उच्चतम न्यायालय ने सरकारी रोजगार में “तदर्थवाद” की आलोचना की

नयी दिल्ली. उच्चतम न्यायालय ने सरकारी रोजगार में ‘तदर्थवाद’ की आलोचना करते हुए मंगलवार को कहा कि अस्थायी पदनाम से नियमित काम लेने पर लोक प्रशासन में विश्वास कम होता है. न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने उत्तर प्रदेश उच्च शिक्षा सेवा आयोग में कुछ कर्मचारियों की सेवाओं को नियमित करते हुए कहा कि राज्य एक संवैधानिक नियोक्ता है और वह उन लोगों के कंधों पर बजट का बोझ नहीं डाल सकता जो सबसे बुनियादी और बार-बार होने वाले सार्वजनिक कार्यों का निष्पादन करते हैं.

पीठ ने कहा, ”हम यह याद दिलाना आवश्यक समझते हैं कि सरकार (यहां केंद्र और राज्य दोनों सरकारों का उल्लेख है) केवल एक बाजार भागीदार नहीं है, बल्कि एक संवैधानिक नियोक्ता है. जहां कार्य दिन-प्रतिदिन और वर्ष-दर-वर्ष होता है, वहां संस्थान की स्वीकृत संख्या और नियुक्ति की प्रक्रियाओं में इस वास्तविकता की झलक होनी चाहिए.” उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अस्थायी पदनामों से लंबे समय तक नियमित काम लेने पर न केवल सार्वजनिक प्रशासन में विश्वास का क्षरण होता है, बल्कि समान संरक्षण के वादे का भी उल्लंघन होता है.

आदेश में कहा गया, ”वित्तीय तंगी निस्संदेह सार्वजनिक नीति में एक स्थान रखती है, लेकिन यह कोई ऐसा चमत्कारी उपाय नहीं है जो निष्पक्षता, तर्क और विधिसम्मत ढंग से कार्य के आयोजन की जिम्मेदारी को समाप्त कर दे. इसके अलावा, यह विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है कि जहां प्रशासनिक पारर्दिशता नहीं होती, वहां ‘तदर्थवाद’ फलता-फूलता है.” पीठ ने कहा कि सरकारी विभागों को सटीक प्रतिष्ठान रजिस्टर, उपस्थिति रजिस्टर और आउटसोर्सिंग व्यवस्थाएं रखनी और प्रस्तुत करनी चाहिए और यह सबूत सहित स्पष्ट करना चाहिए कि जहां काम स्थायी है, वहां वे अधिकृत पदों के बजाय अस्थिर नियुक्ति को प्राथमिकता क्यों देते हैं. न्यायालय ने कहा कि यदि सरकार द्वारा किसी “बाध्यता” का हवाला दिया गया हो, तो अभिलेखों में यह स्पष्ट रूप से दर्शाया जाना चाहिए कि किन विकल्पों पर विचार किया गया, समान रूप से तैनात कर्मचारियों के साथ भिन्न व्यवहार क्यों किया गया, और चुना गया रास्ता भारत के संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21 के अनुरूप कैसे है.

शीर्ष अदालत ने कहा कि सार्वजनिक रोजगार का आयोजन निष्पक्षता, तर्कसंगत निर्णय प्रक्रिया और कार्य की गरिमा के सम्मान के साथ किया जाना चाहिए. आदेश में कहा गया है, ”जहां पदों का सृजन मुख्यत? कार्यपालिका का कार्य है, वहीं पदों की स्वीकृति से इनकार को मनमानेपन को लेकर न्यायिक समीक्षा से छूट नहीं दी जा सकती.” उच्चतम न्यायालय उस मामले की सुनवाई कर रहा था जिसमें कुछ कर्मचारियों ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक आदेश को चुनौती दी थी. इन र्किमयों को 1989 से 1992 के बीच आयोग द्वारा दैनिक वेतनभोगी के रूप में नियुक्त किया गया था. उच्च न्यायालय ने उनकी याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि वे दैनिक वेतनभोगी थे और उत्तर प्रदेश उच्च शिक्षा सेवा आयोग में नियमितीकरण के लिए कोई नियम नहीं था.

उच्चतम न्यायालय के फैसले में सभी याचिकाकर्ताओं को 24 फरवरी 2002 से नियमित कर दिया गया. अदालत ने कहा, ”इस उद्देश्य के लिए राज्य सरकार और उत्तरवर्ती संस्थान (उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग) को संबंधित संवर्गों में (श्रेणी 3: चालक या समकक्ष, और चतुर्थ श्रेणी: अटेंडेंट/गार्ड या समकक्ष) अतिरेक पद बिना किसी शर्त या पूर्व शर्त के सृजित करने होंगे.”

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