नयी दिल्ली. दिल्ली उच्च न्यायालय ने मंगलवार को एक अंतरिम आदेश में आम आदमी पार्टी (आप) और उसके कई नेताओं को उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना के खिलाफ ‘‘मानहानिकारक’’ बयान देने से रोक दिया. अदालत ने उन्हें सोशल मीडिया पर सक्सेना के खिलाफ कथित अपमानजनक पोस्ट, वीडियो और ट्वीट हटाने का निर्देश देते हुए कहा कि उन्होंने बिना सोचे समझे इस प्रकार के बयान दिए.
उच्च न्यायालय ने कहा कि प्रथम दृष्टया ‘आप’ और उसके नेताओं के विभिन्न बयान, साक्षात्कार, संवाददाता सम्मेलन, ट्वीट या री-ट्वीट, हैशटैग अपने आप में मानहानिकारक हैं और उन्हें सक्सेना की छवि धूमिल करने के लिए बिना किसी तथ्य के लापरवाह तरीके से किया गया.
उपराज्यपाल ने ‘आप’, इसके नेताओं आतिशी ंिसह, सौरभ भारद्वाज, दुर्गेश पाठक, संजय ंिसह और जैस्मीन शाह को अपने और परिवार के खिलाफ सोशल मीडिया पर साझा किए गए ‘‘झूठे’’ व ‘‘मानहानिकारक’’ पोस्ट, ट्वीट या वीडियो हटाने का निर्देश देने की भी अपील की थी. उन्होंने ‘आप’ और उसके पांच नेताओं से ब्याज सहित 2.5 करोड़ रुपये के हर्जाने और मुआवजे की भी मांग की है.
‘आप’ के नेताओं ने आरोप लगाया था कि सक्सेना ने नवंबर 2016 में खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) का अध्यक्ष रहते हुए चलन से बाहर हो चुकी मुद्रा हासिल करके उसे नयी मुद्रा में परिर्वितत कराया था. ‘आप’ और इसके नेताओं ने उपराज्यपाल पर 1,400 करोड़ रुपये के कथित घोटाले में शामिल होने का आरोप लगाया था.
उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि संविधान का अनुच्छेद 19 (1) (ए) सभी व्यक्तियों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है, मगर इसमें अनुच्छेद 19 (2) भी है जिसके तहत कुछ पाबंदियां हैं, जिनमें मानहानि भी शामिल है. न्यायमूर्ति अमित बंसल ने कहा, ‘‘इसलिए, वाक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार एक निरंकुश अधिकार नहीं है, जिसकी आड़ में मानहानिकारक बयान देकर किसी व्यक्ति की छवि धूमिल की जा सके. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार से किसी की छवि को धूमिल नहीं की जानी चाहिए.’’
उच्च न्यायालय के फैसले से पूरी तरह से असहमत: आम आदमी पार्टी
आम आदमी पार्टी (आप) ने मंगलवार को कहा कि वह दिल्ली उच्च न्यायालय के उस अंतरिम आदेश से ‘पूरी तरह से असहमत’ है जिसके तहत पार्टी और उसके नेताओं को उपराज्यपाल वीके सक्सेना के खिलाफ किए गए कथित अपमानजनक पोस्ट, वीडियो और ट्वीट हटाने का निर्देश दिया गया है. साथ में पार्टी के नेताओं को सक्सेना के खिलाफ अन्य आरोप लगाने से भी रोक दिया गया है.
अरंिवद केजरीवाल नीत पार्टी ने कहा है कि वह अदालत के फैसले का अध्ययन करेगी, वकीलों से सलाह-मशविरे करेगी और फिर मामले पर अगला कदम उठाने पर निर्णय करेगी.
दिल्ली उच्च न्यायालय ने ‘आप’ और इसके कई नेताओं को उपराज्यपाल सक्सेना पर ‘‘झूठे’’ आरोप लगाने से बचने का मंगलवार को निर्देश दिया. साथ ही अदालत ने उन्हें सोशल मीडिया पर उपराज्यपाल के खिलाफ कथित अपमानजनक पोस्ट, वीडियो और ट्वीट हटाने के लिए भी कहा.
न्यायमूर्ति अमित बंसल ने अंतरिम राहत देते हुए कहा, ‘‘मैं वादी के पक्ष में फैसला सुनाता हूं…’’ विस्तृत आदेश की प्रतीक्षा की जा रही है.
‘आप’ के वरिष्ठ नेता दुर्गेश पाठक ने फैसले पर प्रतिक्रिया पूछने पर पत्रकारों से कहा, ‘‘ हम (अदालत के) आदेश से पूरी तरह और विनम्रता से असहमत हैं. हम इसका अध्ययन करेंगे, वकीलों के साथ इस पर चर्चा करेंगे और आपको अपने अगले कदम के बारे में बताएंगे.’’ राजेंद्र नगर से विधायक पाठक ‘आप’ की राजनीतिक मामलों की समिति के सदस्य हैं जो पार्टी में निर्णय लेने वाली सर्वोच्च संस्था है.
उपराज्यपाल ने अपने और परिवार के खिलाफ सोशल मीडिया पर साझा किए गए ‘‘झूठे’’ व ‘‘मानहानिकारक’’ पोस्ट, ट्वीट या वीडियो हटाने के लिए ‘आप’, इसके नेताओं आतिशी सिंह, सौरभ भारद्वाज, दुर्गेश पाठक, संजय सिंह और जैस्मीन शाह को निर्देश देने की भी अपील की थी.
‘आप’ नेताओं ने आरोप लगाया था कि सक्सेना ने नवंबर 2016 में खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) का अध्यक्ष रहते हुए बंद कर दिए गए 500 और 1000 रुपये के नोटों को नए नोटों में बदलवाने में अनिमियतता की थी. उन्होंने ‘आप’ और उसके पांच नेताओं से ब्याज सहित 2.5 करोड़ रुपये के हर्जाने और मुआवजे की भी मांग की है.