
बेंगलुरू/चेन्नई/नयी दिल्ली. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के महत्वाकांक्षी तीसरे चंद्र मिशन के तहत चंद्रयान-3 का लैंडर मॉड्यूल (एलएम) बुधवार शाम को चंद्रमा की सतह पर उतरने को तैयार है. ऐसा होने पर भारत पृथ्वी के एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर पहुंचने वाला दुनिया का पहला देश बनकर इतिहास रच देगा. लैंडर (विक्रम) और रोवर (प्रज्ञान) से युक्त लैंडर मॉड्यूल के बुधवार को शाम छह बजकर चार मिनट पर चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र के निकट सॉफ्ट लैंडिंग करने की उम्मीद है.
यदि चंद्रयान-3 मिशन चंद्रमा पर उतरने और चार साल में इसरो की दूसरी कोशिश में एक रोबोटिक चंद्र रोवर को उतारने में सफल रहता है तो भारत अमेरिका, चीन और पूर्व सोवियत संघ के बाद चंद्रमा की सतह पर ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ करने वाला दुनिया का चौथा देश बन जाएगा. चंद्रमा की सतह पर अमेरिका, पूर्व सोवियत संघ और चीन ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ कर चुके हैं, लेकिन उनकी ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र पर नहीं हुई है.
चंद्रयान-3 चंद्रयान-2 के बाद का मिशन है और इसका उद्देश्य चंद्रमा की सतह पर सुरक्षित एवं सॉफ्ट-लैंडिंग को प्रर्दिशत करना, चंद्रमा पर विचरण करना और यथास्थान वैज्ञानिक प्रयोग करना है. चंद्रयान-2 मिशन सात सितंबर, 2019 को चंद्रमा पर उतरने की प्रक्रिया के दौरान उस समय असफल हो गया था, जब उसका लैंडर ‘विक्रम’ ब्रेक संबंधी प्रणाली में गड़बड़ी होने के कारण चंद्रमा की सतह से टकरा गया था. भारत के पहले चंद्र मिशन चंद्रयान-1 को 2008 में प्रक्षेपित किया गया था.
भारत ने 14 जुलाई को ‘लॉन्च व्हीकल मार्क-3’ (एलवीएम3) रॉकेट के जरिए 600 करोड़ रुपये की लागत वाले अपने तीसरे चंद्र मिशन-‘चंद्रयान-3’ का प्रक्षेपण किया था. इस अभियान के तहत यान 41 दिन की अपनी यात्रा में चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र पर ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ का एक बार फिर प्रयास करेगा, जहां अभी तक कोई देश नहीं पहुंच पाया है.
चंद्रयान-3 की निर्धारित ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ से चंद दिन पहले चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरने की दौड़ में रूस उस वक्त पीछे छूट गया था, जब उसका रोबोट लैंडर चंद्रमा की सतह पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था. रूसी लैंडर लूना-25 अनियंत्रित कक्षा में जाने के बाद चंद्रमा पर दुर्घटनाग्रस्त हो गया था. बीस अगस्त को अंतिम डीबूस्टिंग के बाद एलएम चंद्रमा की कक्षा में थोड़ा और नीचे पहुंच गया है. यह अब 25 गुणे 134 किलोमीटर की कक्षा में है.
इसरो ने कहा है कि मॉड्यूल को आंतरिक जांच से गुजरना होगा और निर्दष्टि लैंडिंग स्थल पर सूर्योदय का इंतजार करना होगा. उसने कहा कि चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट-लैंडिंग करने के लिए प्रक्रिया बुधवार शाम लगभग 5:45 बजे शुरू होने की उम्मीद है. निर्धारित लैंडिंग से एक दिन पहले, इसरो ने मंगलवार को कहा, ”मिशन तय कार्यक्रम के अनुसार आगे बढ. रहा है. प्रणालियों की नियमित जांच की जा रही है. सुचारू संचालन जारी है.” अंतरिक्ष एजेंसी इसरो ने कहा कि यहां इसरो टेलीमेट्री, ट्रैकिंग और कमांड नेटवर्क (आईएसटीआरएसी) स्थित मिशन ऑपरेशंस कॉम्प्लेक्स (एमओएक्स) में उत्साह का माहौल है.
