
नयी दिल्ली. उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि किसी मकान को सिर्फ इसलिए ध्वस्त करना कि उसमें रहने वाला व्यक्ति आपराधिक मामले में आरोपी है या दोषी करार दिया गया है, तो यह पूरे परिवार को ”सामूहिक दंड” देने के समान होगा. न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति के वी विश्वनाथन की पीठ ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में ये टिप्पणियां कीं. इस फैसले में, संपत्तियों को ढहाने पर देशभर के लिए दिशानिर्देश निर्धारित किये गए हैं.
न्यायालय ने कहा कि जब किसी विशेष ढांचे को अचानक ध्वस्त करने के लिए चुना जाता है और उसी क्षेत्र में स्थित अन्य समान ढांचों को छुआ तक नहीं जाता, तो ”बहुत ही दुर्भावना से ऐसा किया जाता होगा.” पीठ ने कहा कि मकान का निर्माण सामाजिक-आर्थिक अधिकारों का एक पहलू है और एक आम नागरिक के लिए यह अक्सर वर्षों की कड़ी मेहनत, सपनों और आकांक्षाओं की परिणति होती है.
शीर्ष अदालत ने कहा, ”हमारे विचार में, यदि किसी मकान को गिराने की अनुमति दी जाती है, जिसमें एक परिवार के कई लोग या कुछ परिवार रहते हैं, केवल इस आधार पर कि ऐसे घर में रहने वाला एक व्यक्ति या तो आरोपी है या आपराधिक मामले में दोषी करार दिया गया है, तो यह पूरे परिवार या ऐसे भवन में रहने वाले परिवारों को सामूहिक दंड देने के समान होगा.” न्यायालय ने कहा कि संविधान और आपराधिक न्यायशास्त्र कभी भी इसकी अनुमति नहीं देगा.
यह देखते हुए कि आश्रय का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा) के पहलुओं में से एक है, शीर्ष अदालत ने कहा कि घर केवल एक संपत्ति नहीं है, बल्कि यह स्थिरता, सुरक्षा और भविष्य के लिए एक परिवार या व्यक्तियों की सामूहिक उम्मीदों का प्रतीक होता है.
पीठ ने अपने 95 पृष्ठ के फैसले में कहा, ”किसी भी व्यक्ति को अपने सिर पर छत होने से संतुष्टि मिलती है. इससे सम्मान मिलता है और अपनेपन की भावना आती है. अगर इसे छीना जाना है, तो प्राधिकारी को यह लगना चाहिए कि यही एकमात्र विकल्प है.” न्यायालय ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता, जो केन्द्र और कुछ राज्यों की ओर से उपस्थित हुए थे, की इन दलीलों पर गौर किया कि कुछ मामलों में यह महज संयोग हो सकता है कि स्थानीय नगर निकाय कानूनों का उल्लंघन करने वाली संपत्तियां आरोपी व्यक्तियों की भी हुआ करती हैं.
पीठ ने कहा, ”ऐसे मामलों में, जहां अधिकारी मनमाने तरीके से (ढहाये जाने के लिए भवन या) ढांचों का चयन करते हैं और यह स्थापित हो जाता है कि ऐसी कार्रवाई शुरू करने से शीघ्र पहले उसमें रह रहे व्यक्ति को आपराधिक मामले में संलिप्त पाया गया था, तो यह अनुमान लगाया जा सकता है कि इस तरह की कार्यवाही का असली मकसद अवैध मकान गिराना नहीं था, बल्कि अदालत में सुनवाई के बिना ही आरोपी को दंडित करने की कार्रवाई थी.” न्यायालय ने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस तरह की पूर्वधारणा का खंडन किया जा सकता है, लेकिन प्राधिकारियों को न्यायालय को इस बात से सहमत करना होगा कि उनका इरादा मकान को ध्वस्त कर आरोपी व्यक्ति को दंडित करने का नहीं है.
पीठ ने कहा कि स्थानीय कानूनों के उल्लंघन के कारण जिन घरों को ध्वस्त किया जाना आवश्यक है, उनके संबंध में भी ”कानून के शासन के सिद्धांत” पर विचार किया जाना चाहिए. न्यायालय ने कहा, ”कुछ ऐसे अनधिकृत निर्माण हो सकते हैं, जिन पर समझौता हो सकता है. कुछ ऐसे निर्माण हो सकते हैं, जिनमें निर्माण का केवल एक हिस्सा ही हटाने की आवश्यकता हो.” पीठ ने कहा कि ऐसे मामलों में संपत्ति को ध्वस्त करने जैसा चरम कदम असंगत होगा. शीर्ष अदालत ने देश भर में संपत्तियों को गिराने पर दिशानिर्देश तय करने का अनुरोध करने वाली याचिकाओं पर यह फैसला सुनाया.
