
नयी दिल्ली. संसद का मानसून सत्र 21 जुलाई से 12 अगस्त तक आयोजित किया जाएगा. केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रीजीजू ने बुधवार को यह जानकारी दी. उन्होंने यहां संवाददाताओं से कहा कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता वाली संसदीय मामलों की कैबिनेट समिति ने इन तारीखों की सिफारिश की है. उन्होंने कहा कि इन सिफारिशों को राष्ट्रपति को भेजा जाएगा.
रीजीजू ने मानसून सत्र की घोषणा ऐसे समय में की है जब विपक्षी दलों के नेता ऑपरेशन सिंदूर पर चर्चा करने के लिए सरकार से विशेष सत्र बुलाने की मांग कर रहे हैं. उन्होंने कहा, ”हमारे लिए हर सत्र विशेष सत्र है.” रीजीजू ने कहा कि मानसून सत्र में नियमों के तहत सभी महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की जा सकती है. उन्होंने कहा कि दोनों सदनों की कार्य मंत्रणा समिति उन मुद्दों पर निर्णय लेगी जिन पर चर्चा होनी है.
न्यायमूर्ति वर्मा को हटाने के मुद्दे पर राजनीतिक दलों से चर्चा शुरू कर दी है: रीजीजू
केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजीजू ने बुधवार को न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने में सभी राजनीतिक दलों को साथ लेने के सरकार के संकल्प को रेखांकित करते हुए कहा कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को ‘राजनीतिक चश्मे’ से नहीं देखा जा सकता.
उन्होंने कहा कि सरकार चाहती है कि कथित भ्रष्टाचार के मामले में फंसे न्यायमूर्ति वर्मा को हटाने के उद्देश्य से की जा रही यह कवायद एक ‘सहयोगात्मक प्रयास’ हो. उन्हें उच्चतम न्यायालय द्वारा नियुक्त समिति ने दोषी ठहराया है. रीजीजू ने यहां संवाददाताओं से कहा कि उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के खिलाफ 21 जुलाई से शुरू हो रहे संसद के मानसून सत्र में प्रस्ताव लाने के लिए सभी राजनीतिक दलों के साथ चर्चा शुरू कर दी है. उन्होंने कहा कि सरकार चाहती है कि सभी दल न्यायमूर्ति वर्मा को हटाने के लिए ‘संयुक्त रूप से’ प्रस्ताव लाएं.
रीजीजू ने कहा कि वह छोटे दलों से संपर्क करेंगे, जबकि सभी प्रमुख दलों को न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की योजना के बारे में पहले ही सूचित कर दिया गया है. उन्होंने कहा, ”सरकार का मानना ??है कि भ्रष्टाचार से जुड़ा मामला किसी एक राजनीतिक दल का एजेंडा नहीं होता. भ्रष्टाचार के खतरे से लड़ना सभी दलों का रुख है, चाहे वह न्यायपालिका हो या कोई और क्षेत्र.” मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि सरकार इस मुद्दे पर सभी राजनीतिक दलों को साथ लेना चाहेगी क्योंकि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को ‘राजनीतिक चश्मे’ से नहीं देखा जा सकता. उन्होंने कहा कि अधिकांश दल इस मुद्दे पर आंतरिक चर्चा के बाद अपना रुख बताएंगे.
एक सवाल के जवाब में रीजीजू ने कहा कि प्रस्ताव लोकसभा में लाया जाएगा या राज्यसभा में, यह निर्णय प्रत्येक सदन के कामकाज के आधार पर लिया जाएगा. न्यायाधीश (जांच) अधिनियम 1968 के अनुसार, जब किसी न्यायाधीश को हटाने का प्रस्ताव किसी भी सदन में स्वीकार कर लिया जाता है, तो अध्यक्ष या सभापति, जैसा भी मामला हो, तीन सदस्यीय समिति का गठन करेंगे जो उन आधारों की जांच करेगी जिनके आधार पर उसे हटाने (या, लोकप्रिय शब्द में, महाभियोग) की मांग की गई है. समिति में भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) या उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश, 25 उच्च न्यायालयों में से एक के मुख्य न्यायाधीश और एक ‘प्रतिष्ठित न्यायविद’ शामिल हैं.
रीजीजू ने कहा कि वर्तमान मामला ‘थोड़ा अलग’ है क्योंकि तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना द्वारा गठित एक आंतरिक समिति पहले ही अपनी रिपोर्ट सौंप चुकी है. उन्होंने कहा, ”इसलिए इस मामले में क्या किया जाना है, हम इस पर विचार करेंगे.” मंत्री ने कहा कि प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए, लेकिन ”पहले से की गई जांच को कैसे एकीकृत किया जाए” इस पर निर्णय लेने की आवश्यकता है.
उन्होंने कहा, ”नियम के अनुसार, एक समिति का गठन किया जाना चाहिए और फिर समिति को एक रिपोर्ट प्रस्तुत करनी चाहिए और रिपोर्ट को सदन में पेश किया जाएगा तथा महाभियोग पर चर्चा शुरू होगी. यहां, एक समिति पहले ही गठित की जा चुकी है, संसद द्वारा नहीं हुई, लेकिन इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता क्योंकि इसे प्रधान न्यायाधीश ने गठित किया.” रीजीजू ने कहा कि प्राथमिक उद्देश्य महाभियोग प्रस्ताव लाना है. उन्होंने उम्मीद जताई कि 21 जुलाई से शुरू होकर 12 अगस्त तक चलने वाले मानसून सत्र में दोनों सदनों में निष्कासन की कार्यवाही पारित हो जाएगी.
