
नयी दिल्ली/दाहोद. उच्चतम न्यायालय ने गुजरात सरकार पर अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करने का आरोप लगाते हुए 2002 के दंगों के दौरान बिलकीस बानो से सामूहिक दुष्कर्म और उनके परिवार के सात सदस्यों की हत्या के मामले में 11 दोषियों को सजा में छूट देने के राज्य सरकार के फैसले को सोमवार को रद्द कर दिया और दोषियों को दो सप्ताह के अंदर जेल भेजने का निर्देश दिया.
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्ल भुइयां की पीठ ने कहा कि सजा में छूट का गुजरात सरकार का आदेश बिना सोचे समझे पारित किया गया और पूछा कि क्या ”महिलाओं के खिलाफ जघन्य अपराध के मामलों में सजा में छूट की अनुमति है”, चाहे वह महिला किसी भी धर्म या पंथ को मानती हो. उच्चतम न्यायालय के आदेश पर बानो के कुछ रिश्तेदारों ने दाहोद जिले के देवगढ. बारिया में पटाखे चलाए.
शीर्ष अदालत ने मामले पर अपने 251 पन्नों के फैसले में कहा कि बिना सोचे समझे सजा माफी का आदेश दिया गया. फैसले का पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, कांग्रेस नेता राहुल गांधी और एआईएमआईएम के असदुद्दीन ओवैसी ने स्वागत किया. घटना के वक्त बिलकीस बानो 21 साल की थीं और पांच माह की गर्भवती थीं. बानो से गोधरा ट्रेन अग्निकांड के बाद 2002 में भड़के दंगों के दौरान दुष्कर्म किया गया था. दंगों में मारे गए उनके परिवार के सात सदस्यों में उनकी तीन साल की बेटी भी शामिल थी.
गुजरात सरकार ने इस मामले के सभी 11 दोषियों को सजा में छूट देकर 15 अगस्त, 2022 को रिहा कर दिया था. न्यायालय ने कहा कि गुजरात सरकार को छूट का आदेश पारित करने का अधिकार नहीं था. उसने स्पष्ट किया कि जिस राज्य में अपराधी पर मुकदमा चलता है और सजा सुनाई जाती है, उसे दोषियों की माफी की याचिका पर फैसले का अधिकार होता है. दोषियों पर महाराष्ट्र में मुकदमे की कार्यवाही संचालित हुई थी.
पीठ ने कहा, ”कानून के शासन का उल्लंघन हुआ क्योंकि गुजरात सरकार ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया. इस आधार पर भी माफी के आदेश को रद्द किया जाना चाहिए.” पीठ ने कहा, ”शीर्ष अदालत के 13 मई, 2022 के आदेश का लाभ उठाते हुए अन्य दोषियों ने भी सजा में छूट के लिये अर्जी दायर की… गुजरात (सरकार) की इसमें मिलीभगत थी और उसने इस मामले में प्रतिवादी संख्या तीन (दोषियों में से एक) के साथ मिलकर काम किया. तथ्यों को छिपाकर अदालत को गुमराह किया गया.”
शीर्ष अदालत ने यह भी माना कि संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत बिलकीस बानो द्वारा सजा में छूट को चुनौती देने के लिये दायर जनहित याचिका विचारणीय है. अनुच्छेद 32 के अनुसार, ”यह एक मौलिक अधिकार है, जिसमें कहा गया है कि व्यक्तियों को संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त अन्य मौलिक अधिकारों को लागू कराने के लिए उच्चतम न्यायालय (एससी) से संपर्क करने का अधिकार है.” न्यायमूर्ति नागरत्ना ने यूनानी दार्शनिक प्लेटो के कथन का जिक्र करते हुए कहा, ”दंड प्रतिशोध के लिए नहीं, बल्कि रोकथाम और सुधार के लिए दिया जाना चाहिए, क्योंकि जो हो चुका है, उसे पूर्ववत नहीं किया जा सकता है.”