इसरो के अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र के निदेशक नीलेश देसाई ने कहा, “23 अगस्त को लैंडर मॉड्यूल के तकनीकी मानक ”असामान्य” पाये जाने की स्थिति में इसकी ‘लैंडिंग’ 27 अगस्त तक के लिए टाली जा सकती है.” सॉफ्ट-लैंडिंग की महत्वपूर्ण प्रक्रिया को इसरो अधिकारियों सहित कई लोगों ने ”17 मिनट का खौफ” करार दिया है. लैंडिंग की पूरी प्रक्रिया स्वायत्त होगी, जिसके तहत लैंडर को अपने इंजन को सही समय और उचित ऊंचाई पर चालू करना होगा, उसे सही मात्रा में ईंधन का उपयोग करना होगा और अंतत? नीचे उतरने से पहले यह पता लगाना होगा कि किसी प्रकार की बाधा या पहाड़ी क्षेत्र या गड्ढा नहीं हो.
सभी मापदंडों की जांच करने और लैंडिंग का निर्णय लेने के बाद इसरो बेंगलुरु के निकट बयालालू में अपने भारतीय गहन अंतरिक्ष नेटवर्क (आईडीएसएन) से निर्धारित समय पर लैंडिंग से कुछ घंटे पहले सभी आवश्यक कमांड एलएम पर अपलोड करेगा. इसरो के अधिकारियों के अनुसार, लैंडिंग के लिए, लगभग 30 किलोमीटर की ऊंचाई पर लैंडर पावर ब्रेकिंग चरण में प्रवेश करेगा और अपने चार थ्रस्टर इंजन को “रेट्रो फायर” करके गति को धीरे-धीरे कम करके चंद्रमा की सतह तक पहुंचना शुरू करेगा. अधिकरियों के अनुसार इससे यह सुनिश्चित होता है कि लैंडर दुर्घटनाग्रस्त न हो, क्योंकि इसमें चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण भी काम करता है.
उन्होंने कहा कि यह देखते हुए कि लगभग 6.8 किलोमीटर की ऊंचाई पर पहुंचने पर, केवल दो इंजन का उपयोग किया जाएगा, अन्य दो को बंद कर दिया जाएगा, जिसका उद्देश्य लैंडर को ‘रिवर्स थ्रस्ट’ देना होता है, लगभग 150-100 मीटर की ऊंचाई पर पहुंचने पर लैंडर अपने सेंसर और कैमरों का उपयोग करके सतह को स्कैन करेगा ताकि यह जांचा जा सके कि कोई बाधा तो नहीं है और फिर वह सॉफ्ट-लैंडिंग करने के लिए नीचे उतरना शुरू करेगा.
इसरो अध्यक्ष एस. सोमनाथ ने हाल ही में कहा था कि लैंडिंग का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा लैंडर के वेग को 30 किलोमीटर की ऊंचाई से अंतिम लैंडिंग तक कम करने की प्रक्रिया और अंतरिक्ष यान को क्षैतिज से लंबवत करने की क्षमता होगी. सोमनाथ ने समझाया था, ”लैंडिंग प्रक्रिया की शुरुआत में गति लगभग 1.68 किलोमीटर प्रति सेकंड होता है, लेकिन (इस गति पर) (लैंडर) चंद्रमा की सतह पर क्षैतिज होगा. चंद्रयान-3 यहां लगभग 90 डिग्री झुका हुआ है, इसे लंबवत होना होगा. यह पूरी प्रक्रिया गणितीय रूप से एक बहुत ही दिलचस्प गणना होती है. हमने बहुत सारे सिमुलेशन किए हैं. यहीं पर हमें पिछली बार (चंद्रयान -2) दिक्कत हुई थी.” सॉफ्ट-लैंडिंग के बाद, रोवर अपने एक साइड पैनल का उपयोग करके लैंडर के अंतर से चंद्रमा की सतह पर उतरेगा.
