
केरन सेक्टर/एलओसी. उत्तरी कश्मीर क्षेत्र में नियंत्रण रेखा (एलओसी) की रखवाली करने वाले सैनिक न केवल पड़ोसी शत्रु पर नजर रखते हैं, बल्कि उन्हें प्रतिकूल मौसम को लेकर भी सजग रहना होता है जहां र्सिदयों में करीब 15-20 फुट तक बर्फ जमा हो जाती है और कम से कम चार महीने के लिए क्षेत्र का संपर्क देश के बाकी हिस्सों से टूट जाता है.
र्सिदयों के नजदीक आने के साथ ही सैनिकों की लड़ाई भी कठिन होने वाली है. जम्मू कश्मीर के कुपवाड़ा जिले के केरन सेक्टर में एक चौकी पर तैनात एक सैनिक ने पीटीआई-भाषा से कहा, ‘‘यह एक कठिन लड़ाई है. इन इलाकों में जीवन बहुत कठिन है.’’ सेना की ये चौकियां घुसपैठ के पारंपरिक मार्गों की रक्षा की पहली पंक्ति हैं. इनमें से कुछ चौकियां 12,000 फुट तक की ऊंचाई पर हैं.
ऊंची-ऊंची चोटियों, घनी वनस्पति के साथ सघन जंगल और कई जलधाराओं के साथ यह क्षेत्र मनुष्य के लिए एक कठिन चुनौती है.
सेना के एक अधिकारी ने कहा, ‘‘स्थलाकृति के साथ ही, यहां का मौसम भी बहुत प्रतिकूल है, जब बर्फबारी होती है तो यहां बहुत अधिक ठंड हो जाती है. बर्फ 20 फुट तक जमा हो जाती है और तीन-चार महीने तक जमी रह सकती है.’’ सेना के अधिकारियों और सैनिकों की पहचान का सामरिक कारणों से खुलासा नहीं किया जा सकता .
र्सिदयों के मौसम में, ऐसी चौकियों या उनके आधार शिविरों पर सैनिकों को आवश्यक सामान का भंडारण करना पड़ता है क्योंकि भारी बर्फबारी के कारण सड़क कट जाती है. ऐसे दिनों में हेलीकॉप्टर ही परिवहन का एकमात्र साधन होता है. अधिकारी ने बताया, ‘‘जब बर्फ जम जाती है तो सड़क, कई बंकर और अन्य बुनियादी ढांचा भी दिखाई नहीं देता है. ऐसे ऊंचे खंभे हैं जो ऐसी परिस्थितियों में हमारे लिए चिह्न (मार्कर) के रूप में कार्य करते हैं.’’ उन्होंने कहा कि प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद मातृभूमि की रक्षा करना प्राथमिकता है और इसे हर हाल में निभाना है. उन्होंने कहा, “अग्रिम चौकियों पर कभी-कभी ड्यूटी कई घंटों तक लंबी ंिखच सकती है, खासकर अगर कोई जानकारी (आतंकवादियों की आवाजाही की) हो.” फरवरी 2021 में हुए संघर्षविराम समझौते के बाद से, इस साल अब तक घुसपैठ पर काफी हद तक नियंत्रण रहा है. लेकिन पाकिस्तान के अपने पुराने रास्तों पर लौटने की आशंका कायम है.
सुरक्षा प्रतिष्ठान के अधिकारियों ने कहा, “यह आशंका हमेशा बनी रहती है कि बफर्Þ गिरने से पहले पाकिस्तान घुसपैठ बढ़ाने की कोशिश कर सकता है.” उन्होंने कहा कि वर्षों से ऐसा होता आ रहा है और इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि ऐसा दोबारा नहीं होगा.
उन्होंने कहा, ‘‘हम ऐसी किसी भी स्थिति के लिए सतर्क हैं. एआईओएस (घुसपैठ रोधी प्रणाली) मजबूत है और हम ज्ञात रास्तों (घुसपैठ के) पर कड़ी निगरानी रख रहे हैं.’’
जम्मू-कश्मीर में 743 किलोमीटर लंबी एलओसी में से करीब 350 किलोमीटर कश्मीर घाटी में है और उनमें से 55 किलोमीटर केरन सेक्टर में है. अधिकारियों ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में घुसपैठ की संख्या में गिरावट देखी गई है. वर्ष 2017 में घुसपैठ के 419 प्रयास किए गए जबकि 2018 में 328; 2019 में 216; 2020 में 99 और 2021 में 77 प्रयास किए गए. इस साल भी यह संख्या ज्यादा नहीं है. इस साल कश्मीर में अब तक घुसपैठ की छह कोशिशों को नाकाम किया जा चुका है. जम्मू कश्मीर के पुलिस प्रमुख दिलबाग सिंह ने भी कहा है कि एलओसी पर घुसपैठ कम हुई है.