प्लेटो ने कहा है कि दंड देने वाले को, जहां तक हो सके उस चिकित्सक की तरह काम करना चाहिए, जो केवल दर्द के लिए नहीं, बल्कि रोगी का भला करने के लिए दवा देता है. सजा के इस उपचारात्मक सिद्धांत में दंड की तुलना दंडित किए जाने वाले व्यक्ति की भलाई के लिए दी जाने वाली दवा से की गई है.
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि पीड़िता के अधिकार भी महत्वपूर्ण हैं. उन्होंने कहा, ”एक महिला सम्मान की हकदार है, भले ही उसे समाज में कितना भी ऊंचा या नीचा माना जाए या वह किसी भी धर्म या पंथ को मानती हो.” उन्होंने कहा, ”क्या महिलाओं के खिलाफ जघन्य अपराध के मामलों में सजा में छूट दी जा सकती है? ये ऐसे मुद्दे हैं, जो पैदा होते हैं.” फैसले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए सेवानिवृत्त आईपीएस (भारतीय पुलिस सेवा) अधिकारी मीरान चड्ढा बोरवंकर और अन्य की ओर से पेश हुईं वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने इसे बहुत अच्छा फैसला बताया.
ग्रोवर ने संवाददाताओं से कहा, ”…(इस फैसले ने) कानून के शासन और इस देश के लोगों विशेष रूप से महिलाओं की कानूनी प्रणाली, अदालतों में आस्था को बरकरार रखा है और न्याय का आश्वासन दिया है.” दाहोद के देवगढ. बारिया में मामले के गवाहों में से एक अब्दुल रजाक मंसूरी ने संवाददाताओं से कहा, ”मैं इस मामले में एक गवाह हूं. इन 11 दोषियों को महाराष्ट्र की एक अदालत ने सजा सुनाई थी. उन्हें रिहा करने का गुजरात सरकार का फैसला गलत था. इसलिए हमने उसे अदालत में चुनौती दी थी.”
उन्होंने कहा, ”मुझे खुशी है कि उच्चतम न्यायालय ने गुजरात सरकार के फैसले को खारिज कर दिया है और दोषियों को आत्मसमर्पण करने को कहा है. मुझे लगता है कि हमें आज न्याय मिला है.” फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए भारत राष्ट्र समिति की नेता के. कविता, नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला और अन्य नेताओं ने भी इसका स्वागत किया.
बिलकीस बानो मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसले के मुख्य बिंदु
बिलकीस बानो के साथ सामूहिक बलात्कार और उनके परिवार के सात सदस्यों की हत्या के मामले में 11 दोषियों को सजा से छूट देने के गुजरात सरकार के फैसले को रद्द करने वाले उच्चतम न्यायालय के सोमवार को सुनाए गए आदेश के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं :
1. बिलकीस बानो द्वारा संविधान के अनुच्छेद-32 के तहत उच्चतम न्यायालय में दायर रिट याचिका विचारणीय है. बिलकीस बानो के लिए उच्च न्यायालय का रुख करना अनिवार्य नहीं था.
2. चूंकि पीड़िता द्वारा दायर की गई रिट याचिका पर हमारे द्वारा विचार किया गया है, सजा में छूट को चुनौती देने वाली जनहित याचिका के रूप में दायर की गई रिट याचिकाएं विचारणीय हैं.
3. दोषियों की सजा माफ करने के अनुरोध वाली अपीलों पर विचार करना गुजरात सरकार के अधिकार क्षेत्र में नहीं था क्योंकि यह सीआरपीसी की धारा 432 के तहत (इस संबंध में फैसले लेने के लिए) उपयुक्त सरकार नहीं थी.
4. शीर्ष अदालत ने सजा में छूट पाए दोषियों में से एक की याचिका पर गुजरात सरकार को विचार करने का निर्देश देने वाली अपनी एक अन्य पीठ के 13 मई, 2022 के आदेश को ‘अमान्य’ माना.
5. सजा में छूट का गुजरात सरकार का आदेश बिना सोचे समझे पारित किया गया.