चंद्रमा के परिवेश का अध्ययन करने के लिए लैंडर और रोवर का मिशन जीवन एक चंद्र दिवस (लगभग 14 पृथ्वी दिवस) का होगा. हालांकि, इसरो अधिकारी इनका जीवन काल एक और चंद्र दिवस तक बढ.ने की संभावना से इनकार नहीं करते हैं. लैंडर में चंद्रमा के एक निर्दष्टि स्थल पर सॉफ्ट-लैंडिंग करने और रोवर को तैनात करने की क्षमता होगी जो वहां इधर उधर चलते हुए रासायनिक विश्लेषण करेगा. इन दोनों के पास चंद्रमा की सतह पर प्रयोग करने के लिए वैज्ञानिक पेलोड हैं.
सोमनाथ ने कहा कि जब तक सूर्य चमकता रहेगा तब तक सभी प्रणालियां काम करती रहेंगी. उन्होंने कहा, ”जिस क्षण सूर्य डूबेगा, सब कुछ घोर अंधकार में होगा, तापमान शून्य से 180 डिग्री सेल्सियस तक नीचे चला जाएगा, इसलिए प्रणाली का बने रहना संभव नहीं है, और यदि यह आगे भी बना रहता है, तो हमें खुश होना चाहिए. तब हम एक बार फिर सिस्टम पर काम कर पाएंगे और हम आशा करते हैं कि ऐसा ही होगा.”
चंद्रमा के ध्रुवीय क्षेत्र पर्यावरण और उनके द्वारा पेश की जाने वाली कठिनाइयों के कारण बहुत अलग भूभाग हैं और इसलिए उनका अभी तक अन्वेषण नहीं हुआ है. चंद्रमा पर पहुंचने वाले पिछले सभी अंतरिक्ष यान भूमध्यरेखीय क्षेत्र में उतरे हैं.
चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र का भी पता लगाया जा रहा है क्योंकि इसके आसपास के क्षेत्रों में पानी की मौजूदगी की संभावना हो सकती है. गत 14 जुलाई को प्रक्षेपण के बाद, चंद्रयान-3 ने 5 अगस्त को चंद्रमा की कक्षा में प्रवेश किया. वहीं 17 अगस्त को इसके दोनों मॉड्यूल को अलग करने से पहले, 6, 9, 14 और 16 अगस्त को उपग्रह को चंद्रमा के और नजदीक लाने की कवायद की गई थी.
लैंडर मॉड्यूल के तकनीकी मानक ”असामान्य” पाये जाने पर साफ्ट लैंडिंग को टाल सकता है इसरो: अधिकारी
चंद्रयान-3 अंतरिक्ष यान की चंद्रमा की सतह पर बहुप्रतीक्षित ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ की तैयारियों के बीच लैंडर मॉड्यूल के तकनीकी मानक ”असामान्य” पाये जाने की स्थिति में इसकी ‘लैंडिंग’ 27 अगस्त तक के लिए टाली जा सकती है. यह जानकारी एक वरिष्ठ अधिकारी ने दी.
इसरो ने चंद्रयान-3 अंतरिक्ष यान की ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ 23 अगस्त को भारतीय समयानुसार शाम 06.04 बजे करने की योजना बनाई है. चंद्र मिशन 14 जुलाई को पूर्वाह्न 2.35 बजे श्रीहरिकोटा से प्रक्षेपित किया गया था. इसरो अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र के निदेशक नीलेश देसाई के अनुसार, वैज्ञानिकों का ध्यान चंद्रमा की सतह के ऊपर अंतरिक्ष यान की गति को कम करने पर होगा.
उन्होंने अहमदाबाद में ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, ”लैंडर 23 अगस्त को 30 किलोमीटर की ऊंचाई से चंद्रमा की सतह पर उतरने की कोशिश करेगा और उस समय इसकी गति 1.68 किलोमीटर प्रति सेकंड होगी. हमारा ध्यान उस गति को कम करने पर होगा क्योंकि चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण बल की भी इसमें भूमिका होगी.”
