नयी दिल्ली/कोलकाता. राज्यसभा में नेता सदन और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अध्यक्ष जे पी नड्डा ने मंगलवार को कहा कि कांग्रेस की पूववर्ती सरकारों द्वारा अनुच्छेद-356 के बार-बार किए गए दुरुपयोग के इतिहास को देखते हुए सरकार ने ‘एक देश, एक चुनाव’ विधेयक लाने का फैसला किया है.
‘भारत के संविधान की 75 वर्षों की गौरवशाली यात्रा’ पर राज्यसभा में हो रही चर्चा के दूसरे दिन बहस को आगे बढ़ाते हुए नड्डा ने कांग्रेस पर संविधान की भावना को बदलने और उसे पुन: लिखने का प्रयास करने का आरोप लगाया. उन्होंने प्रमुख विपक्षी पार्टी से भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में काले अध्याय के रूप में दर्ज आपातकाल के 50 वर्ष पूरे होने पर अगले साल 25 जून को आयोजित होने वाले ‘संविधान हत्या दिवस’ कार्यक्रम में प्रायश्चित स्वरूप शामिल होने का आह्वान किया.
नड्डा ने कहा, ”आज आप ‘एक देश, एक चुनाव’ के विरोध में खड़े हो रहे हैं. आपके कारण ही ‘एक देश, एक चुनाव’ लाना पड़ रहा है. क्योंकि 1952 से 1967 तक देश में एक साथ ही चुनाव होते थे. आपने (कांग्रेस) अनुच्छेद 356 के इस्तेमाल से राज्यों की चुनी हुई सरकारों को बार-बार गिराया और ऐसा करके आपने कई राज्यों में अलग-अलग चुनाव की स्थिति लाकर खड़ी कर दी.”
भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि कांग्रेस की सरकारों ने अनुच्छेद 356 का 90 बार इस्तेमाल किया गया. उन्होंने कहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने आठ बार, इंदिरा गांधी ने 50 बार, राजीव गांधी ने नौ बार और मनमोहन सिंह ने 10 बार अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग किया.
उन्होंने कहा, ”संविधान की 75 साल की गौरवशाली यात्रा में इन बातों का भी जिक्र होना चाहिए. (लोगों को) पता चलना चाहिए कि आपने किस तरीके से चुनी हुई सरकारों को एक बार नहीं बारम्बार गिराया और देश को मुसीबत में डालने का काम किया.” कांग्रेस की सरकारों द्वारा किए गए विभिन्न संविधान संशोधनों का उल्लेख करते हुए नेता सदन ने कहा कि क्या देश को कोई खतरा था कि देश पर आपातकाल थोपा गया.
उन्होंने कहा, ”नहीं… देश को खतरा नहीं था, कुर्सी को खतरा था. किस्सा कुर्सी का था, जिसके लिए पूरे देश को अंधकार में डाल दिया गया.” नड्डा ने कहा कि कांग्रेस के सदस्य कहते हैं कि उनके नेताओं ने आपातकाल को एक गलती के रूप में स्वीकार कर लिया है, लिहाजा बार-बार इसका जिक्र नहीं किया जाना चाहिए.
भाजपा अध्यक्ष ने कहा, ”आपातकाल के दौरान प्रजातंत्र का गला घोंटने का प्रयास हुआ. अगर आपके दिल में कहीं भी प्रायश्चित है तो मैं आह्वान करता हूं…और आपको समय से पहले बताता हूं… 25 जून 2025 को लोकतंत्र विरोधी दिवस कार्यक्रम में आप शामिल हों.” उल्लेखनीय है कि पिछले साल सरकार ने 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में घोषित किया था.
देश में 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक की अवधि आपातकाल की अवधि थी, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने महत्त्वपूर्ण कार्यपालिका और विधायी परिवर्तन लागू करने के लिये संविधान में विशेष प्रावधानों का उपयोग किया था. नड्डा ने संविधान निर्माता बाबा साहेब आंबेडकर का हवाला देते हुए कहा कि उन्होंने कहा है कि संविधान चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि संविधान को मानने वाले लोग खराब निकले तो निश्चित रूप से संविधान खराब सिद्ध होगा और दूसरी तरफ अगर संविधान को मानने वाले लोग अच्छे हुए तो संविधान अच्छा सिद्ध होगा.
उन्होंने कहा कि चाहे आपातकाल हो या अनुच्छेद 370 हो, कांग्रेस ने संविधान से छेड़छाड़ का कोई मौका नहीं छोड़ा. उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति के आदेश से संसदीय प्रक्रियाओं को नजरअंदाज करते हुए पिछले दरवाजे से 35 ए लाया गया. उन्होंने कहा कि इसका नतीजा यह निकला कि भारतीय संसद द्वारा पारित 106 कानून जम्मू-कश्मीर में लागू नहीं हो सके और इनमें पोक्सो, मानवाधिकार के खिलाफ अत्याचार और महिलाओं की संपत्ति के अधिकार जैसे कानून थे. उन्होंने कहा कि पश्चिमी पाकिस्तान से आए हुए मनमोहन सिंह, इन्द्र कुमार गुजराल भारत के प्रधानमंत्री बने तथा लालकृष्ण आडवाणी भी पश्चिमी पाकिस्तान से आए थे और वह भारत के उप-प्रधानमंत्री बने.