6. गुजरात सरकार ने महाराष्ट्र राज्य की शक्तियों में ”अतिक्रमण” किया क्योंकि केवल महाराष्ट्र सरकार ही सजा से छूट मांगने वाले आवेदनों पर विचार कर सकती थी.
7. गुजरात राज्य की 9 जुलाई 1992 की सजा से छूट संबंधी नीति मौजूदा मामले के दोषियों पर लागू नहीं होती.
8. बिलकीस बानो मामले में समय से पहले रिहाई के लिए शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाने वाले एक दोषी के साथ गुजरात सरकार की मिलीभगत थी.
9. न्यायपालिका कानून के शासन की संरक्षक और एक लोकतांत्रिक राज्य का केंद्रीय स्तंभ है.
10. कानून के शासन का मतलब केवल कुछ ”भाग्यशाली” लोगों की सुरक्षा करना नहीं है.
11. संविधान के अनुच्छेद 142 को उच्चतम न्यायालय द्वारा दोषियों के पक्ष में जेल से बाहर रहने की अनुमति देने के लिए लागू नहीं किया जा सकता है.
बिलकीस मामले में सजा संबंधी छूट पर पिछला फैसला ‘धोखाधड़ी से’ प्राप्त किया गया: न्यायालय
उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को शीर्ष अदालत की एक अन्य पीठ के 13 मई, 2022 के फैसले को अमान्य करार दिया, जिसने गुजरात सरकार को बिलकीस बानो सामूहिक बलात्कार मामले और उनके परिवार के सात सदस्यों की हत्या के 11 दोषियों की सजा माफी के आवेदन पर विचार करने का निर्देश दिया था. शीर्ष अदालत ने कहा कि इस फैसले को ”अदालत के साथ धोखाधड़ी करके” प्राप्त किया गया था.
न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी (अब सेवानिवृत्त) और न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की पीठ ने 13 मई, 2022 के अपने फैसले में गुजरात सरकार से 9 जुलाई, 1992 की अपनी माफी नीति के संदर्भ में समय से पहले रिहाई के लिए दोषी राधेश्याम शाह की याचिका पर विचार करने को कहा था. पीठ ने कहा था कि जिस राज्य में अपराध हुआ था उसकी सरकार को आवेदन पर निर्णय लेने का अधिकार है. शीर्ष अदालत ने सोमवार को कहा कि शाह ने शुरुआत में 2019 में गुजरात उच्च न्यायालय से माफी के अपने आवेदन पर विचार करने का निर्देश देने के लिए संपर्क किया था.
इसने कहा, ”17 जुलाई, 2019 के आदेश द्वारा उच्च न्यायालय ने यह कहते हुए आपराधिक आवेदन का निपटारा कर दिया कि उन्हें महाराष्ट्र राज्य की सरकार से संपर्क करना चाहिए. गुजरात उच्च न्यायालय के समक्ष उनका दूसरा ऐसा आवेदन भी 2020 में खारिज कर दिया गया था.” उच्चतम न्यायालय ने कहा कि शाह ने बाद में शीर्ष अदालत का रुख किया, लेकिन यह खुलासा नहीं किया कि उन्होंने 17 जुलाई, 2019 के आदेश के 14 दिन के भीतर, माफी के लिए अपने आवेदन के साथ महाराष्ट्र सरकार से संपर्क किया था और सीबीआई तथा विशेष न्यायाधीश (सीबीआई), मुंबई ने उनके मामले में नकारात्मक सिफारिश की थी.
पीठ ने कहा, ”इस प्रकार, भौतिक पहलुओं को दबाकर और इस न्यायालय को गुमराह करके, प्रतिवादी राज्य गुजरात को माफी नीति के आधार पर रिट याचिकाकर्ता यानी प्रतिवादी संख्या 3 की समय पूर्व रिहाई या माफी पर विचार करने के लिए एक निर्देश जारी करने की मांग की गई थी और यह जारी किया गया था.”