उन्होंने कहा, ”यदि हम उस गति को नियंत्रित नहीं करते हैं, तो ‘क्रैश लैंडिंग’ की आशंका होगी. यदि 23 अगस्त को (लैंडर मॉड्यूल का) कोई भी तकनीकी मानक असामान्य पाया जाता है, तो हम लैंडिंग को 27 अगस्त तक के लिए स्थगित कर देंगे.” एक सवाल के जवाब में, देसाई ने उम्मीद जताी कि वैज्ञानिक लैंडर मॉड्यूल को चंद्रमा की सतह पर सफलतापूर्वक उतारने में सफल होंगे.
उन्होंने कहा, ”लैंडिंग भारतीय समयानुसार शाम 06.04 बजे शुरू होगी. उससे दो घंटे पहले, हम निर्देश अपलोड करेंगे. हम टेलीमेट्री सिग्नल का विश्लेषण करेंगे और चंद्रमा की स्थितियों पर विचार करेंगे. यदि कोई तकनीकी मानक ”असामान्य” होता है, तो हम इसे 27 अगस्त के लिए टाल देंगे और अगर सब कुछ ठीक रहा तो (उस दिन) उतारने की कोशिश करेंगे.” उन्होंने कहा कि लैंडर मॉड्यूल के उतरने के अंतिम 17 मिनट “बहुत महत्वपूर्ण” हैं.
उन्होंने कहा, “जब लैंडर उतरना शुरू करेगा, तो चार इंजन वाले थ्रस्टर इसकी गति कम करेंगे.” उन्होंने कहा, ”जब लैंडर दो इंजनों की मदद से चंद्रमा की सतह से 800 मीटर की ऊंचाई पर होगा, तो गति शून्य तक पहुंच जाएगी. 800 मीटर से 150 मीटर तक, यह (लैंडर मॉड्यूल) सीधे नीचे उतरेगा.” उन्होंने कहा कि लैंडर मॉड्यूल पर लगे सेंसर का उपयोग करके एकत्र किया गया डेटा बहुत महत्वपूर्ण होगा और उसी के आधार पर लैंडिंग स्थल का चयन किया जाएगा. उन्होंने कहा, ”हमारे पास सेंसर हैं जो चंद्रमा की सतह से लैंडर की गति और दूरी के बारे में सटीक जानकारी भेजेंगे.”
उन्होंने कहा, ”विभिन्न स्थितियों को ध्यान में रखते हुए (चंद्रमा की सतह पर सुरक्षित लैंडिंग) की योजना बनाई गई है. हमें उम्मीद है कि हम 23 अगस्त को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर 70 डिग्री अक्षांश पर सुरक्षित तरीके से उतरेंगे.” एक अन्य प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा, ”इस बार बहुत सारे अपग्रेड किए गए हैं. हार्डवेयर सिस्टम को सुदृढ़ किया गया है. हम (चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग में) सफल होंगे.” यदि साफ्ट लैंडिंग 27 अगस्त को स्थानांतरित होता है, उन्होंने कहा, ”हमने एक और लैंडिंग स्थल चुना है जो मुख्य लैंडिंग साइट से 400 किलोमीटर दूर है.’ चंद्रमा पर दुर्घटनाग्रस्त हो गए रूसी लूना-25 के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि रूस के बाद काफी संसाधन है, इसके बावजूद वे असफल हो गए.
उन्होंने कहा, ”वे चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर जाने की कोशिश कर रहे थे. निराश होना स्वभाविक बात है (क्योंकि मिशन विफल हो गया). इसरो में, हम पिछले चार वर्षों से चंद्रयान -3 मिशन को सफल बनाने के लिए काम कर रहे हैं.” उन्होंने कहा, ”पिछला चंद्रयान-2 मिशन सॉफ्ट लैंडिंग के दौरान विफल हो गया था. हमने अपनी गलतियों से सीखा है. (इस बार) हमने कई बदलाव किए हैं और नए सेंसर जोड़े हैं.”