उन्होंने कहा, ”लेकिन आपको जानकर आश्चर्य होगा कि पीओके से आया हुआ व्यक्ति जम्मू कश्मीर की विधानसभा का सदस्य नहीं बन सकता था, वह पंचायत का चुनाव नहीं लड़ सकता था. यहां तक कि उस व्यक्ति को वोट देने की भी अनु?मति नहीं थी.” नड्डा ने कहा, ”प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सूझबूझ के कारण जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग बन गया.” भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि कांग्रेस ने संविधान की प्रस्तावना के साथ भी छेड़ छाड़ कर दी और उसमें पंथनिरपेक्ष और समाजवाद शब्द जोड़ दिये.
उन्होंने कहा, ”अगर आपने (कांग्रेस) संविधान पढ़ा होता और संविधान निर्माताओं की आकांक्षाओं को समझा होता तो आपने (इन शब्दो को) नहीं जोड़ा होता. क्योंकि डॉ. आंबेडकर ने लिखा है कि भारत का संविधान पूरी तरह पंथनिरपेक्ष है, इसमें ‘सेक्युलर’ शब्द जोड़ने की कोई जरूरत नहीं है.” उन्होंने अनुच्छेद 370 के अलावा तीन तलाक के मुद्दे पर कांग्रेस पर निशाना साधा और उस पर देश की क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा नहीं करने का भी आरोप लगाया.
कांग्रेस पर अल्पसंख्यक तुष्टिकरण का आरोप लगाते हुए नड्डा ने कहा, ”आपने राजीव गांधी को प्रगतिशील कहा… शाह बानो मामले में उच्चतम न्यायालय ने फैसला दिया, मुस्लिम मौलवियों के दबाव में आप संसद में संशोधन लेकर आए. यह वोट बैंक की राजनीति को ध्यान में रखते हुए किया गया था. उच्चतम न्यायालय ने हमेशा कहा कि तीन तलाक खत्म होना चाहिए, आपमें हिम्मत नहीं थी, आप तुष्टिकरण की राजनीति कर रहे थे.” नड्डा ने कांग्रेस पर धर्म के आधार पर आरक्षण लाने की कोशिश करने का भी आरोप लगाया.
सदन के नेता ने कहा कि आंबेडकर ने स्पष्ट रूप से कहा था कि आरक्षण धर्म के नाम पर नहीं होना चाहिए.
नड्डा ने कहा, ”आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में आपने (कांग्रेस) धार्मिक अल्पसंख्यकों को पिछड़ा वर्ग के तहत आरक्षण देने की कोशिश की, जिसे उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया.” इसके बाद, उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र में तत्कालीन कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार की ओर से जारी परिपत्र का हवाला दिया, जिसमें पिछड़े वर्गों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण में 4.5 प्रतिशत मुस्लिम अल्पसंख्यकों को शामिल करने का आह्वान किया गया था, जिसे उच्चतम न्यायालय ने रद्द कर दिया था.
उन्होंने कहा, ”देश को पता चलना चाहिए कि संविधान में जो प्रावधान है, तुष्टिकरण की राजनीति के लिए उसका गलत अर्थ निकालने का आपने (कांग्रेस) कैसा प्रयास किया.” कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने गुजरात सरकार द्वारा दिए गए आरक्षण का मुद्दा उठाते हुए उनकी टिप्पणी पर आपत्ति जताई.
नड्डा के बचाव में केंद्रीय मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा, ”जयराम रमेश अब जो कह रहे हैं वह गलत है. गुजरात के मुख्यमंत्री ने जो दिया, वह आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर था. यहां धार्मिक अल्पसंख्यकों का उल्लेख किया गया है.” उन्होंने तत्कालीन कांग्रेस नीत सरकार के तहत डीओपीटी द्वारा कथित तौर पर जारी एक परिपत्र का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि रमेश दोनों (गुजरात सरकार द्वारा दी गई आपत्तियां और डीओपीटी सर्कुलर) में विरोधाभास कर रहे हैं और सदन को गुमराह कर रहे हैं. भाजपा के के लक्ष्मण ने सीतारमण के दावे का समर्थन किया.
सीतारमण पर पलटवार करते हुए रमेश ने कहा, ”हमने (कांग्रेस) कभी धर्म आधारित आरक्षण के बारे में बात नहीं की.” उन्होंने कहा कि कर्नाटक की तरह जहां भी आरक्षण दिया गया है, वह धर्म के आधार पर नहीं बल्कि सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़ा होने के आधार पर दिया गया है. सीतारमण ने रमेश को जवाब देते हुए कहा कि वह कितने भी स्पष्टीकरण दें लेकिन वह इस मुद्दे पर सदन को गुमराह कर रहे हैं. नड्डा ने अपने संबोधन की शुरुआत करते हुए संविधान निर्माताओं को याद किया और कहा कि इसके लिए देश हमेशा उनका कृतज्ञ रहेगा.
