अग्निपथ योजना : बिहार में गहरे सामाजिक-आर्थिक प्रभाव का डर, ‘अग्निवीरों’ की शादी की संभावनाएं घटेंगी

नयी दिल्ली/पटना. अग्निपथ रक्षा भर्ती योजना ने बिहार में कई लोगों के मन में दूरगामी सामाजिक-आर्थिक प्रभावों की आशंकाओं को जन्म दिया है. उन्हें डर है कि इससे युवावस्था में सेवानिवृत्त हुए ‘अग्निवीरों’ की शादी की संभावनाएं प्रभावित होंगी. साथ ही युवा सेना की नौकरी से मिलने वाले आर्थिक-सामाजिक लाभ से वंचित रह जाएंगे.

उन्होंने कहा कि अग्निपथ योजना को लेकर आशंकाएं मुख्य रूप से इस तथ्य से उत्पन्न हुई हैं कि इसमें अनुबंध के आधार पर युवाओं की भर्ती करने और उनमें से अधिकतर को चार साल की सेवा के बाद बिना पेंशन या अन्य सामाजिक सुरक्षा लाभ के सेवानिवृत्त करने का प्रावधान है. तीन साल से सेना की नौकरी की तैयारी कर रहे बांका जिले के रामचुआ गांव निवासी रौशन सिंह (20) का कहना है कि उन्हें रक्षा भर्ती मॉडल में किए गए आमूल-चूल बदलाव रास नहीं आए.

सिंह ने अपने गांव से ‘पीटीआई-भाषा’ से फोन पर हुई बातचीत में कहा, ‘‘लेकिन मेरे पास कोई विकल्प नहीं है. मेरे माता-पिता के पास इतने पैसे नहीं हैं कि वे मुझे पढ़ाई और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने के लिए शहर भेज सकें.’’ उन्होंने कहा, ‘‘सीमित संसाधनों से भी सशस्त्र बलों में नौकरी की तैयारी की जा सकती है. वे दौड़ने और अन्य शारीरिक गतिविधियों से जुड़ी परीक्षा लेते हैं, जिसकी तैयारी आप गांव के मैदानों में कर सकते हैं.’’ अभी भी नौकरी की तैयारी कर रहे सिंह के दिमाग में खुद की शादी का ख्याल फिलहाल नहीं आया है, लेकिन जब उनसे पूछा गया कि क्या वह किसी ‘अग्निवीर’ से अपनी बहन की शादी कराने में सहज होंगे तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया. अलबत्ता फोन पर एक लंबी चुप्पी साध ली. चौदह जून को केंद्र सरकार द्वारा ‘अग्निपथ’ योजना की घोषणा करने के साथ ही बिहार में इसके खिलाफ विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए थे.

विरोध की आंच धीरे-धीरे उत्तर भारत के अधिकांश हिस्सों और फिर बाद में दक्षिणी क्षेत्रों में भी तेजी से फैल गई, लेकिन बिहार जितना उपद्रव कहीं नहीं हुआ. राज्य में पटना से लेकर आरा, बक्सर से लेकर जहानाबाद और सासाराम से लेकर तारेगना तक में आगजनी व तोड़फोड़ की घटनाएं दर्ज की गईं.

सेना में नौकरी के इच्छुक युवाओं ने रेलवे स्टेशनों पर हमला किया, ट्रेन के डिब्बों में आग लगाई, सत्तारूढ़ भारतीय जनता दल (भाजपा) के दफ्तरों को निशाना बनाया और बसों व कारों को आग के हवाले कर दिया. राज्य सरकार ने बिहार के एक-तिहाई हिस्से में इंटरनेट सेवाएं निलंबित करने का आदेश दिया. वहीं, रेलवे ने दो दिन के लिए अपनी सेवाएं बंद कर दीं. केंद्र सरकार ने तुरंत कुछ रियायतों की घोषणा की, लेकिन चार दिनों तक आंदोलन जारी रहा.

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन के नेता कुणाल ने यह समझाने की कोशिश की कि बिहार में इतने उग्र प्रदर्शन क्यों हुए. उन्होंने कहा कि बिहार एक ऐसा राज्य है, जहां बेरोजगारी दर (सेंटर फॉर मॉनिटंिरग इंडियन इकोनॉमी के अनुसार 13.3 प्रतिशत) राष्ट्रीय औसत (आठ प्रतिशत) से बहुत अधिक है और जहां समाज का अधिकांश हिस्सा अभी भी अपने बेटे और दामाद के लिए सरकारी नौकरी की चाह रखता है.