उन्होंने कहा, ”हम इस बार आश्वस्त हैं. हमें उम्मीद है कि हम इस बार सफल होंगे. लोगों की शुभकामनाएं भी हमारे साथ हैं.” इसरो ने चंद्रयान-3 के लैंडर के चंद्रमा की सतह पर उतरने के तय समय से एक दिन पहले मंगलवार को कहा कि चंद्रयान-3 मिशन निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार आगे बढ़ रहा है. इसरो ने कहा, ”मिशन तय कार्यक्रम के अनुसार आगे बढ़ रहा है. प्रणालियों की नियमित जांच की जा रही है. सुचारू संचालन जारी है.” चंद्रयान-3 लैंडर मॉड्यूल की चंद्रमा की सतह पर ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ भारत को उन देशों के विशिष्ट समूह में शामिल कर देगी, जिन्होंने चंद्रमा की सतह तक पहुंचने की उपलब्धि हासिल की है. इन देशों में अमेरिका, तत्कालीन सोवियत संघ और चीन शामिल हैं.
इसरो का अगला चंद्र मिशन जापानी अंतरिक्ष एजेंसी के साथ साझेदारी में
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) अपने अगले चंद्र मिशन को संभवत: अपने जापानी समकक्ष के साथ साझेदारी में अंजाम देगा. इसके लिए तेजी से काम किया जा रहा है. ‘जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी’ (जाक्सा)और इसरो ने अगले चंद्र मिशन ‘लूनर पोलर एक्सप्लोरेश मिशन’ (लुपेक्स) के लिए साझेदारी की है. जक्सा और इसरो क्रमश: रोवर और लैंडर का विकास कर रहे हैं.
रोवर अपने साथ न केवल इसरो और जाक्सा के उपकरणों को चांद तक ले जाएगा बल्कि अमेरिकी एजेंसी नासा और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ईएसए) के उपकरण भी उसके साथ होंगे.
जापान की राष्ट्रीय अंतरिक्ष नीति पर कैबिनेट समिति के उपाध्यक्ष, जापान की राष्ट्रीय खगोलीय वेधशाला के महानिदेशक साकू त्सुनेता इस महीने के शुरु में बेंगलुरु स्थित इसरो के मुख्यालय आए थे और उन्होंने भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी के प्रमुख सोमनाथ एस. के साथ हुई बैठक में लुपेक्स मिशन की प्रगति पर चर्चा की.
इसरो के एक अधिकारी ने बताया, ”अन्य मुद्दों सहित लुपेक्स मिशन के लिए छोटे लैंडर के निर्माण पर भी चर्चा की गई.” जाक्सा के मुताबिक, लुपेक्स मिशन का लक्ष्य चंद्रमा पर स्थायी गतिविधियों के लिए आधार बनाने के उद्देश्य से उसके अनुकूल ध्रुवीय इलाके की खोज की संभावना का पता लगाना, चंद्रमा की सतह पर मौजूद जल संसाधन की उपलब्धता को लेकर जानकारी हासिल करना और चंद्रमा एवं वाहन (अंतरिक्ष यान) के पहुंचाने और वहां रात भर रहने जैसी ग्रहीय सतह अन्वेषण प्रौद्योगियों का प्रदर्शन करना है.
अंतरिक्ष विभाग के अहमदाबाद स्थित स्वायत्त संस्थान भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला (पीआरएल) ने लुपेक्स के लिए कई उपकरणों का प्रस्ताव किया है जिनमें प्रमुख रूप से चंद्रमा के ध्रुवीय क्षेत्र में हमेशा में छाया में रहने वाली सतह या उपसतह को मापने वाले यंत्र शामिल हैं. इसरो अधिकारी के मुताबिक, लुपेक्स मिशन को 2025 में भेजने की योजना है.
