
नयी दिल्ली. केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रीजीजू ने रविवार को कहा कि न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा को हटाने के सिलसिले में संसद में प्रस्ताव पेश करने के लिए 100 से ज्यादा सांसदों ने पहले ही एक नोटिस पर हस्ताक्षर कर दिए हैं. इसके साथ ही लोकसभा में महाभियोग प्रस्ताव पेश करने के लिए आवश्यक समर्थन हासिल हो गया है.
सर्वदलीय बैठक के बाद रीजीजू ने संवाददाताओं से कहा, “हस्ताक्षर प्रक्रिया जारी है. 100 से अधिक सांसद पहले ही हस्ताक्षर कर चुके हैं.” उन्होंने कहा कि यह कार्य मंत्रणा समिति (बीएसी) को तय करना है कि प्रस्ताव कब पेश किया जाएगा. किसी न्यायाधीश को हटाने के प्रस्ताव पर लोकसभा में कम से कम 100 और राज्यसभा में 50 सांसदों के हस्ताक्षर होने चाहिए. यह प्रस्ताव लोकसभा में पेश किए जाने की संभावना है.
सोमवार से शुरू हो रहे संसद के मानसून सत्र के साथ, सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वह संसद के इसी सत्र में यह प्रस्ताव लाएगी और “न्यायपालिका में भ्रष्टाचार” के खिलाफ इस कदम में उसे विपक्ष समेत विभिन्न दलों का समर्थन मिल रहा है. जब रीजीजू से पूछा गया कि क्या सत्र के पहले सप्ताह में यह प्रस्ताव लाया जा सकता है, तो उन्होंने कहा, “मैं प्राथमिकता के आधार पर किसी भी कार्य पर टिप्पणी नहीं कर सकता, क्योंकि जब तक यह प्रस्ताव अध्यक्ष की अनुमति से बीएसी की ओर से पारित नहीं हो जाता, मेरे लिए कुछ कहना मुश्किल है.” उन्होंने पहले ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया था कि वर्मा को हटाने के प्रस्ताव पर सभी राजनीतिक दल सहमत हैं.
उन्होंने कहा, “न्यायपालिका में भ्रष्टाचार एक अत्यंत संवेदनशील और गंभीर मामला है. न्यायपालिका ही वह जगह है, जहां लोगों को न्याय मिलता है. अगर न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है, तो यह सभी के लिए एक गंभीर चिंता का विषय है. इसलिए न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा को हटाने के प्रस्ताव पर सभी राजनीतिक दलों के हस्ताक्षर होने चाहिए.” मार्च में दिल्ली उच्च न्यायालय के तत्कालीन न्यायाधीश वर्मा के आवास में आग लगने की घटना के बाद नोटों की गड्डियां बरामद हुई थीं.
तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना द्वारा नियुक्त तीन उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की एक समिति ने उन्हें दोषी पाया था.
खन्ना ने यह मामला राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के समक्ष भेजा था और वर्मा के इस्तीफा देने से इनकार करने पर उन्हें हटाने की सिफारिश की थी. वर्मा को बाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय स्थानांतरित कर दिया गया, लेकिन न्यायिक कार्य नहीं सौंपा गया. उन्गोंने खुद का बचाव किया और समिति के निष्कर्षों के खिलाफ उच्चतम न्यायालय का रुख किया है.


