जिया के कार्यकाल में भारत-बांग्लादेश के संबंध जटिल, अक्सर तनावपूर्ण रहे : पूर्व भारतीय राजनयिक

नयी दिल्ली. भारत के दो पूर्व राजनयिकों ने कहा कि बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया का राजनीतिक उत्थान, उथल-पुथल भरे सैन्य शासन के बाद लोकतंत्र की पुन: स्थापना के प्रति देश की ”दृढ़ता” का प्रतीक था और साथ ही उन्होंने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) को भी मजबूती दी, जो उनके पति की मृत्यु के बाद पूरी तरह बिखरने के ”गंभीर खतरे” का सामना कर रही थी.

उन्होंने यह भी कहा कि खालिदा जिया के कार्यकाल के दौरान भारत-बांग्लादेश संबंध ”जटिल” और ”अक्सर तनावपूर्ण” रहे, जिसका कारण पूर्वोत्तर भारत में उग्रवादियों को कथित समर्थन और उन्हें बांग्लादेश में पनाह मिलना बताया गया. जिया का 80 वर्ष की आयु में मंगलवार को ढाका में लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया. वह बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री थीं और दशकों तक देश की राजनीति पर उनका वर्चस्व रहा. भारत की पूर्व उच्चायुक्त वीणा सिकरी ने कहा कि जिया के दूसरे कार्यकाल (2001-2006) के दौरान पाकिस्तान का प्रभाव काफी अधिक था और यह भारत के लिए ”बेहद कठिन समय” था. उन्होंने बताया कि इस दौरान द्विपक्षीय सहयोग से जुड़े कई मुद्दों पर चर्चा हुई. सिकरी ने 2003-2006 के बीच ढाका में सेवा दी थी.

सिकरी ने 1992 में जिया की भारत यात्रा और नवंबर 2005 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ढाका यात्रा को भी याद किया. मार्च 2006 में जिया ने सिंह के आमंत्रण पर भारत की राजकीय यात्रा की थी, जिसमें दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय संबंधों के सभी पहलुओं पर व्यापक चर्चा की थी. पूर्व राजनयिक वेणु राजामोनी ने कहा कि जिया के शासन में भारत-बांग्लादेश संबंध ”जटिल और अक्सर तनावपूर्ण” रहे. उन्होंने कहा कि शेख हसीना की अवामी लीग के विपरीत जिया की बीएनपी सरकारों का रुख नयी दिल्ली के प्रति सतर्क और लेन-देन पर आधारित था.

जिया के पहले कार्यकाल में व्यापार और गंगा जल बंटवारे जैसे मुद्दों पर कुछ प्रगति हुई लेकिन सीमा विवाद, उग्रवादियों को कथित संरक्षण और प्रवासन जैसे मुद्दों पर तनाव बना रहा. दूसरे कार्यकाल में खासकर जमात-ए-इस्लामी से गठबंधन के बाद संबंध और खराब हुए. भारत ने बांग्लादेशी सरजमीं से काम कर रहे भारत विरोधी तत्वों को लेकर गंभीर चिंताएं जतायी थीं.

हालांकि, दोनों राजनयिकों ने माना कि सैन्य शासन के बाद लोकतंत्र की बहाली में खालिदा जिया की भूमिका अहम रही. 1982 में जनरल एच.एम. इरशाद के तख्तापलट के बाद उन्होंने लोकतंत्र बहाली का आंदोलन शुरू किया और बीएनपी को एकजुट रखा.
उनकी विरासत पर सिकरी ने कहा कि जिया और शेख हसीना दोनों ने इरशाद की तानाशाही के शांतिपूर्ण अंत में बड़ी भूमिका निभाई.
आगे बीएनपी की राह पर टिप्पणी करते हुए राजामोनी ने कहा कि पार्टी का भविष्य अब उनके बेटे तारिक रहमान पर निर्भर है, जो 17 साल के निर्वासन के बाद हाल ही में लौटे हैं. खालिदा जिया का जन्म 15 अगस्त 1946 को अविभाजित भारत के दिनाजपुर जिले में हुआ था. उनके पिता विभाजन के बाद जलपाईगुड़ी से पूर्वी पाकिस्तान चले गए थे. जलपाईगुड़ी में उनका परिवार चाय का व्यवसाय करता था.

सैन्य तानाशाही के खिलाफ जन आंदोलन छेड़ा था खालिदा जिया ने, तानाशाह इरशाद का हुआ था पतन

खालिदा जिया ने बांग्लादेश में सैन्य तानाशाह के खिलाफ जन आंदोलन छेड़ कर 1990 में तत्कालीन तानाशाह और पूर्व सेना प्रमुख एच.एम. इरशाद का पतन करने में अहम भूमिका निभायी थी. पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के साथ उनकी तीखी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता ने एक पीढ.ी तक देश की राजनीति को आकार दिया. बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की अध्यक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया का 80 वर्ष की आयु में निधन हो गया. उनकी पार्टी ने मंगलवार को एक बयान में यह जानकारी दी.

