राज्यपाल विधानसभा से दूसरी बार विधेयक वापस आने के बाद उसे राष्ट्रपति को नहीं भेज सकते : न्यायालय

Author: Yogesh Kumar Sahu
UPDATED: Wed, 20 Aug 2025 10:27 PM
राज्यपाल विधानसभा से दूसरी बार विधेयक वापस आने के बाद उसे राष्ट्रपति को नहीं भेज सकते : न्यायालय
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नयी दिल्ली. उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को टिप्पणी की कि कोई भी विधेयक राज्य विधानसभा द्वारा दोबारा पारित करके राज्यपाल को भेजे जाने की स्थिति में वह उसे विचार के लिए राष्ट्रपति को नहीं भेज सकते हैं. शीर्ष अदालत ने विधेयकों को मंजूरी देने के संबंध में राज्यपाल की शक्तियों पर केंद्र से सवाल करते हुए यह टिप्पणी की.

संविधान के अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल को विधानसभा द्वारा पारित विधेयक पर या तो अपनी अनुमति देनी होती है या वह अपनी अनुमति रोक सकता है या फिर उसे राष्ट्रपति के विचारार्थ भेज सकता है. इसके तहत राज्यपाल को विधेयक को पुर्निवचार के लिए विधानसभा में वापस भेजने का भी अधिकार है, बशर्ते कि वह धन विधेयक न हो.

प्रधान न्यायाधीश बी आर गवई की अध्यक्षता वाली पांच-सदस्यीय संविधान पीठ की यह टिप्पणी केंद्र के इस रुख के मद्देनजर आई है कि राज्यपाल विधानसभा द्वारा विधेयक को दूसरी बार पारित करने के बाद भी उसे राष्ट्रपति के पास भेजने के अपने अधिकार का इस्तेमाल कर सकते हैं.

पीठ ने केंद्र का पक्ष रख रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा, ”यदि चौथे विकल्प (विधेयक को पुर्निवचार के लिए विधानसभा में वापस भेजने का) का प्रयोग (राज्यपाल द्वारा) विधानसभा को पुर्निवचार के संदेश के साथ किया जाता है, तो विधेयक पर मंजूरी न देने या इसे राष्ट्रपति के पास भेजने का विकल्प समाप्त हो जाता है….” विधेयकों को मंजूरी देने के संबंध में राष्ट्रपति के संदर्भ पर सुनवाई के दौरान, पीठ में न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति ए एस चंदुरकर भी शामिल थे. पीठ ने कहा कि यदि राज्यपाल विधेयकों को पुर्निवचार के लिए विधानसभा को लौटाए बिना ही उन्हें मंजूरी देने से इनकार कर देते हैं, तो इससे निर्वाचित सरकारें राज्यपाल की मर्जी पर निर्भर हो जाएंगी.

पीठ ने कहा, ”यदि राज्यपाल अनिश्चितकाल तक स्वीकृति रोक सकते हैं, तो बहुमत के समर्थन से गठित सरकारें एक अनिर्वाचित नियुक्त व्यक्ति की दया पर निर्भर होंगी.” शीर्ष अदालत ने कहा, ”अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के पास चार विकल्प हैं- या तो वह अनुमति दे दें या अनुमति रोक लें या फिर वह विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए सुरक्षित रख लें. नियम के तहत शक्ति का प्रयोग करते हुए वह विधेयक को पुर्निवचार के लिए विधानसभा को लौटा सकते हैं.” इसने कहा, ”अब, यदि विधेयक सदन द्वारा फिर से पारित कर दिया जाता है और अनुमति के लिए राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, तो राज्यपाल अनुमति नहीं रोकेंगे. वह विधेयक को दूसरी बार राष्ट्रपति के विचार के लिए नहीं भेज सकते.” न्यायमूर्ति नरसिम्हा ने केन्द्र की इस दलील पर आपत्ति की कि यदि राज्यपाल ने सहमति नहीं देने का निर्णय लिया तो विधेयक पारित नहीं हो सकेगा. उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 200 की ऐसी व्याख्या राज्यपाल की शक्तियों के प्रतिकूल होगी.