चंद्रयान-3 के चदंमा की सतह पर उतरने को लेकर उत्साहित और आशान्वित हूं: सुनीता विलियम्स
चंद्रमा की सतह पर बुधवार को चंद्रयान-3 की बहुप्रतीक्षित लैंडिंग को लेकर भारतीय अमेरिकी अंतरिक्षयात्री सुनीता विलियम्स ने अपना उत्साह और आशा व्यक्त करते हुए इसे रोमांचक समय बताया. अंतरिक्ष अभियानों में अपने प्रशंसनीय योगदान के लिए मशहूर विलियम्स ने प्रज्ञान रोवर के चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र में अन्वेषण कार्य को लेकर आशा जताई. उन्होंने अंतरिक्ष की खोज के क्षेत्र को आकार देने में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका को भी सराहा.
नेशनल ज्योग्राफिक इंडिया द्वारा साझा किये गये एक बयान में विलियम्स ने चंद्रमा की सतह पर खोज के महत्व पर जोर दिया और कहा कि यह न केवल इससे सामने आने वाली जानकारी को लेकर, बल्कि पृथ्वी से परे जीवन की तलाश के लिए भी महत्वपूर्ण है.
विलियम्स ने कहा, ”चंद्रमा पर ‘लैंडिंग’ से हमें अमूल्य अंतर्दृष्टि मिलेगी. मैं वास्तव में रोमांचित हूं कि भारत अंतरिक्ष अन्वेषण और चंद्रमा पर स्थायी जीवन की खोज में सबसे आगे है. यह वास्तव में रोमांचक समय है.”
चांद के दक्षिणी ध्रुव पर चंद्रयान-3 मिशन : विशेषज्ञ ने चंद्रमा के कई रहस्यों से पर्दा उठाया
भारत की बुधवार को चंद्रयान-3 को चांद की सतह पर उतारने की योजना है जिसको लेकर उत्सुकता बढ़ गई है. इस बीच, विशेषज्ञ डॉ.वी.टी.वेंकटेश्वरन ने चंद्रमा की रहस्यमयी दुनिया के कुछ पहुलओं से अवगत कराया है. विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के तहत स्वायत्त संगठन ‘विज्ञान प्रसार’ के वैज्ञानिक और भारतीय ज्योतिर्वज्ञिान परिषद के जनसंवाद समिति के सदस्य डॉ.वी.टी.वेंकटेश्वरन ने चंद्रमा के भूवैज्ञानिक विकास से संबंधित अहम सवालों का जवाब दिया जो उसके दक्षिण ध्रुव, जल और बर्फ की मौजूदगी के संदर्भ में अहम है. उन्होंने साथ ही भारत की महत्वकांक्षी चंद्रमा अन्वेषण योजना के बारे में भी जानकारी दी.
1)चंद्रमा के भूवैज्ञानिक इतिहास और विकास की अवधारणा क्या है? दूसरे शब्दों में कहें कि वह कितना पुराना है और कब एवं कैसे इसका निर्माण हुआ? अनुमान के मुताबिक चांद की उम्र करीब 4.5 अरब साल है, यानी मोटे तौर पर पृथ्वी की उम्र के बराबर. पृथ्वी के चंद्रमा के निर्माण का एक प्रमुख सिद्धांत है कि मंगल ग्रह के आकार का एक खगोलीय पिंड युवा धरती से टकराया था और इस टक्कर से निकले मलबे से अंतत: चंद्रमा का निर्माण हुआ. हालांकि, चंद्रमा से मिले भूगर्भीय सबूत संकेत देते हैं कि यह पृथ्वी से महज छह करोड़ साल युवा हो सकता है.
2) चंद्रमा पर पृथ्वी की तुलना में वस्तु का भार कितना होगा और क्यों? चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी के मुकाबले बहुत कम है. चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी के मुकाबले एक बटा छठा हिस्सा है. इसका नतीजा है कि चंद्रमा पर किसी वस्तु का वजन पृथ्वी के मुकाबले उल्लेखनीय रूप से कम होगा. यह चंद्रमा के छोटे आकार और द्रव्य भार की वजह से है. उदाहरण के लिए अगर किसी व्यक्ति का पृथ्वी पर वजन 68 किलोग्राम है तो उसका चंद्रमा की सतह पर वजन महज 11 किलोग्राम होगा.