खालिदा जिया बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री थीं. उन पर दर्ज भ्रष्टाचार के मामलों को उन्होंने राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया था. जनवरी 2025 में उच्चतम न्यायालय ने उनके खिलाफ अंतिम भ्रष्टाचार मामले में उन्हें बरी कर दिया था, जिससे फरवरी में होने वाले आम चुनाव में उनके उम्मीदवार बनने का रास्ता साफ हो गया था.

बीएनपी ने कहा कि 2020 में बीमारी के आधार पर जेल से रिहा होने के बाद जिया के परिवार ने उनकी प्रतिद्वंद्वी और तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार से कम से कम 18 बार विदेश में उनके इलाज की अनुमति मांगी थी, लेकिन सभी अनुरोध खारिज कर दिए गए. 2024 में हसीना के सत्ता से हटने के बाद नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने उन्हें विदेश जाने की अनुमति दी. जिया जनवरी में लंदन गई थीं और मई में स्वदेश लौटी थीं.

वर्ष 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध के बाद स्वतंत्र हुए बांग्लादेश के शुरुआती वर्षों में राजनीतिक अस्थिरता और तख्तापलट जैसे घटनाक्रम देखने को मिले. जिया के पति जियाउर रहमान ने 1977 में सेना प्रमुख के रूप में सत्ता संभाली और 1978 में बीएनपी की स्थापना की. 1981 में एक सैन्य तख्तापलट में उनकी हत्या कर दी गई. इसके बाद खालिदा जिया ने सैन्य तानाशाही के खिलाफ जन आंदोलन खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई, जिसके परिणामस्वरूप 1990 में तत्कालीन तानाशाह और पूर्व सेना प्रमुख एच.एम. इरशाद का पतन हुआ.

खालिदा जिया ने 1991 में पहली बार प्रधानमंत्री पद संभाला. उन चुनावों में और इसके बाद कई चुनावों में उनकी प्रमुख प्रतिद्वंद्वी शेख हसीना रहीं, जो मुक्ति संग्राम के नेता शेख मुजीबुर रहमान की पुत्री थीं. 1996 के शुरुआती चुनाव में व्यापक बहिष्कार के बीच बीएनपी ने 300 में से 278 सीटें जीतीं, लेकिन कार्यवाहक सरकार की मांग के चलते जिया सरकार केवल 12 दिन ही चल सकी. उसी वर्ष जून में नए चुनाव कराए गए.

जिया 2001 में फिर सत्ता में लौटीं और इस दौरान उनकी सरकार में जमात-ए-इस्लामी भी शामिल थी. उनके दूसरे कार्यकाल (2001-06) में भारत-विरोधी बयानबाजी और भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में उग्रवाद को लेकर आरोप लगे. इसी अवधि में उनके बड़े बेटे तारिक रहमान पर समानांतर सत्ता चलाने और भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे. 2004 में ढाका में हुए ग्रेनेड हमले के लिए शेख हसीना ने जिया सरकार और रहमान को जिम्मेदार ठहराया था.

जिया को भ्रष्टाचार के दो अलग-अलग मामलों में 17 साल की सजा सुनाई गई थी. उनकी पार्टी ने आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया, जबकि हसीना सरकार ने कहा था कि इन मामलों में उसका कोई हस्तक्षेप नहीं है. 2020 में जिया को रिहा कर ढाका में एक किराए के घर में रखा गया, जहां से वह नियमित रूप से निजी अस्पताल जाती थीं.

अगस्त 2024 में अपनी सरकार के खिलाफ हुए विद्रोह के बाद हसीना सत्ता से हट गईं और देश छोड़कर चली गईं. इसके बाद अंतरिम सरकार ने जिया को विदेश में इलाज की अनुमति दी. वह कई वर्षों से सक्रिय राजनीति से दूर थीं, लेकिन मृत्यु तक बीएनपी की अध्यक्ष बनी रहीं. पार्टी की कमान 2018 से कार्यवाहक अध्यक्ष के रूप में तारिक रहमान संभाल रहे थे. जिया को आखिरी बार 21 नवंबर को ढाका छावनी में बांग्लादेश सेना के एक वार्षिक कार्यक्रम में देखा गया था, जहां वह व्हीलचेयर पर थीं और थकी हुई नजर आ रही थीं. उनके परिवार में बड़े बेटे तारिक रहमान हैं. उनके छोटे बेटे अराफात का 2015 में निधन हो गया था.

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