण की गाथाएं हैं. इन्हें इतिहास की मुख्यधारा में जगह ना देकर पहले जो गलती हुई, अब देश उसे सुधार रहा है.’’ मोदी ने कहा कि लचित बोड़फूकन की जयंती को मनाने के लिए दिल्ली में किया गया यह आयोजन इसी का प्रतिंिबब है.

प्रधानमंत्री ने कहा कि देश आज गुलामी की मानसिकता को छोड़ अपनी विरासत पर गर्व करने के भाव से भरा हुआ है और भारत ना सिर्फ अपनी सांस्कृतिक विविधता का उत्सव मना रहा है बल्कि अपनी संस्कृति के ऐतिहासिक नायक-नायिकाओं को भी गर्व से याद कर रहा है. मोदी ने कहा कि बोड़फकून ऐसे वीर योद्धा थे, जिन्होंने दिखा दिया कि हर आतंकी का अंत हो जाता है लेकिन भारत की अमर ज्योति अमर बनी रहती है.

उन्होंने कहा कि बोड़फूकन का जीवन देश के सामने उपस्थित कई वर्तमान चुनौतियों का डटकर सामना करने के साथ ही यह प्रेरणा भी देता है कि परिवारवाद, भाई-भतीजावाद नहीं, बल्कि देश सबसे बड़ा होना चाहिए. इससे पहले, प्रधानमंत्री ने बोड़फूकन की 400वीं जयंती के उपलक्ष्य में यहां लगाई गई प्रदर्शनी का भी अवलोकन किया. इस अवसर पर असम के मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा, राज्यपाल जगदीश मुखी और केन्द्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे.

ज्ञात हो कि लचित बोड़फूकन के 400वें जयंती वर्ष समारोह का उद्घाटन तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोंिवद ने इसी साल फरवरी में असम के जोरहाट में किया था. लचित बोड़फूकन असम के पूर्ववर्ती अहोम साम्राज्य में एक सेनापति थे. सरायघाट के 1671 के युद्ध में उनके नेतृत्व के लिए उन्हें जाना जाता है. इस युद्ध में औरंगजेब के नेतृत्व वाली मुगल सेना का असम पर कब्जा करने का प्रयास विफल कर दिया गया था. इस विजय की याद में असम में 24 नवंबर को लचित दिवस मनाया जाता है. सरायघाट का युद्ध गुवाहाटी में ब्रह्मपुत्र नदी के तटों पर लड़ा गया था.

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