3) भारतीय वैज्ञानिक क्यों चंद्रमा के दक्षिण ध्रुव पर लैंडर उतारना चाहते हैं? चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव अपनी विशेषता और संभावित वैज्ञानिक मूल्य के कारण वैज्ञानिक खोज के केंद्र में बना हुआ है. माना जाता है कि दक्षिणी ध्रुव पर जल और बर्फ के बड़े भंडार हैं जो स्थायी रूप से अंधेरे में रहता है. भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों के लिए जल की मौजूदगी का बहुत अधिक महत्व है क्योंकि इसे पेयजल, ऑक्सीजन और रॉकेट ईंधन के तौर पर हाइड्रोजन जैसे संसाधनों में तब्दील किया जा सकता है. यह इलाका सूर्य की रोशनी से स्थायी रूप से दूर रहता है और तापमान शून्य से 50 से 10 डिग्री नीचे रहता है, इसकी वजह से रोवर या लैंडर में मौजूद इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के लिए आदर्श रसायनिक परिस्थिति उपलब्ध होती है जिससे वे बेहतर तरीके से काम कर सकते हैं.
4) चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर क्या है? क्या वहां का भू्भाग या भूगर्भीय परिस्थितियां चंद्रमा के बाकी इलाकों की तरह ही हैं या हमें इस बारे में कोई जानकारी नहीं है? चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव का भूभाग और भूगर्भीय संरचना उसके अन्य इलाकों से अलग है. स्थायी रूप से छाया में रहने वाले क्रेटर (उल्कापिंडों के टकराने से बने गड्ढों) में शीत अवस्था रहती है जिससे पानी के बर्फ के रूप में जमा होने की अनुकूल स्थिति उत्पन्न होती है. दक्षिणी ध्रुव की विशिष्ट भौगोलिक परिस्थिति की वजह से यहां लंबे समय तक सूर्य की रोशनी आती है जिसका इस्तेमाल सौर ऊर्जा के लिए किया जा सकता है. यह इलाका उबड़-खाबड़ बनावट से लेकर अपेक्षाकृत सपाट है जिससे अध्ययन के लिए विभिन्न वैज्ञानिक अवसर प्रदान करता है.
5) क्यों चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव स्थायी रूप से छाया में रहता है? यह चंद्रमा के भूविज्ञान पर निर्भर करता है. चंद्रमा की धुरी पृथ्वी के चारों ओर उसकी कक्षा में हल्की सी झुकी हुई है. इसका नतीजा है कि दक्षिणी ध्रुव के कुछ इलाकों हमेशा छाया में रहते हैं. यह छाया बहुत ही ठंडे वातावरण का निर्माण करती है जहां पर तापमान बहुत नीचे जा सकता है. जमा देने वाली यह परिस्थिति बर्फ के रूप में पानी को अरबों साल तक संरक्षित रखने में सहायक है.
6) क्या चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर पानी/बर्फ की मौजूदगी है? चंद्रयान-1 ने इसका संकेत दिया था.
हां, चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव इलाके में बर्फ के रूप में पानी की मौजूदगी की पृष्टि हो चुकी है. भारत द्वारा 2008 में भेजे गए चंद्रयान-1 सहित विभिन्न चंद्रमा मिशन से मिले आंकड़ों से संकेत मिला है कि हमेशा छाया में रहने वाले इलाके में जल अणु की मौजूदगी है. इस खोज ने चांद के उत्साहजनक स्थायी अन्वेषण की संभावनाओं को बल दिया है.
7) क्या पानी/बर्फ भविष्य में चंद्रमा पर होने वाली खोज के लिए अहम है? बर्फ के रूप में जल भविष्य में चंद्रमा खोज और उसके आगे के लिए भी अहम संसाधन है. इसे सांस लेने वाली हवा, पेयजल और सबसे अहम रॉकेट ईंधन के लिए हाइड्रोजन व ऑक्सीजन में तब्दील किया जा सकता है. इससे अंतरिक्ष यात्रा में क्रांति आ सकती है क्योंकि इन संसाधानों को पृथ्वी से ले जाने की जरूरत नहीं होगी और लंबी अवधि के मिशन संभव हो सकेंगे.