‘एक राष्ट्र एक चुनाव’ मतदान प्रक्रिया को प्रोत्साहन देगा, आर्थिक विकास को मिलेगी गति : कोविंद
पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने मंगलवार को यहां कहा कि ‘एक राष्ट्र एक चुनाव’ संबंधी केंद्र का प्रस्ताव अगर लागू हो जाता है, तो इससे चुनाव प्रक्रिया को प्रोत्साहन मिलेगा और देश के आर्थिक विकास में भी यह मददगार साबित होगा.
कोविंद देश में एक साथ चुनाव कराने की संभावनाओं पर विचार करने के लिए गठित उच्च स्तरीय समिति के अध्यक्ष थे. इस समिति का गठन भारत सरकार ने सितंबर 2023 में किया था.
कोविंद ने यहां एक आदिवासी संगठन के कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि मतदाता हर साल वोट मांगने वाले राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों से मुलाकात कर थक गए हैं और शायद अब वे उनका इतनी बार सामना नहीं करना चाहते. उन्होंने कहा, ” एक साथ चुनाव को पूरी तरह से लागू करने में पांच से 10 साल का वक्त लग सकता है. जब 2029-2030 में या उसके बाद यह प्रस्ताव पूरी तरह से लागू हो जाएगा, तो मतदाताओं को हर साल एक या दूसरे चुनाव के लिए मतदान केंद्रों पर नहीं जाना पड़ेगा. इससे आर्थिक विकास को भी बढ़ावा मिलेगा, क्योंकि देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर मौजूदा 7.23 प्रतिशत से 1.5 प्रतिशत तक और बढ़ जाएगी.” पूर्व राष्ट्रपति ने कहा, ”सोचिए कि यदि मौजूदा जीडीपी में 1.5 अंक जोड़ दिए जाएं, तो 10 प्रतिशत (जीडीपी) के आंकड़े तक पहुंचने में ज्यादा समय नहीं लगेगा. तब हमारा देश दुनिया की शीर्ष तीन-चार आर्थिक महाशक्तियों में शामिल हो जाएगा.” कोविंद ने दावा किया कि ‘एक राष्ट्र एक चुनाव’ से पूरी प्रक्रिया को प्रोत्साहन मिलेगा.
उन्होंने कहा, ”अगर उम्मीदवारों को हर साल लोगों से वोट मांगना है, तो उन्हें यह बताना होगा कि विकास का वादा क्यों नहीं पूरा किया गया. हर साल होने वाले चुनावों के कारण लोग कभी-कभी मतदान केंद्रों पर जाने से कतराने लगते हैं.” उन्होंने कहा कि समिति की 18,000 पन्नों की रिपोर्ट सार्वजनिक मंच पर उपलब्ध है और इससे आर्थिक प्रशासन सुचारू हो जाएगा.
पूर्व राष्ट्रपति ने कहा, ”यदि आप एक स्थान पर बैठें, तो आप माउस क्लिक करके या मोबाइल पर इसे देख सकते हैं और इसके लिए अलग-अलग पुस्तकालयों में जाने की आवश्यकता नहीं है. विभिन्न संसदीय समितियों की रिपोर्ट का विशाल संकलन एक साथ संकलित किया गया है.” पूर्व राष्ट्रपति कोविंद ने ‘एक राष्ट्र एक चुनाव’ प्रस्ताव पर उच्चाधिकार प्राप्त समिति के अध्यक्ष के रूप में अपने कार्यकाल को याद किया, जब उन्होंने विभिन्न दलों के प्रतिनिधिमंडलों और निर्वाचन आयोग के अधिकारियों एवं अन्य लोगों से मुलाकात की थी.
कोविंद ने गरीबों, दलितों और पिछड़ी जातियों से संबंध रखने वाले श्रोताओं को संबोधित करते हुए कहा, ”वे देश को संभाल रहे हैं. वे संस्कृति के सुंदर स्वरूप का प्रतिनिधित्व करते हैं और अपनी स्वदेशी संस्कृति को संरक्षित करके भारत की गरिमा को बढ़ाने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं.” उन्होंने कहा, ”हमें राष्ट्र निर्माण में भागीदार होने का उन्हें एहसास कराना होगा. हमें उन्हें इस सभागार में कार्यवाही और हमारे भाषणों को सुनने के लिए बुलाना होगा…. जब हम इस समावेशिता को वास्तविकता बना देंगे, तो राष्ट्र वास्तव में प्रगति करेगा. एक राष्ट्र एक चुनाव जैसे प्रस्तावों के साथ यह पहले से ही उस दिशा में आगे बढ़ रहा है.”