उच्चतम न्यायालय ने बुलडोजर पर लगाया ब्रेक, संपत्तियों को ढहाने पर दिशानिर्देश जारी किए
उच्चतम न्यायालय ने हाल में चलन में आए ‘बुलडोजर न्याय’ की तुलना अराजकता की स्थिति से की और देशभर के लिए दिशानिर्देश जारी करते हुए कहा कि कारण बताओ नोटिस दिए बिना किसी भी संपत्ति को ध्वस्त नहीं किया जाए तथा प्रभावितों को जवाब देने के लिए 15 दिन का वक्त दिया जाना चाहिए.
न्यायालय ने कहा कि प्राधिकारी उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना नागरिकों की संपत्ति को ध्वस्त करके उन्हें दंडित नहीं कर सकते. न्यायालय ने ऐसी ज्यादतियों को ”मनमाना” करार दिया और कहा कि इससे सख्ती से निपटे जाने की जरूरत है. न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति के वी विश्वनाथन की पीठ ने एक इमारत को बुलडोजर से ध्वस्त करने और महिलाओं, बच्चों तथा वृद्ध व्यक्तियों को रातों-रात बेघर कर देने के दृश्य को ”भयावह” करार दिया.
पीठ ने अपने 95 पृष्ठ के फैसले में कहा, ”यदि प्राधिकारी न्यायाधीश की तरह काम करते हैं और किसी नागरिक पर इस आधार पर मकान ढहाने का दंड लगाते है कि वह एक आरोपी है तो यह ‘शक्तियों के पृथक्करण’ के सिद्धांत का उल्लंघन है.” इसमें कहा गया है,”जब प्राधिकारी नैर्सिगक न्याय के मूल सिद्धांतों का पालन करने में विफल रहते हैं और वाजिब प्रक्रिया के सिद्धांत का पालन किए बिना काम करते हैं, तो बुलडोजर द्वारा इमारत को ध्वस्त करने का भयावह दृश्य एक अराजक स्थिति की याद दिलाता है, जहां ‘ताकतवर ही जीतेगा’.”
पीठ ने कहा कि इस तरह की मनमानी कार्रवाइयों के लिए संविधान में कोई जगह नहीं है, जो कानून के शासन की बुनियाद पर टिका हुआ है. पीठ ने कई निर्देश जारी करते हुए कहा कि उसके निर्देश उन मामलों में लागू नहीं होंगे जहां सड़क, गली, फुटपाथ, रेल पटरी या किसी नदी या जलाशय जैसे किसी सार्वजनिक स्थल पर कोई अनधिकृत संरचना है तथा उन मामलों में भी लागू नहीं होंगे जहां न्यायालय ने ध्वस्तीकरण का आदेश दिया है.
पीठ ने कहा,” कारण बताओ नोटिस जारी किए बिना (संपत्ति) ढहाने की कोई भी कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए. इस नोटिस का जवाब स्थानीय नगर निकाय कानून के अनुरूप निर्धारित अवधि में देना होगा या फिर नोटिस तामील होने के 15 दिन के भीतर देना होगा.” शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि संवैधानिक लोकाचार और मूल्य शक्ति के इस तरह के दुरुपयोग की अनुमति नहीं देते और इस तरह के दुस्साहस को अदालत द्वारा बर्दाश्त नहीं किया जा सकता.
पीठ ने कहा, ”प्राधिकारी न्यायाधीश बनकर यह निर्णय नहीं ले सकते कि आरोपी व्यक्ति दोषी है और इसलिए उसकी आवासीय/व्यावसायिक संपत्ति/संपत्तियों को ध्वस्त करके उसे दंडित किया जाए. अधिकारी का ऐसा कृत्य उसकी सीमाओं का उल्लंघन होगा.” शीर्ष अदालत ने कहा कि राज्य के अधिकारियों की ओर से शक्तियों के मनमाने इस्तेमाल के संबंध में नागरिकों के मन में व्याप्त आशंकाओं को दूर करने के लिए हम संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए कुछ निर्देश जारी करना आवश्यक समझते हैं.
अनुच्छेद 142 उच्चतम न्यायालय को उसके समक्ष लंबित किसी भी मामले में पूर्ण न्याय करने के लिए आवश्यक कोई भी ‘डिक्री’ या आदेश पारित करने का अधिकार देता है. पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि ढहाने का आदेश पारित होने के बाद भी प्रभावित पक्षों को कुछ समय दिया जाना चाहिए ताकि वे उपयुक्त मंच पर आदेश को चुनौती दे सकें.
न्यायालय ने कहा कि ऐसे मामलों में भी जहां लोग ध्वस्तीकरण आदेश का विरोध नहीं करना चाहते हैं उन्हें घर खाली करने और अन्य व्यवस्थाएं करने के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए.” इसमें कहा गया, ”यह अच्छा नहीं लगता कि महिलाओं, बच्चों और बीमार व्यक्तियों को रातों-रात बेघर कर दिया जाए. यदि अधिकारी कुछ समय के लिए रुक जाएंगे तो आसमान नहीं टूट पड़ेगा.” पीठ ने निर्देश दिया कि संपत्ति के मालिक को पंजीकृत डाक से नोटिस भेजा जाए और इसके अतिरिक्त, नोटिस को संपत्ति की बाहरी दीवार पर भी चिपकाया जाए.
