
नयी दिल्ली. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और उनके वफादार शिवसेना विधायकों के खिलाफ अयोग्यता संबंधी याचिकाओं पर निर्णय करने में हो रही देरी पर उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर को आड़े हाथ लेते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि इस मुद्दे पर कब तक निर्णय किया जाएगा, इसके बारे में वह उसे मंगलवार तक अवगत कराएं.
प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड एवं न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला तथा न्यायमूर्ति मनोज मिश्र की पीठ ने कहा कि (अयोग्य ठहराये जाने की) कार्यवाही महज दिखावा नहीं होनी चाहिए और और वह (स्पीकर) शीर्ष अदालत के आदेश को विफल नहीं कर सकते हैं. पीठ ने यह भी कहा कि यदि वह संतुष्ट नहीं हुई तो वह ‘बाध्यकारी आदेश’ सुनाएगी.
पीठ ने कहा, ”किसी को तो (विधानसभा) अध्यक्ष को यह सलाह देनी होगी . वह उच्चतम न्यायालय के आदेशों की अनेदखी नहीं कर सकते हैं . वह किस तरह की समय सीमा को बता रहे हैं …….. यह (अयोग्यता संबंधी कार्रवाई) एक संक्षिप्त प्रक्रिया है . पिछली बार, हमें लगा था कि सद्बबुद्धि आएगी और हमने उनसे एक समयबद्ध -सारणी निर्धारित करने के लिए कहा था.” अदालत ने कहा कि समय-सारिणी निर्धारित करने के पीछे विचार अयोग्यता कार्यवाही पर सुनवाई में ”अनिश्चित काल के लिए विलंब” करना नहीं था.
अप्रसन्न दिख रहे प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि अयोग्यता याचिकाओं पर फैसला अगले विधानसभा चुनाव से पहले लेना होगा, नहीं तो पूरी प्रक्रिया निरर्थक हो जाएगी. प्रदेश में अगला विधानसभा चुनाव संभवत? सितंबर-अक्टूबर 2024 के आसपास होगा. पीठ ने कहा, ”निर्णय अगले चुनाव से काफी पहले लिया जाना चाहिए और यह पूरी प्रक्रिया को निष्फल बनाने के लिए ऐसे ही नहीं चल सकता.” अदालत ने अपने पहले के आदेश का पालन न होने पर चिंता जताते हुये कहा कि जून के बाद से इस मामले में कोई भी प्रगति नहीं हुई है तथा सरकार के शीर्ष कानून अधिकारी को ‘स्पीकर को सलाह’ देने के लिए कहा . पीठ ने कहा, ”उन्हें सहायता की आवश्यकता है, जो स्वाभाविक है’.
पीठ ने कहा कि अध्यक्ष की ओर से ऐसी धारण बनायी जानी चाहिए कि वह मामले को गंभीरता से ले रहे हैं. अदालत ने कहा, ”जून के बाद से, मामले में कोई कार्रवाई नहीं हुई है. इस मामले में क्या हुआ? कुछ नहीं! यह पहेली नहीं बन सकता . इस मामले में (स्पीकर के समक्ष) सुनवाई होनी चाहिए .” नोटिस जारी करने और याचिकाओं पर फैसले के लिए समयसीमा मांगने के अदालत के पहले के आदेशों का हवाला देते हुए प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि शीर्ष अदालत विधानसभा अध्यक्ष की ओर से उसके निर्देशों का पालन नहीं किए जाने को लेकर चिंतित है.
उन्होंने कहा, ”मैं हमारी अदालत की गरिमा बनाए रखने को लेकर चिंतित हूं.” शीर्ष अदालत शिवसेना के उद्धव ठाकरे गुट और राकांपा के शरद पवार खेमे द्वारा दायर दो याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें कुछ विधायकों के खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही पर शीघ्र निर्णय लेने के लिए अध्यक्ष को निर्देश देने का अनुरोध किया गया था.
ठाकरे गुट की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कार्यवाही में देरी का जिक्र किया और आरोप लगाया कि अब पार्टी को यह दिखाने के लिए सबूत पेश करना होगा कि वह एक पीड़ित पक्ष है और कहा कि एक ”तमाशा” चल रहा है. उन्होंने कहा कि याचिका पर नोटिस 14 जुलाई को जारी किया गया था और आज तक कुछ भी प्रभावी नहीं किया गया है. वरिष्ठ वकील ने कहा कि अगर अध्यक्ष अयोग्यता याचिकाओं पर एकसाथ सुनवाई करने से इनकार करते हैं, तो प्रत्येक मामले को अलग से निस्तारित करना होगा.
सिब्बल ने कहा, ह्लअदालत को यह तय करना होगा कि इस मामले में अधिकरण (अध्यक्ष अयोग्यता मामलों की सुनवाई के लिए अधिकरण के रूप में काम करता है) की क्या जिम्मेदारी है.ह्व एक अन्य वरिष्ठ अधिवक्त अभिषेक सिंघवी ने बृहस्पतिवार को कहा था कि अध्यक्ष ने कई अयोग्यता याचिकाओं को केवल इसलिए एक साथ मिलाने में चार घंटे लगा दिये क्योंकि मामला शीर्ष अदालत के सामने आना था.
पीठ ने तब कहा कि किसी को अध्यक्ष को सलाह देनी होगी क्योंकि वह शीर्ष अदालत के आदेश की अनदेखी नही कर सकते .
