लोकसभा चुनाव में जाति, धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण देखने को मिला

नयी दिल्ली. लोकसभा चुनाव के नतीजों का बेसब्री से इंतजार हो रहा है और इस बीच, राजनीतिक विश्लेषकों ने कहा है कि इस साल का चुनाव ”सबसे अधिक ध्रुवीकरण वाले चुनावों में एक” है जिसमें विभिन्न दलों ने वोट हासिल करने के लिए ”जाति और धर्म” का जमकर इस्तेमाल किया. उन्होंने कहा कि एक ओर जहां भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का जोर विभिन्न पिछड़ी जातियों को हिंदुत्व के खेमे में एकीकृत करने पर रहा, तो वहीं दूसरी ओर विपक्षी ‘इंडिया’ गठबंधन ने सत्ता में आने पर जातिगत सर्वेक्षण कराने का वादा कर अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के वोट हासिल करने की कोशिश की.

चुनाव सुधारों पर काम करने वाले गैर लाभकारी संगठन ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (एडीआर) के सह-संस्थापक जगदीप छोकर ने कहा कि यह चुनाव अब तक के सबसे अधिक ध्रुवीकृत चुनावों में से एक है. उन्होंने पीटीआई-भाषा से कहा, ”जाति, धर्म और क्षेत्र के आधार पर ध्रुवीकरण हुआ है. ऐसा पहले नहीं हुआ था. जाति, चुनावों में मतदाताओं को गोलबंद करने वाला हमेशा से एक महत्वपूर्ण कारक रहा है. लेकिन यहां जाति और धर्म आधारित राजनीति, दोनों हावी रहे.” अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ इफ्तिखार अहमद अंसारी ने जिक्र किया कि जातियों को फिर से संगठित किये जाने ने भाजपा को एक चुनौती पेश की है.

उन्होंने कहा कि ‘इंडिया’ गठबंधन द्वारा उठाये गए बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दे तथा सत्ता में आने पर जाति आधारित सर्वेक्षण कराने के इसके वादे ने भाजपा के सावधानीपूर्वक तैयार किये गये ओबीसी वोट बैंक में सेंध लगा दी. भाजपा के ‘सोशल इंजीनियरिंग’ का जोर हिंदुत्व के खेमे के तहत विभिन्न पिछड़ी जातियों को एकीकृत करने पर रहा है. अंसारी ने कहा कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित और अलपसंख्यक) गठबंधन कर ‘सोशल इंजीनियरिंग’ की. बिहार में, राजनीतिक परिदृश्य को ‘माय-बाप’ (मुस्लिम, यादव, बहुजन, अगड़ा, आधी आबादी और पूअर :गरीब तबका:) गठबंधन ने आकार दिया.

उन्होंने दावा किया कि महाराष्ट्र में, मराठा और मुसलमान, शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के तहत एकजुट हुए. तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे राज्यों में, पेरियार जैसे समाज सुधारकों की विरासत के चलते ओबीसी राजनीति का प्रभाव बना हुआ है. अंसारी ने कहा कि मंडल आयोग का प्रभाव उत्तर भारत में अधिक पड़ा है, जहां यादव और कुर्मी जैसी प्रभावशाली जातियों को फायदा हुआ, जबकि अत्यंत पिछड़ी जातियां इस दौड़ में पीछे छूट गईं. जीसस एंड मेरी कॉलेज में राजनीति विज्ञान की प्राध्यापक सुशीला रामास्वामी ने कहा कि जाति और धर्म महत्वपूर्ण कारक हैं, लेकिन उनका प्रभाव सीमित है.

उन्होंने पीटीआई-भाषा से कहा, ”भारतीय परिप्रेक्ष्य में जाति एक मूलभूत सच्चाई है लेकिन जाति आधारित गोलबंदी की सीमाएं हैं. जाति एवं धर्म में अस्मिता की राजनीति की अपनी सीमाएं हैं. लोग अब अच्छा जीवन जीने के आकांक्षी हैं.” जाति आधारित समीकरण अब भी अहम हैं लेकिन मंदिर केंद्रित राजनीति के उभार ने धार्मिक आधार पर वोट के लिए लामबंदी के महत्व को रेखांकित किया है. इन चुनाव ने यह साबित किया है कि ‘मंडल’ और ‘कमंडल’ अब भी राजनीति पर हावी हैं.

‘मंडल’ वोटों की जाति आधारित राजनीति के संदर्भ में इस्तेमाल किया जाता है. 1980 के दशक में मंडल आयोग के दौरान यह अवधारणा लोकप्रिय हुई थी. दूसरी ओर, ‘कमंडल’ मंदिर की राजनीति का प्रतीक है जिसकी हिंदू पहचान से संबंधित मुद्दों को उभारने और धार्मिक भावनाओं को एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका रही है. हालिया वर्षों में, भारतीय राजनीति पर ‘कमंडल’ तत्व बहुत अधिक हावी रहा है जहां राजनीतिक दलों ने मंदिर केंद्रित विमर्श और एजेंडा को लेकर हिंदू मतदाताओं को लुभाया, विशेष रूप से ऐसे क्षेत्रों में जहां धार्मिक प्रतीकवाद काफी मायने रखता है.

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