दिव्यांगजन के लिए बने सेंटर से जुड़े घोटाले को लेकर अधिकारियों के खिलाफ CBI जांच जारी रहेगी: उच्च न्यायालय

बिलासपुर. छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने दिव्यांगजन के कल्याण के लिए बने ‘स्टेट रिसोर्स सेंटर’ (एसआरसी) और ‘फिजिकल रेफरल रिहैबिलिटेशन सेंटर’ (पीआरआरसी) से जुड़े करोड़ों रुपये के कथित घोटाले में राज्य के पूर्व मुख्य सचिव सहित अनेक उच्च अधिकारियों और अन्य के खिलाफ सीबीआई जांच को जारी रखने का फैसला सुनाया है. रायपुर के स्वावलंबन केंद्र में कार्यरत कुंदन सिंह ने उच्च न्यायालय में जनहित याचिका के माध्यम से कथित घोटाले को लेकर सीबीआई जांच का अनुरोध किया था.

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति पार्थ प्रतीम साहू और न्यायमूर्ति संजय कुमार जायसवाल की युगल पीठ ने अपने फैसले में सीबीआई को इस मामले में पहले से दर्ज प्राथमिकी पर आगे ब­ढ़ने और संबंधित विभाग, संस्थान और कार्यालयों से 15 दिनों के भीतर प्रासंगिक मूल दस्तावेज जब्त करने के निर्देश दिए हैं.

न्यायालय ने यह भी कहा है कि सीबीआई जल्द से जल्द निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच पूरी करने के लिए सभी संभव प्रयास करेगी.
न्यायाल से जुड़े सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, इस मामले में भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के कई अधिकारियों समेत अन्य उच्च अधिकारी जांच के दायरे में हैं.

इनमें मुख्य रूप से पूर्व मुख्य सचिव विवेक ढांड, एम.के. राउत, आलोक शुक्ला, सुनील कुजूर, बी.एल. अग्रवाल, सतीश पांडे, पी.पी. सोती, राजेश तिवारी (स्टेट रिसोर्स सेंटर के निदेशक), सामाजिक कल्याण विभाग के उप निदेशक एम.एल. पांडे, सामाजिक कल्याण विभाग के अतिरिक्त निदेशक पंकज वर्मा और सामाजिक कल्याण विभाग के उप निदेशक के नाम शामिल हैं जो एसआरसी या पीआरआरसी की प्रबंधन कमेटी के सदस्य थे अथवा कथित वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े थे.

याचिकाकर्ता कुंदन सिंह के अधिवक्ता देर्विष ठाकुर ने बताया कि वर्ष 2017 में रायपुर के स्वावलंबन केंद्र में संविदा नियुक्ति के तहत कार्यरत कुंदन सिंह ने उच्च न्यायालय की एकल पीठ के समक्ष अपने नियमितीकरण के लिए एक याचिका दायर की थी. न्यायालय की एकल पीठ ने वर्ष 2018 को याचिका की प्रकृति सार्वजनिक कल्याण की मानते हुए इसे उचित बेंच के समक्ष सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया था. आरोपों और प्रकरण में की गई प्रार्थना की प्रकृति को देखते हुए प्रारंभिक वाद पत्र को जनहित याचिका में परिर्वितत किया गया.

ठाकुर ने बताया कि राज्य द्वारा वर्ष 2004 में दिव्यांगजन के कल्याण के लिए एक स्वायत्त संस्थान ‘स्टेट रिसोर्स केंद्र’ (एसआरसी) का गठन किया गया था. वर्ष 2012 में फिजिकल रेफरल रिहैबिलिटेशन सेंटर (पीआरआरसी) का गठन किया गया जिसमें दिव्यांगजन को कृत्रिम अंग और अन्य सहायक उपकरण प्रदान किये जाते हैं. इसमें एसआरसी ने कर्मचारियों को भुगतान करने और सेंटर के संचालन और उपकरणों की खरीद के लिए पीआरआरसी को धन प्रदान किया.