न्यायमूर्ति नरसिम्हा ने कहा कि ऐसे मामले हो सकते हैं, जहां राज्यपाल पहले विधेयक को रोक सकते हैं, इसके लिए कारण बता सकते हैं और संशोधन के लिए विधेयक को विधानसभा को वापस भेज सकते हैं और दूसरी स्थिति में, राज्यपाल बाद में अपना विचार बदल सकते हैं और विधानसभा द्वारा विधेयक में आवश्यक संशोधन किए जाने की स्थिति में उसे मंजूरी दे सकते हैं.

उन्होंने कहा, ”राज्यपाल की शक्तियों की व्याख्या सीमित नहीं हो सकती. इसे खुला छोड़ दिया जाना चाहिए. संविधान एक जीवंत दस्तावेज है. इसकी व्याख्या स्थिर नहीं रह सकती.” हालांकि, मेहता ने राज्यपाल और राष्ट्रपति की शक्तियों के बीच अंतर इंगित करने की कोशिश करते हुए कहा कि संविधान के तहत राज्यपाल के पास अधिक शक्तियां हैं और यदि वह विधेयकों पर मंजूरी रोकने के लिए अपने विवेक का प्रयोग नहीं कर सकते तो उन्हें महज डाकिया के पद तक सीमित नहीं किया जा सकता.

उन्होंने दलील दी, ”वह संविधान की व्यवस्था में केंद्र का प्रतिनिधित्व करते हैं और उनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, जिन्हें राष्ट्र द्वारा अप्रत्यक्ष चुनाव के माध्यम से चुना जाता है.” मेहता ने कहा कि राज्यपाल द्वारा विधेयक को ‘रोकने’ की शक्ति का प्रयोग बहुत कम और केवल असाधारण परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए तथा पहले तीन विकल्पों- स्वीकृति, रोक या राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित- के प्रयोग के लिए राज्यपाल के लिए कोई समय सीमा नहीं रखी गई है. वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने मेहता की दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि इस तर्क के आधार पर राष्ट्रपति संविधान के अनुच्छेद 111 के तहत केंद्र के विधेयकों पर अपनी मंजूरी रोक भी सकते हैं.

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि ऐसी धारणा है कि उच्च संवैधानिक प्राधिकारियों को दी गई शक्ति का प्रयोग निष्कपट तरीके से किया जाएगा. उन्होंने कहा, ”हम संविधान की व्याख्या उसी तरह करेंगे जिस तरह से इसकी व्याख्या की जानी चाहिए, बिना राजनीतिक परिदृश्य में जाए.” उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को पूछा कि क्या देश संविधान निर्माताओं की इस उम्मीद पर खरा उतरा है कि राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच सामंजस्य होगा तथा दोनों शक्ति केंद्रों के बीच विभिन्न मुद्दों पर परामर्श भी किया जाएगा.
मेहता ने पीठ को बताया कि विभिन्न वर्गों में की गई आलोचनाओं के विपरीत, राज्यपाल का पद राजनीतिक शरण चाहने वालों के लिए नहीं है, बल्कि संविधान के तहत उनके पास कुछ शक्तियां और दायित्व हैं.

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मई में संविधान के अनुच्छेद 143(1) के तहत शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए शीर्ष अदालत से यह जानने का प्रयास किया था कि क्या राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर विचार करते समय राष्ट्रपति द्वारा विवेकाधिकार का प्रयोग करने के लिए न्यायिक आदेशों द्वारा समय-सीमाएं निर्धारित की जा सकती हैं.

उच्चतम न्यायालय ने तमिलनाडु विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों से निपटने में राज्यपाल की शक्तियों पर आठ अप्रैल को दिए फैसले में पहली बार यह प्रावधान किया था कि राष्ट्रपति को राज्यपाल द्वारा उनके विचारार्थ रखे गए विधेयकों पर संदर्भ प्राप्त होने की तिथि से तीन महीने के भीतर निर्णय लेना होगा.

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