‘धार्मिक मामलों पर सवाल उठने लगे तो सैकड़ों याचिकाएं आ जाएंगी’, सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि अगर लोग धार्मिक प्रथाओं या धर्म से जुड़े मामलों पर सांविधानिक अदालत में सवाल उठाने लगेंगे, तो सैकड़ों याचिकाएं अलग-अलग रीति-रिवाजों पर आने लगेंगी, जिससे धर्म और सभ्यता दोनों पर गंभीर असर पड़ सकते हैं।

संविधान पीठ कर रही याचिकाओं पर सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ इस समय उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है, जिनमें धर्मस्थलों पर महिलाओं के साथ कथित भेदभाव का मुद्दा उठाया गया है। इनमें केरल का सबरीमाला मंदिर का मामला भी शामिल है। इसके साथ ही विभिन्न धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे और उसकी सीमाओं पर भी विचार किया जा रहा है, जिनमें दाऊदी बोहरा समुदाय से जुड़े मामले भी हैं।

पीठ में कौन-कौन जज शामिल हैं?
इस पीठ में मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्य कांत के साथ न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना, न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश, न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, न्यायमूर्ति ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह, न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी वराले, न्यायमूर्ति आर महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।

दाऊदी बोहरा समुदाय ने दायर की थी जनहित याचिका
दाऊदी बोहरा समुदाय की केंद्रीय संस्था ने 1986 में एक जनहित याचिका दायर की थी। जिसमें 1962 के उस फैसले को हटाने की मांग की थी, जिसमें बंबई बहिष्कार निवारण अधिनियम 1949 को रद्द कर दिया गया था। इस कानून के तहत किसी भी समुदाय के सदस्य को समाज से बाहर करने को अवैध माना गया था।

1962 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में कहा गया था कि दाऊदी बोहरा समुदाय के धर्म के अनुसार, उनके धर्मगुरु किसी सदस्य को धार्मिक कारणों से समुदाय से बाहर कर सकते हैं। इसे उनके धर्म का हिस्सा माना गया था। इसलिए 1949 का कानून उस समय संविधान के अनुच्छेद 26(बी) के तहत दिए गए धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन माना गया, जो इस तरह के बहिष्कार को गैरकानूनी बनाता था।

वकील ने क्या दलील दी?
वरिष्ठ वकील राजू रामचंद्रन बदलाव चाहने वाले दाऊदी बोहरा समूह की ओर से पेश हुए। उन्होंने कहा कि यदि कोई प्रथा किसी व्यक्ति के सामाजिक या गैर-धार्मिक आचरण के कारण की जाती है, तो उसे संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक संरक्षण नहीं मिल सकता। उन्होंने आगे कहा कि यदि कोई प्रथा धार्मिक पहलू भी रखती है लेकिन वह मूल अधिकारों को गंभीर रूप से प्रभावित करती है, तो उसे सांविधानिक संरक्षण से बाहर रखा जा सकता है।

न्यायमूर्ति नागरत्ना और न्यायमूर्ति सुंदरेश ने क्या कहा?
इस दलील पर जवाब देते हुए न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, अगर हर कोई सांविधानिक अदालत के सामने कुछ धार्मिक रीति-रिवाजों या धर्म से जुड़े मामलों पर सवाल उठाना शुरू कर दे, तो फिर उस सभ्यता का क्या होगा, जहां धर्म भारतीय समाज से इतनी गहराई से जुड़ा हुआ है?

सैकड़ों याचिकाएं होंगी जो इस अधिकार, उस अधिकार, मंदिर के खुलने और मंदिर के बंद होने पर सवाल उठाएंगी। हमें इस बात का भान है।

आगे न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश ने भी कहा कि हर तरह का धर्म टूट जाएगा और हर सांविधानिक अदालत को बंद करना पड़ेगा । उन्होंने यह भी कहा कि भारत एक प्रगतिशील देश है और यहां संतुलन बनाए रखना जरूरी है। अगर दो पक्षों के बीच विवाद की अनुमति दी जाती है, तो हर कोई हर बात पर सवाल उठाएगा। आपके मामले में, हो सकता है कि आपके साथ कोई गलत काम हुआ हो। लेकिन किसी दूसरे मामले में कोई दूसरा सदस्य कह सकता है कि मैं इससे सहमत नहीं हूं। यह एक पीछे ले जाने वाला कदम है। हमारे देश में, जो प्रगतिशील है और लगातार आगे बढ़ रहा है, हम किस हद तक जा सकते हैं, यही असली सवाल है।

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने आगे कहा कि भारत को किसी भी दूसरे इलाके से अलग क्या बनाता है, वह यह है कि इतनी सारी अलग-अलग तरह की चीजें होने के बावजूद हम एक सभ्यता हैं? उन्होंने कहा कि विविधता देश की ताकत है। हमारे भारतीय समाज में एक चीज जो हमेशा बनी रहती है, वह है इंसानों का (मर्द, औरत और बच्चे) धर्म के साथ रिश्ता। राजू रामचंद्रन ने जवाब में कहा कि भारत संविधान के आधार पर एक सभ्यता है और जो भी चीज संविधान की भावना के खिलाफ जाती है, उसे जारी नहीं रखा जा सकता। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में अदालत का दायित्व है कि वह दखल दे, न कि यह कहकर पीछे हट जाए कि बहुत सारी याचिकाएं आ जाएंगी।

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