मध्यप्रदेश में भाजपा ने 82 सीट जीतीं, 81 पर आगे

मुख्यमंत्री कौन को लेकर भाजपा में चर्चा शुरु, मप्र में शानदार जीत के बाद चौहान की दावेदारी मजबूत

भोपाल/नयी दिल्ली.  मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) प्रचंड जीत की ओर बढ़ती दिख रही है. निर्वाचन आयोग के अनुसार, प्रदेश की 230 विधानसभा सीट में से भाजपा के उम्मीदवार 82 सीट जीत चुके हैं जबकि 81 सीट पर आगे चल रहे हैं. वहीं कांग्रेस ने अब तक 20 सीट पर जीत दर्ज की है और वह 46 पर आगे चल रही है. इसके अलावा, भारत आदिवासी पार्टी ने भी प्रदेश में पहली बार जीत दर्ज कर एक सीट अपने कब्जे में कर ली है. मध्यप्रदेश की 230 सीट के लिए मतदान 17 नवंबर को हुआ था और मतगणना आज सुबह आठ बजे कड़ी सुरक्षा के बीच 52 जिला मुख्यालयों पर शुरू हुई.

मुख्यमंत्री चौहान छठी बार बुधनी से जीते, मस्तल को 1.04 लाख वोटों से हराया

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कांग्रेस के अभिनेता से नेता बने विक्रम मस्तल को 1,04,974 मतों के अंतर से हराकर बुधनी सीट से छठी बार जीत हासिल की. मप्र के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले चौहान ने पहली बार 1990 में बुधनी विधानसभा सीट से जीत हासिल की. वर्ष 2006 में उपचुनाव जीतने के बाद उन्होंने 2008, 2013 और 2018 में यह सीट अपने पास बरकरार रखी. चौहान 1991, 1996, 1998, 1999 और 2004 में विदिशा से लोकसभा सांसद भी रहे.

चौहान के समर्थक उन्हें प्यार से ‘मामा’ कहते हैं. चौहान को इस बार पार्टी के मुख्यमंत्री उम्मीदवार के रूप में पेश नहीं किया गया है.
चौहान समेत कई भाजपा नेताओं ने दावा किया है कि उनकी ‘लाडली बहना योजना’, जिसके तहत पात्र महिलाओं को प्रति माह 1,250 रुपये मिलते हैं, इस चुनाव में ‘ गेम चेंजर’ साबित हुई.

केंद्रीय मंत्री कुलस्ते निवास सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी चैन सिंह से हारे

केंद्रीय मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते मध्य प्रदेश के मंडला जिले की निवास सीट (अनुसूचित जनजाति के लिए सुरक्षित) से कांग्रेस के चैन सिंह वरकड़े से 9,723 मतों के अंतर से हार गये. कुलस्ते उन तीन केंद्रीय मंत्रियों में शामिल थे जिन्हें भारतीय जनता पार्टी ने 17 नवंबर को हुए विधानसभा चुनाव में मैदान में उतारा था. संयोग से, उन्होंने निवास से तीन बार चुनाव लड़ा और केवल 1990 में जीत दर्ज कर थे. वह जुलाई 2008 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान लोकसभा में ‘करेंसी नोट’ लहराने के बाद कथित “नोट के बदले वोट” घोटाले से जुड़े तीन भाजपा सांसदों में से एक थे.

कमलनाथ ने मानी हार,उम्मीद जताई कि भाजपा लोगों के भरोसे पर खरा उतरेगी

मध्यप्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी की हार स्वीकार करते हुए रविवार को कहा कि मुझे आशा है कि जनता ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर जो भरोसा दिखाया है, उस पर वह खरा उतरेगी. कमलनाथ ने भोपाल में संवाददाताओं से कहा, ”चुनाव परिणाम में मध्यप्रदेश की जनता का फैसला हमें स्वीकार है. हमें विपक्ष में बैठने की जिम्मेदारी दी गई है और हम अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करेंगे.” उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश के सामने अभी सबसे बड़ा सवाल यही है कि प्रदेश के युवाओं का भविष्य सुरक्षित हो और किसानों को खुशहाली मिले. कमलनाथ ने कहा, ”मैं भारतीय जनता पार्टी को बधाई देता हूं. मुझे आशा है कि जनता ने उन पर जो विश्वास जताया है, वे उस पर खरा उतरने की कोशिश करेंगे.”

मुख्यमंत्री कौन को लेकर भाजपा में चर्चा शुरु, मप्र में शानदार जीत के बाद चौहान की दावेदारी मजबूत

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के दो-तिहाई बहुमत से जीत के करीब पहुंचने के बाद मध्य प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाएं अब पृष्ठभूमि में चली गई हैं क्योंकि शिवराज सिंह चौहान ने तमात विपरित परिस्थितियों के बावजूद एक बार फिर इस हिंदी राज्य में अपनी लोकप्रियता का लोहा मनवाया है.

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने किसी भी राज्य में मुख्यमंत्री पद के चेहरे की घोषणा नहीं की थी. कुछ प्रतिद्वंद्वियों की मौजूदगी के बावजूद चौहान मध्य प्रदेश में सत्ता में बने रहने के लिए पसंदीदा नेता के रूप में उभरे हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ और राजस्थान में नेतृत्व की दौड़ खुली हुई है. इन दोनों राज्यों में भाजपा ने कांग्रेस से सत्ता छीनी है.