पीठ ने कहा, ”नोटिस प्राप्त होने की तिथि से 15 दिन की समयसीमा प्रारंभ होगी, जिसका जिक्र ऊपर किया गया है.” पीठ ने निर्देश दिया कि जैसे ही कारण बताओ नोटिस की विधिवत तामील हो जाए, इसकी सूचना संबंधित कलेक्टर या जिलाधिकारी के कार्यालय को डिजिटल रूप से ई-मेल द्वारा भेज दी जाए.
इसमें कहा गया है, ”कलेक्टर/जिलाधिकारी एक नोडल अधिकारी नियुक्त करेंगे और एक ई-मेल पता भी प्रदान करेंगे तथा भवन नियमन और ध्वस्तीकरण के प्रभारी सभी नगर निकाय और अन्य प्राधिकारियों को इसकी सूचना देंगे.” नोटिस में अनधिकृत निर्माण की प्रकृति, विशिष्ट उल्लंघन और ध्वस्तीकरण के आधार के बारे में विस्तृत जानकारी दी जानी चाहिए.
न्यायमूर्ति गवई ने अपने फैसले की शुरुआत प्रसिद्ध कवि प्रदीप की इन पंक्तियों से की, ”अपना घर हो, अपना आंगन हो, इस ख्वाब में हर कोई जीता है, इंसान के दिल की ये चाहत है कि एक घर का सपना कभी ना छूटे.” उच्चतम न्यायालय ने देश में संपत्तियों को ढहाने के लिए दिशानिर्देश तय करने के अनुरोध वाली याचिकाओं पर यह व्यवस्था दी. न्यायालय ने इस मामले में एक अक्टूबर को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था. कई याचिकाओं में आरोप लगाया गया था कि विभिन्न राज्यों में आरोपियों सहित अन्य की संपत्तियों को ध्वस्त किया जा रहा.
‘एक घर का सपना कभी ना छूटे’ : कवि प्रदीप की पंक्तियों का न्यायालय के फैसले में किया गया उल्लेख
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी आर गवई ने यह रेखांकित करने के लिए प्रसिद्ध कवि प्रदीप की इन पंक्तियों का बुधवार को उल्लेख किया कि हर किसी की इच्छा होती है कि उसका अपना घर हो और वह नहीं चाहता कि यह सपना कभी छूटे. संपत्तियों को ढहाने पर देशभर के लिए दिशानिर्देश जारी करते हुए, 95 पन्नों के फैसले की शुरूआत न्यायमूर्ति गवई ने कवि की इन पंक्तियों से की, ”अपना घर हो, अपना आंगन हो, इस ख्वाब में हर कोई जीता है, इंसान के दिल की ये चाहत है कि एक घर का सपना कभी ना छूटे.” पीठ ने कहा, ”प्रसिद्ध कवि प्रदीप ने आशियाना के महत्व का वर्णन इस तरह किया है.” न्यायमूर्ति गवई ने पीठ के लिए फैसला लिखा. पीठ में न्यायमूर्ति के वी विश्वनाथन भी शामिल हैं.
न्यायालय ने कहा कि हर व्यक्ति और परिवार एक घर का सपना देखता है. पीठ ने कहा, ”एक घर हर परिवार या व्यक्तियों की स्थिरता व सुरक्षा की सामूहिक उम्मीदों का प्रतीक होता है.” पीठ ने कहा कि एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या प्राधिकारियों को किसी अपराध के आरोपी व्यक्ति को दंडित करने के उपाय के रूप में उसके परिवार का आश्रय छीनने की अनुमति दी जानी चाहिए या नहीं.
पीठ ने कहा कि आश्रय का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा) के पहलुओं में से एक है.
देश भर के लिए दिशानिर्देश निर्धारित करते हुए, न्यायालय ने कहा कि कारण बताओ नोटिस दिए बिना किसी भी संपत्ति को ध्वस्त नहीं किया जाए और प्रभावितों को जवाब देने के लिए 15 दिन का समय दिया जाना चाहिए.
‘बुलडोजर न्याय’ पर सख्त रुख अपनाते हुए पीठ ने कहा कि प्राधिकारी न्यायाधीश का काम नहीं कर सकते, किसी आरोपी को दोषी करार नहीं दे सकते और उसके घर को ध्वस्त नहीं कर सकते. न्यायमूर्ति गवई और न्यायमूर्ति विश्वनाथन की पीठ ने कहा, ”यदि प्राधिकारी मनमाने तरीके से किसी नागरिक के घर को सिर्फ इस आधार पर ध्वस्त करते हैं कि वह एक अपराध में आरोपी है, तो वह कानून के शासन के सिद्धांतों के विपरीत काम करता है.”
न्यायालय ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति का घर केवल इसलिए गिरा दिए जाता है कि वह आरोपी है या फिर दोषी है तो यह ”पूरी तरह से असंवैधानिक” होगा. न्यायमूर्ति गवई ने फैसला सुनाते हुए कहा कि कार्यपालिका, न्यायपालिका के मूल कार्य को पूरा करने में उसकी जगह नहीं ले सकती.