कुणाल ने कहा, ‘‘एक समय था, जब सशस्त्र बलों में ज्यादातर ऊंची जातियों और भोजपुरी बेल्ट के भोजपुर व छपरा जिले के लोग जाते थे. लेकिन, अब ऐसा नहीं है.’’ उन्होंने कहा, ‘‘हर जाति और क्षेत्र के युवा अब सेना में भर्ती हो रहे हैं. इसीलिए आपने इस योजना के खिलाफ हुए विरोध-प्रदर्शनों और दोनों बंद (18 जून को बिहार बंद और 20 जून को भारत बंद) को इतने बड़े पैमाने पर सामाजिक समर्थन मिलते देखा.’’ कुणाल के मुताबिक, छोटे और मध्यम आय वर्ग के किसान इस योजना से सबसे अधिक प्रभावित होंगे, क्योंकि वे अपने बच्चों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए बड़े शहरों या शिक्षण संस्थानों में भेजने का खर्च नहीं उठा सकते.

उन्होंने यह आशंका भी जताई कि अग्निपथ योजना के तहत भर्ती होने वाले युवाओं के लिए मुश्किल से शादी के प्रस्ताव आएंगे.
कुणाल ने कहा, ‘‘कोई अपनी बेटी या बहन की शादी भला एक असफल और अस्वीकृत सैनिक से क्यों करेगा, जिसे न तो पेंशन और न ही कोई सामाजिक सुरक्षा हासिल है? इस योजना का राज्य में बहुत गहरा सामाजिक और आर्थिक प्रभाव पड़ेगा.’’

बांका जिले के शीनू साल 2015 से सशस्त्र बलों में भर्ती होने के लिए तैयारी कर रहे हैं. अग्निपथ योजना के बारे में वह कहते हैं, ‘‘अगर मैं आपको ईमानदारी से बताऊं तो उन्होंने सही काम नहीं किया है.’’ शीनू के अनुसार, ‘‘सेना की नौकरी से मिलने वाला सम्मान खो गया है. मैंने अपने ही गांव में देखा है कि कैसे सेना की महज एक नौकरी ने परिवारों को पीढ़ियों से चली आ रही गरीबी से बाहर निकाला.’’

उन्होंने कहा, ‘‘पहले सशस्त्र बलों में नौकरी का मतलब था ‘जीवन सेट हो गया.’ न केवल व्यक्ति, बल्कि उसके बच्चों और बच्चों के बच्चों का भी. मतलब, उनकी आने वाली पीढ़ियों को सेना की महज एक नौकरी से फायदा मिल जाता था. पर अब यह संभव नहीं होगा.’’ शीनू के अनुसार, यह योजना राज्य की अन्य सामाजिक वास्तविकताओं के साथ भी तालमेल नहीं खाती है.

उन्होंने कहा, ‘‘यह एक नए सामाजिक समीकरण को जन्म देगा. पहले कन्या पक्ष सशस्त्र बलों में स्थायी नौकरी वाले दूल्हे की तलाश करता था. अब उन्हें ऐसे दूल्हे मिलेंगे, जो पहले ही सेना से सेवानिवृत्त हो चुके हैं.’’ शीनू ने कहा, ‘‘और ‘अग्निवीर’ बनने वाले हर व्यक्ति में चार साल बाद दूसरी नौकरी हासिल करने के लिए जरूरी प्रतिभा नहीं होगी. कोई भी अपनी बहन को खाई में नहीं धकेलना चाहेगा.’’ 38 वर्षीय रंजीत कुमार सिंह, जो एक सेवानिवृत्त सैनिक हैं और युवाओं को रक्षा बलों में भर्ती के लिए तैयार करने के वास्ते भागलपुर में एक अकादमी चलाते हैं, ने कहा कि इस योजना के कुछ ‘सकारात्मक’ पहलू भी हैं, लेकिन उनके छात्र इसे लेकर आश्वस्त नहीं हैं.

सिंह ने कहा कि पहले उनकी अकादमी के छात्रावास में 150 छात्र हुआ करते थे, लेकिन अब इस संख्या में भारी गिरावट आई है.
उन्होंने कहा, ‘‘अब बच्चों को प्रेरित करने की जरूरत है. उनका मनोबल गिर गया है. उन्हें प्रशिक्षण के लिए तैयार करने के लिए मुझे बहुत समझाने और भ्रम दूर करने की जरूरत पड़ेगी. मैं उन्हें बताता हूं कि चार साल बाद सेवानिवृत्त होने के बावजूद उनके पास रोजगार के कई अवसर उपलब्ध होंगे.’’

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