8) क्या भारत की भविष्य में चंद्रमा पर मानव मिशन भेजने की योजना है? भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने गगनयान मिशन के तहत अंतरिक्ष में अंतरिक्ष यात्रियों को भेजने की मंशा जताई है लेकिन अब तक उसकी चंद्रमा पर अंतरिक्ष यात्रियों को भेजने की कोई योजना नहीं है.
चंद्रयान-3 मिशन के बाद इसरो की कई प्रक्षेपण योजनाएं
चंद्रयान-3 मिशन के बाद भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की प्रक्षेपण सूची बेहद लंबी है. आने वाले दिनों में इसरो द्वारा किये जाने वाले प्रक्षेपणों में सूर्य का अध्ययन करने के लिए एक मिशन, जलवायु अवलोकन उपग्रह का प्रक्षेपण, गगनयान मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम के तहत एक प्रायोगिक यान और भारत-अमेरिका सिंथेटिक एपर्चर रडार का प्रक्षेपण शामिल है.
इसरो के एक अधिकारी ने मंगलवार को बताया कि इसके अलावा एक्सपोसैट (एक्स-रे पोलारीमीटर उपग्रह) भी प्रक्षेपण के लिए तैयार है जो चरम स्थितियों में चमकदार खगोलीय एक्स-रे स्रोतों की विभिन्न गतिशीलता का अध्ययन करने वाला देश का पहला सर्मिपत पोलारीमेट्री मिशन है.
सूर्य का अध्ययन करने वाली पहली अंतरिक्ष-आधारित भारतीय वेधशाला, आदित्य-एल1, प्रक्षेपण के लिए तैयार हो रही है, इसका प्रक्षेपण संभवत? सितंबर के पहले सप्ताह में किया जाएगा. इसरो अध्यक्ष सोमनाथ एस. के अनुसार, अंतरिक्ष एजेंसी ने एक जलवायु अवलोकन उपग्रह इनसैट-3डीएस के प्रक्षेपण की भी योजना बनाई है.
देश के पहले मानव अंतरिक्ष उड़ान मिशन गगनयान के लिए ‘क्रू एस्केप सिस्टम’ के सत्यापन के लिए एक परीक्षण वाहन मिशन का प्रक्षेपण भी जल्द ही होने की उम्मीद है. सोमनाथ ने 15 अगस्त को इसरो मुख्यालय में अपने स्वतंत्रता दिवस संबोधन में कहा, ”(फिर) हमें भारत-अमेरिका निर्मित सिंथेटिक एपर्चर रडार ‘निसार’ प्रक्षेपित करना है. इसलिए हमारे प्रक्षेपण की सूची लंबी है.”
सोमनाथ ने कहा था, ”आने वाले दिनों में हम अपनी सुरक्षा के लिए भी बड़ी संख्या में उपग्रह बनाने जा रहे हैं.” इसरो अधिकारियों के अनुसार, नासा-इसरो एसएआर (निसार) एक निगरानी उपग्रह है जिसे अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा और इसरो द्वारा संयुक्त रूप से विकसित किया जा रहा है.
उन्होंने कहा कि निसार 12 दिनों में पूरे विश्व का मानचित्रण करेगी और पृथ्वी के पारिस्थितिक तंत्र, बर्फ द्रव्यमान, वनस्पति, समुद्र स्तर में वृद्धि, भूजल तथा भूकंप, सुनामी, ज्वालामुखी और भूस्खलन सहित प्राकृतिक खतरों में परिवर्तन को समझने के लिए स्थानिक और अस्थायी रूप से सुसंगत डेटा प्रदान करेगी.
गगनयान मानव अंतरिक्ष (मानवयुक्त) उड़ान मिशन शुरू करने से पहले, इसरो ने दो मानवरहित मिशन की योजना बनाई है.
इसरो के एक अधिकारी ने कहा, ”हम अगले साल की शुरुआत तक (दो में से पहले) मानवरहित क्रू मॉड्यूल मिशन के लिए तैयारी कर रहे हैं.”