बिलकीस बानो मामले में न्यायालय ने कहा: एक दोषी के साथ मिलीभगत थी गुजरात सरकार की
उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि बिलकीस बानो मामले में समय से पहले रिहाई के लिए शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाने वाले एक दोषी के साथ गुजरात सरकार की मिलीभगत थी . न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा कि उसे समझ नहीं आ रहा कि गुजरात सरकार ने 13 मई, 2022 के उस फैसले के खिलाफ पुर्निवचार याचिका दाखिल क्यों नहीं की जिसमें गुजरात सरकार को एक कैदी की समय पूर्व रिहाई की याचिका पर राज्य की 9 जुलाई, 1992 की नीति के अनुरूप विचार करने का निर्देश दिया गया था.
गुजरात सरकार ने 1992 में माफी की नई नीति जारी की थी जिसके तहत जेल परामर्श बोर्ड की अनुकूल राय पर उन दोषियों की याचिकाओं पर विचार किया जा सकता है जिन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई हो और जो कम से कम 14 साल कारावास की सजा काट चुके हों.
पीठ ने कहा, ”इस अदालत के 13 मई, 2022 के आदेश का लाभ उठाते हुए अन्य दोषियों ने भी माफी के लिए आवेदन दाखिल किए और गुजरात सरकार ने माफी आदेश जारी कर दिया. गुजरात की संलिप्तता थी और उसने इस मामले में प्रतिवादी संख्या 3 (दोषी राधेश्याम शाह) के साथ मिलकर काम किया. गुजरात द्वारा सत्ता का उपयोग राज्य द्वारा सत्ता को हड़पने के समान था.”
दोषियों की सजा में छूट को चुनौती देने वाली बिलकीस बानो की याचिका विचारणीय : उच्चतम न्यायालय
उच्चतम न्यायालय ने गुजरात में 2002 के सांप्रदायिक दंगों के दौरान सामूहिक बलात्कार की शिकार बिलकीस बानो की ओर से राज्य सरकार द्वारा मामले में 11 दोषियों को सजा माफी के फैसले के खिलाफ दायर जनहित याचिका को सोमवार को सुनवाई योग्य करार दिया.
शीर्ष अदालत ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद-32, भारतीय संविधान के भाग-3 का हिस्सा है जो मौलिक अधिकारों से संबंधित है और इस अनुच्छेद के तहत याचिका दायर करने का अधिकार भी एक मौलिक अधिकार है. न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जवल भुइयां की पीठ ने कहा, ”मौजूदा मामले में, याचिकाकर्ता (बिलकीस बानो) ने संविधान के अनुच्छेद-32 के तहत अपनी रिट याचिका दायर की है ताकि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत अपने मौलिक अधिकारों का इस्तेमाल कर सके, जो जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार की बात करता है. साथ ही अनुच्छेद 14 के तहत, जो समानता और कानूनों की समान सुरक्षा के अधिकार से संबंधित है.” पीठ ने कहा, ”संविधान के अनुच्छेद-32, जिसे ‘संविधान की आत्मा’ भी माना जाता है और जो अपने आप में एक मौलिक अधिकार है, का उद्देश्य संविधान के भाग-3 में अन्य मौलिक अधिकारों का क्रियान्वयन सुनिश्चित करना है. हमारा मानना है कि उपरोक्त संवैधानिक उपाय संविधान की प्रस्तावना में निहित लक्ष्यों को लागू करने के लिए भी है, जो न्याय, स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे की बात करते हैं.”
बिलकीस मामले में सजा माफी पर विचार करना गुजरात सरकार का अधिकार क्षेत्र नहीं: न्यायालय
उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि गुजरात सरकार के पास राज्य में 2002 के सांप्रदायिक दंगों के दौरान बिलकीस बानो के साथ सामूहिक बलात्कार और उसके परिवार के सात सदस्यों की हत्या के मामले में 11 दोषियों को दी गई सजा की छूट के लिए आवेदन पर विचार करने का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं था. शीर्ष अदालत ने कहा कि केवल उस राज्य की सरकार जहां अपराधियों को सजा सुनाई गई थी, छूट के लिए आवेदन पर विचार करने और आदेश पारित करने के लिए सक्षम थी.