याचिका में इस मामले में कथित तौर पर बड़े पैमाने पर गबन और सार्वजनिक धन की लूट के आरोप लगाते हुए कहा गया कि इस घोटाले की राशि करोड़ों में हो सकती है. यहां तक कि पीआरआरसी केवल कागजों पर ही कार्यशील है. याचिका में कहा गया है कि यहां बिना किसी स्पष्ट और ठोस नियमों के कर्मचारियों को नियुक्त और कार्यरत दिखाया गया जबकि दिव्यांग लोगों के लिए कोई अस्पताल स्थापित नहीं किया गया.

स्वयं याचिकाकर्ता और उनके जैसे अन्य व्यक्तियों को पीआरआरसी में नियुक्त दिखाया गया. इसके बाद उनके वेतन के भुगतान के लिए बड़ी मात्रा में धनराशि नकली कर्मचारियों की सूची के आधार पर निकाली गई और उन्हें भुगतान नकद में दिखाया गया. जबकि, याचिकाकर्ता जैसे व्यक्तियों ने पीआरआरसी में किसी भी पद के लिए कभी कोई आवेदन नहीं किया था. यह भी आरोप लगाया गया है कि एसआरसी का पंजीकरण साल 2004 में हुआ था लेकिन इसने कभी अपने खाते का ऑडिट नहीं कराया. याचिकाकर्ता का यह भी कहना है कि जब उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत जानकारी प्राप्त करने का प्रयास किया तो उनको गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी गई.

ठाकुर ने बताया कि बाद में उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने 30 जनवरी 2020 को इस जनहित याचिका पर सीबीआई को प्राथमिकी दर्ज करने और संबंधित विभाग से प्रासंगिक मूल रिकॉर्ड जब्त करने के निर्देश दिए. उच्च न्यायालय के इस आदेश को उच्च अधिकारियों ने उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी थी.

उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के 30 जनवरी 2020 के निर्णय के खिलाफ दायर अपील पर विचार करते हुए इस आदेश को अपने सात अक्टूबर, 2021 के आदेश द्वारा निरस्त करते हुए सभी प्रतिवादियों की याचिका पर पुन? विचार करने और सभी पक्षों को सुनने का अवसर देने के बाद कानून के अनुसार फिर से निर्णय लेने के लिए इसे उच्च न्यायालय के पास वापस भेज दिया.
अधिवक्ता ने बताया कि उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति पार्थ प्रतीम साहू और न्यायमूर्ति संजय कुमार जायसवाल की पीठ के समक्ष दोनों पक्षों की सुनवाई हुई.

उच्च न्यायालय ने पाया कि छत्तीसग­ढ़ सरकार के मुख्य सचिव द्वारा दिए गए शपथ पत्र में विशेष ऑडिट के दौरान 31 वित्तीय अनियमितताओं का पता चला है. न्यायालय ने पाया कि महिला एवं बाल कल्याण विभाग की पूर्व मंत्री रेणुका सिंह को प्रकरण में प्रतिवादी के रूप में शामिल किया गया है.

उच्च न्यायालय में सीबीआई के अधिवक्ता के अनुसार, इस मामले में पांच फरवरी 2020 को प्राथमिकी दर्ज की गई थी, लेकिन उच्चतम न्यायालय के आदेश के अनुपालन में इस पर कार्रवाई रोक दी गई है. ठाकुर ने बताया कि उच्च न्यायालय की युगल पीठ ने अंतिम सुनवाई के बाद 25 जून 2025 को मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया जिसे 23 सितंबर को सुनाया गया. न्यायालय ने अपने फैसले में स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि सीबीआई पांच फरवरी 2020 को दर्ज की गई प्राथमिकी पर आगे ब­ढ़ेगी.

उच्च न्यायालय ने यह भी कहा है कि सीबीआई संबंधित विभाग, संस्थान और कार्यालयों से 15 दिनों के भीतर प्रासंगिक मूल रिकॉर्ड जब्त करेगी, बशर्ते अभी तक ऐसा नहीं किया गया हो. न्यायालय ने यह भी निर्देश दिए कि सीबीआई जल्द से जल्द निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच पूरी करने के लिए सभी संभव प्रयास करेगी.

 

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button