मार्च में राष्ट्रीय राजधानी में न्यायमूर्ति वर्मा के आवास पर आग लगने की घटना हुई थी, जब वह दिल्ली उच्च न्यायालय में न्यायाधीश थे, जिसके कारण उनके घर के एक हिस्से में नकदी की जली हुई बोरियां मिलीं थीं. न्यायाधीश ने नकदी के बारे में अनभिज्ञता का दावा किया, लेकिन उच्चतम न्यायालय द्वारा नियुक्त समिति ने कई गवाहों से बात करने और उनके बयान दर्ज करने के बाद उन्हें दोषी ठहराया.
माना जाता है कि तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश खन्ना ने उन्हें इस्तीफा देने के लिए संकेत दिया था, लेकिन न्यायमूर्ति वर्मा अपनी जिद पर अड़े रहे. न्यायालय ने तब से उन्हें उनके मूल कैडर, इलाहाबाद उच्च न्यायालय में स्थानांतरित कर दिया, जहां उन्हें कोई न्यायिक कार्य नहीं सौंपा गया है. न्यायमूर्ति खन्ना ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर महाभियोग प्रस्ताव की सिफारिश की थी, जो उच्च न्यायपालिका के सदस्यों को सेवा से हटाने की प्रक्रिया है.
विशेष सत्र की मांग से भाग खड़ी हुई सरकार, कठिन सवालों के जवाब देने होंगे: कांग्रेस
कांग्रेस ने सरकार द्वारा संसद के मानसून सत्र की घोषणा किए जाने के बाद बुधवार को आरोप लगाया कि सरकार पहलगाम आतंकी हमले के बाद घटनाक्रम पर चर्चा के लिए विशेष सत्र बुलाने की विपक्ष की मांग से भाग खड़ी हुई है, लेकिन उसे कठिन सवालों के जवाब देने होंगे.
पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने दावा किया कि कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि 47 दिन पहले संसद सत्र की तारीखों की घोषणा की जाए.
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रीजीजू ने बुधवार को कहा कि संसद का मानसून सत्र 21 जुलाई से 12 अगस्त तक आयोजित किया जाएगा.
उन्होंने यहां संवाददाताओं से बातचीत में यह भी कहा कि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता वाली संसदीय मामलों की कैबिनेट समिति ने इन तारीखों की सिफारिश की है.
कांग्रेस महासचिव रमेश ने ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, ”आम तौर पर संसद सत्र की तारीखों की घोषणा कुछ दिन पहले की जाती है. कभी भी सत्र शुरू होने से 47 दिन पहले तारीखें घोषित नहीं की गईं.” उन्होंने दावा किया कि ऐसा केवल पहलगाम के निर्मम आतंकी हमले और हत्या करने वाले आतंकवादियों को न्याय के कठघरे में लाने में विफलता पर चर्चा करने के लिए तत्काल विशेष सत्र बुलाने की कांग्रेस और ‘इंडिया’ गठबंधन के घटक दलों द्वारा बार-बार की जा रही मांग से बचने के लिए किया गया है.
उन्होंने कहा कि ”ऑपरेशन सिंदूर के प्रभाव और इसके घोर राजनीतिकरण, सिंगापुर में सीडीएस के खुलासे, भारत एवं पाकिस्तान के बीच संबंध, पाकिस्तान वायु सेना में चीन की पैठ, मध्यस्थता पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लगातार दावों और हमारी विदेश नीति तथा कूटनीतिक संपर्क की कई विफलताओं” पर चर्चा से सरकार बचना चाह रही है.
रमेश ने कहा, ”मानसून सत्र में भी सर्वोच्च राष्ट्रीय महत्व के ये मुद्दे छाए रहेंगे. सरकार एक विशेष सत्र से भाग खड़ी हुई, लेकिन अब से छह सप्ताह बाद उन्हें बहुत कठिन सवालों का जवाब देना होगा.” विपक्षी ‘इंडिया’ गठबंधन के 16 घटक दलों ने मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखकर आग्रह किया था कि पहलगाम आतंकी हमले के बाद के घटनाक्रम पर चर्चा के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाया जाए. पहलगाम आतंकी हमले के बाद से कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल संसद का विशेष सत्र बुलाने की मांग कर रहे थे.
कांग्रेस ने कहा कि प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में सर्वदलीय बैठक बुलाई जाए और संसद का विशेष सत्र बुलाया जाए ताकि सेना के शौर्य को सलाम करने और 1994 के संसद के प्रस्ताव को दोहराने के साथ ही सरकार से कुछ बिंदुओं पर सवाल किये जा सकें. इस प्रस्ताव में कहा गया है कि पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है.
तृणमूल कांग्रेस ने सुझाव दिया था कि आतंकवाद के खिलाफ भारत के रुख को बताने के लिए विभिन्न देशों की यात्रा करने वाले सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडलों के देश में लौटने के बाद जून में सत्र आयोजित किया जाना चाहिए. बीते 22 अप्रैल को कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 लोग मारे गए थे, जिनमें अधिकतर पर्यटक थे. भारतीय सशस्त्र बलों ने छह मई की देर रात को ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के तहत पाकिस्तान और उसके कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) के कई आतंकी ठिकानों को नष्ट कर दिया था. इसके बाद दोनों देशों के बीच सैन्य संघर्ष हुआ और 10 मई को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने ‘संघर्षविराम’ की घोषणा की. हालांकि भारत ने स्पष्ट किया कि किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता नहीं थी और पाकिस्तान के सैन्य अभियान महानिदेशक (डीजीएमओ) द्वारा अनुरोध किये जाने के बाद सैन्य कार्रवाई रोकी गई है.