तीन हिंदी भाषी राज्यों में शीर्ष पद के लिए कई संभावित दावेदारों ने विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा है. पार्टी ने अतीत में उन नेताओं पर भी अपना भरोसा जताया है जो राज्य विधानसभाओं के सदस्य नहीं थे, जैसे कि 2017 में योगी आदित्यनाथ. पार्टी ने बाद में उन्हें मुख्यमंत्री पद के लिए चुना था.

दिमनी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने वाले केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और ज्योतिरादित्य सिंधिया को लंबे समय से मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में देखा जाता रहा है. राजस्थान में राजनीति पर नजर रखने वालों का मानना है कि भाजपा को आसानी से बहुमत मिलने का मतलब है कि पार्टी नेतृत्व मुख्यमंत्री पद के लिए किसी नए चेहरे को चुन सकता है, भले ही दो बार की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे अपने कद और बड़े जनाधार के कारण स्वाभाविक दावेदार हैं.

केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत और अर्जुन राम मेघवाल, प्रदेश अध्यक्ष सी पी जोशी, दीया कुमारी और महंत बालकनाथ को भी संभावित उम्मीदवार माना जा रहा है. मेघवाल अनुसूचित जाति से आते हैं और बालकनाथ यादव हैं, जो हिंदी भाषी राज्यों में सबसे अधिक ओबीसी समुदाय है. बालकनाथ की कट्टर हिन्दुत्ववादी छवि को उनके लिए एक फायदे के रूप में देखा जाता है.

भाजपा सूत्रों ने कहा कि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला जैसा कोई व्यक्ति, जो तीन बार विधायक रह चुका है और जिसे पार्टी नेतृत्व का विश्वास प्राप्त है, वह भी स्वाभाविक दावेदार हो सकता है. अगले लोकसभा चुनाव में महज चार महीने का समय बचा है, ऐसे में पार्टी इन तीन राज्यों में मुख्यमंत्री पद के लिए अपनी पसंद चुनने में व्यापक सामाजिक विमर्श को ध्यान में रख सकती है. यह विचार राजस्थान में शेखावत जैसे किसी व्यक्ति की राह में रोड़े डाल सकता है क्योंकि वह राजपूत बिरादरी से आते हैं. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी दोनों इसी जाति से आते हैं.

यह चौहान जैसे किसी व्यक्ति के पक्ष में भी है, जो भाजपा में ओबीसी समुदाय से एकमात्र मुख्यमंत्री हैं और वह लोकप्रिय भी हैं.
हालांकि, पार्टी के कुछ नेताओं ने यह भी कहा कि परिणाम राज्यों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के एजेंडे के लिए व्यापक समर्थन को रेखांकित करते हैं और फैसले को उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए. हालांकि तेलंगाना में वह अपनी वोट हिस्सेदारी और सीटों की संख्या में सुधार के बावजूद तीसरे स्थान पर बनी हुई है.

एक वरिष्ठ नेता ने नाम ना लिखे जाने की शर्त पर कहा, ”जनादेश पार्टी नेतृत्व को तीनों राज्यों में मुख्यमंत्री तय करने की खुली छूट देता है.” छत्तीसगढ़ में पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अरुण कुमार साव, विपक्ष के नेता धरमलाल कौशिक और पूर्व आईएएस अधिकारी ओपी चौधरी को राजनीति पर नजर रखने वाले लोग इस शीर्ष पद के दावेदारों के रूप में देख रहे हैं.
सिंह को छोड़कर तीनों नेता अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) से आते हैं.

हालांकि, यहां यह भी ध्यान देने की बात है कि मुख्यमंत्री पद की पसंद से भाजपा नेतृत्व ने अक्सर सभी को चौंकाया भी है. हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर को जब मुख्यमंत्री पद के लिए चुना गया था तब किसी को इसका अंदाजा भी नहीं था. भाजपा सूत्रों की ओर से ऐसी ही बात केंद्रीय मंत्री रेणुका सिंह सरूता को लेकर कही जा रहा है. पार्टी ने उन्हें भरतपुर-सोनहट सीट से उम्मीदवार बनाया है और वह चुनाव जीतने के करीब हैं. वह जनजातीय समाज से आती हैं और महिला हैं. छत्तीसगढ़ के गठन के बाद अब तक इस राज्य में कोई महिला मुख्यमंत्री नहीं हुआ है. भाजपा शासित किसी भी राज्य में कोई महिला फिलहाल मुख्यमंत्री नहीं है.

चार राज्यों के विधानसभा चुनावों के लिए रविवार को जारी मतगणना के मुताबिक भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) भारी बहुमत से मध्य प्रदेश की सत्ता में वापसी की ओर बढ़ रही है, वहीं राजस्थान और छत्तीसगढ़ में वह कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने के करीब है. इन चुनावों में कांग्रेस के लिए राहत सिर्फ तेलंगाना से मिल रही है जहां उसके भारी बहुमत से सरकार बनाने की प्रबल संभावना है.

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