
मुंबई. भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) गवर्नर संजय मल्होत्रा ने सोमवार को कहा कि मूल्य स्थिरता की तरह वित्तीय स्थिरता भी आर्थिक वृद्धि के लिए जरूरी है. उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक बदलाव नीतिगत हस्तक्षेप को चुनौतीपूर्ण बना रहे हैं.
उन्होंने जून के लिए वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट (एफएसआर) की प्रस्तावना में कहा, ”वित्तीय क्षेत्र के नियामक ग्राहकों की सुरक्षा, प्रतिस्पर्धा और नवोन्मेषण को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध हैं. वे दक्षता और वृद्धि में सुधार तथा सुरक्षा और मजबूती के बीच सही संतुलन बनाते हैं.” गवर्नर के अनुसार, कई संरचनात्मक बदलाव वैश्विक अर्थव्यवस्था को नया रूप दे रहे हैं. इसमें व्यापार में बढ़ता विखंडन, प्रौद्योगिकी बदलाव, जलवायु परिवर्तन और भू-राजनीतिक तनाव शामिल हैं.
उन्होंने आगे कहा, ”ये आर्थिक आकलन को कठिन और नीतिगत हस्तक्षेप को चुनौतीपूर्ण बनाते हैं. इसलिए, अनिश्चितता के कोहरे से बाहर निकलने के दौरान भी केंद्रीय बैंकों और वित्तीय क्षेत्र के विनियामकों के लिए अपनी अर्थव्यवस्थाओं और वित्तीय प्रणालियों की सुरक्षा में सतर्क, विवेकपूर्ण और चुस्त बने रहना जरूरी है.” मल्होत्रा ??ने कहा कि वित्तीय स्थिरता के संरक्षक के रूप में केंद्रीय बैंक की कोशिश एक अच्छी तरह से काम करने वाली वित्तीय प्रणाली विकसित करने की है, जो न केवल व्यापक आर्थिक स्थिरता को बढ़ावा दे, बल्कि कुशलतापूर्वक वित्तीय सेवाएं भी प्रदान करे.
वैश्विक वृद्धि का प्रमुख केंद्र बनी हुई है भारतीय अर्थव्यवस्था
भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत वृहद आर्थिक बुनियाद और विवेकपूर्ण नीतियों के कारण वैश्विक वृद्धि का प्रमुख केंद्र बनी हुई है. भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने सोमवार को एक रिपोर्ट में यह बात कही. केंद्रीय बैंक ने अपनी द्विवार्षिक वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट (एफएसआर) में यह भी कहा कि बढ़ी हुई आर्थिक और व्यापार नीति अनिश्चितताएं वैश्विक अर्थव्यवस्था और वित्तीय प्रणाली की मजबूती की परीक्षा ले रही हैं.
आरबीआई ने कहा, ”वित्तीय बाजार अस्थिर बने हुए हैं, विशेष रूप से मुख्य सरकारी बॉन्ड बाजार. ऐसा बदलती नीतियों और भू-राजनीतिक वातावरण के चलते है. इसके साथ ही, बढ़ते सार्वजनिक ऋण स्तर और उच्च परिसंपत्ति मूल्यांकन जैसी मौजूदा कमजोरियों में नए झटकों को बढ़ाने की क्षमता है.” रिपोर्ट के मुताबिक, अनिश्चित और चुनौतीपूर्ण वैश्विक आर्थिक पृष्ठभूमि के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक वृद्धि का प्रमुख केंद्र बनी हुई है. ऐसा मजबूत वृहद आर्थिक बुनियाद और विवेकपूर्ण वृहद आर्थिक नीतियों के चलते है.
आरबीआई ने कहा, ”घरेलू वित्तीय प्रणाली बैंकों और गैर-बैंकों के स्वस्थ बही-खातों के चलते जुझारू क्षमता दिखा रही है. वित्तीय बाजारों में कम अस्थिरता और उदार मौद्रिक नीति द्वारा सर्मिथत वित्तीय स्थितियां सहज हुई हैं. कॉरपोरेट बही-खातों की मजबूती समग्र व्यापक आर्थिक स्थिरता को भी समर्थन देती है.”
बैंक कर्ज वृद्धि धीमी पड़कर 4.9 प्रतिशत पर
भारतीय रिजर्व बैंक ने सोमवार को कहा कि 30 मई को समाप्त पखवाड़े में बैंक कर्ज वृद्धि में नरमी रही. इस दौरान उद्योग को बैंक कर्ज में 4.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि पिछले वर्ष की इसी अवधि में यह 8.9 प्रतिशत रही थी. आरबीआई ने 41 चुनिंदा अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (एससीबी) से प्राप्त सूचना के आधार पर मई, 2025 के लिए बैंक ऋण पर आंकड़े जारी किये हैं. यह कर्ज सभी वाणिज्यिक बैंकों द्वारा दिये गये कुल गैर-खाद्य ऋण का लगभग 95 प्रतिशत है.
सालाना आधार पर, 30 मई, 2025 को समाप्त पखवाड़े तक गैर-खाद्य बैंक ऋण में 9.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि एक साल पहले इसी अवधि (31 मई, 2024) के दौरान इसमें 16.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी. आरबीआई ने कहा, ”उद्योग को दिए गए ऋण में 4.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई जबकि पिछले वर्ष की समान अवधि में यह 8.9 प्रतिशत थी. प्रमुख उद्योगों में, इंजीनियरिंग, निर्माण और रबड़, प्लास्टिक और उनके उत्पादों के बकाया ऋण में वार्षिक आधार पर तेज वृद्धि दर्ज की गई.” आंकड़ों के अनुसार, आलोच्य अवधि में कृषि और संबद्ध गतिविधियों के लिए कर्ज में 7.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जो एक साल पहले इसी अवधि में 21.6 प्रतिशत थी.
केंद्रीय बैंक ने कहा कि सेवा क्षेत्र के लिए ऋण में मामूली 9.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई जो पिछले वर्ष की इसी अवधि में 20.7 प्रतिशत थी. इसका मुख्य कारण गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) को ऋण में धीमी वृद्धि है. दूसरी ओर, कंप्यूटर सॉफ्टवेयर खंड में कर्ज वृद्धि अच्छी रही. इसके अलावा, व्यक्तिगत ऋण खंड में कर्ज में 13.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई जो एक साल पहले इसी अवधि में 19.3 प्रतिशत थी. इसका मुख्य कारण अन्य व्यक्तिगत ऋण, वाहन ऋण और क्रेडिट कार्ड बकाया में वृद्धि का कम रहना है.