सॉलिसिटर जनरल ने समस्याओं एवं अध्यक्ष के पास दायर प्रति दावों का जिक्र किया और कहा, “मुझे उम्मीद नहीं थी कि अदालत यह सुनेगी कि वह (अध्यक्ष) दिन-प्रतिदिन क्या करते हैं….” पीठ ने कहा कि अध्यक्ष ऐसी याचिकाओं पर निर्णय लेने के लिए एक चुनावी अधिकरण हैं और इसलिए शीर्ष अदालत के अधिकार क्षेत्र के लिए उत्तरदायी हैं.
पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा, ”हमने 14 जुलाई को (ठाकरे गुट की याचिका पर) नोटिस जारी किया था. इसके बाद, हमने 18 सितंबर को एक आदेश पारित किया. अब, यह देखते हुए कि अध्यक्ष ने कोई कदम नहीं उठाया है, हम यह कहने के लिए बाध्य होंगे कि उन्हें दो महीने में फैसला लेना होगा.” अदालत ने कहा कि न्यायाधिकरण के समक्ष सुनवाई को पहेली नहीं बनाया जाना चाहिए और यह गंभीर कार्यवाही है.
विपक्ष ने अयोग्यता याचिकाओं को लेकर महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष पर निशाना साधा
महाराष्ट्र के विपक्षी दलों (शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा), शिवसेना (यूबीटी) और कांग्रेस) ने शुक्रवार को विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर पर शिवसेना एवं राकांपा के बागी विधायकों को अयोग्य ठहराने की मांग वाली याचिकाओं पर निर्णय में जानबूझकर देरी करने का आरोप लगाया और कहा कि उन्हें इस मामले पर एक समयसीमा के भीतर फैसला करना चाहिए.
उच्चतम न्यायालय ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और कई विधायकों की अयोग्यता से संबंधित याचिका पर फैसला करने में देरी को लेकर विधानसभा अध्यक्ष के प्रति अप्रसन्नता जताते हुए शुक्रवार को कहा कि वे ”शीर्ष अदालत के आदेशों की अनदेखी नहीं कर सकते.” राकांपा प्रमुख शरद पवार ने शुक्रवार को संवाददाताओं से कहा कि याचिकाओं पर निर्णय लेने में विधानसभा अध्यक्ष की ओर से देरी की गई जिसकी वजह से राकांपा को उच्चतम न्यायालय का रुख करना पड़ा.
उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी के बाद एक सवाल के जवाब में पवार ने कहा, ”निर्देश दिया जाना चाहिए कि निर्णय एक तय समय-सीमा के भीतर लिया जाए और इसमें विलंब नहीं किया जा सकता है. यही रुख शिवसेना का भी है.” उन्होंने कहा कि उच्चतम न्यायालय में सुनवाई के दौरान राकांपा नेता सुप्रिया सुले और जितेंद्र आव्हाड मौजूद थे.
शिवसेना- (यूबीटी) और पवार के नेतृत्व वाला राकांपा गुट दोनों ही बागी विधायकों की अयोग्यता पर शीघ्र निर्णय चाहते हैं.
उच्चतम न्यायालय की टिप्पणियों का हवाला देते हुए शिवसेना (यूबीटी) नेता संजय राउत ने नासिक में संवाददाताओं से कहा, ”यह सरकार (एकनाथ शिंदे और उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और अजीत पवार के नेतृत्व वाली) 72 घंटे में गिर जाएगी. मैंने पहले भी कहा था. अब समय आ गया है. विधानसभा अध्यक्ष ने सरकार को गहन चिकित्सा कक्ष (आईसीयू) में ला दिया और बचाने की कोशिश की, लेकिन अब समय आ गया अध्यक्ष खुद आईसीयू में जाएंगे.”
शिवसेना (यूबीटी) नेता आदित्य ठाकरे ने आरोप लगाते हुए कहा, ”उनसे (विधानसभा अध्यक्ष) उम्मीद की जाती है कि वह स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से काम करेंगे. उन्हें एक विशिष्ट समय सीमा में काम करना होगा और न्याय देना होगा. न्याय में देरी न्याय न मिलने के बराबर है.” कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने पीटीआई-भाषा से कहा कि उच्चतम न्यायाल ने अध्यक्ष राहुल नार्वेकर के खिलाफ एक और सख्त आदेश दिया है, जिससे साफ संकेत मिलता है कि वह जानबूझकर डेढ़ साल पहले हुए शिवसेना विभाजन पर फैसले में देरी कर रहे हैं.
उन्होंने कहा, ”यह दूसरी बार है जब शीर्ष अदालत ने अध्यक्ष को संविधान के उल्लंघन को लेकर चेताया है.” अविभाजित शिवसेना के मुख्य सचेतक के रूप में सुनील प्रभु ने पिछले साल शिंदे और 15 बागी विधायकों के खिलाफ अयोग्यता याचिका दायर की थी, जब उन्होंने जून 2022 में नई सरकार बनाने के लिए विद्रोह किया था और भाजपा से हाथ मिलाया था.
इस साल जुलाई में, अजीत पवार और आठ अन्य राकांपा विधायक राज्य में शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना-भाजपा सरकार में शामिल हो गए थे, जिससे शरद पवार द्वारा स्थापित पार्टी में विभाजन हो गया. इसके बाद शरद पवार के नेतृत्व वाली राकांपा ने नार्वेकर के समक्ष एक याचिका दायर की, जिसमें अजीत पवार और उनका समर्थन करने वाले विधायकों को अयोग्य ठहराने की मांग की गई. बाद में, अजीत पवार समूह ने भी प्रतिद्वंद्वी खेमे के विधायकों के खिलाफ अयोग्यता याचिका दायर की.



