खाद्य पदार्थों की कीमतों पर दबाव अब कुछ समय ही रहेगा : वित्त मंत्रालय

Author: Yogesh Kumar Sahu
UPDATED: Tue, 22 Aug 2023 07:14 PM
खाद्य पदार्थों की कीमतों पर दबाव अब कुछ समय ही रहेगा : वित्त मंत्रालय
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नयी दिल्ली. वित्त मंत्रालय ने मंगलवार को कहा कि टमाटर एवं दालों के दाम नरम होने से खाद्य पदार्थों की कीमतों पर दबाव अब केवल कुछ ही समय तक रहने की संभावना है. हालांकि, सरकार और रिजर्व बैंक को बढ़ते मुद्रास्फीतिकारी दबावों से निपटने के लिए अधिक सतर्क रहने की जरूरत है.

मंत्रालय ने जुलाई महीने की अपनी मासिक आर्थिक समीक्षा में कहा कि आगे चलकर घरेलू खपत तथा निवेश की मांग से वृद्धि जारी रहने की उम्मीद है. चालू वित्त वर्ष में सरकार द्वारा पूंजीगत व्यय के लिए प्रावधान बढ़ाने से अब निजी निवेश में बढ़ोतरी हो रही है.
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित खुदरा मुद्रास्फीति जुलाई, 2023 में 15 माह के उच्चतम स्तर 7.44 प्रतिशत पर पहुंच गई. हालांकि, मुख्य मुद्रास्फीति 39 महीनों के निचले स्तर 4.9 प्रतिशत पर रही.

मंत्रालय ने कहा कि अनाज, दालों और सब्जियों की कीमत में जुलाई में पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में दोहरे अंक की वृद्धि देखी गई. घरेलू उत्पादन में व्यवधान ने भी मुद्रास्फीति पर दबाव बढ़ा दिया. मासिक आर्थिक समीक्षा के अनुसार, ”सरकार ने खाद्य मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए पहले से ही एहतियाती कदम उठाए हैं, जिससे ताजा भंडार की आवक के साथ बाजार में कीमतों का दबाव जल्द ही कम होने की संभावना है… खाद्य पदार्थों में कीमतों में तेजी अस्थायी रहने की उम्मीद है.”

हालांकि, वैश्विक अनिश्चितता तथा घरेलू व्यवधान आने वाले महीनों में मुद्रास्फीतिक दबाव को बढ़ा सकते हैं, जिसके लिए सरकार तथा भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है. मंत्रालय ने कहा कि टमाटर, हरी मिर्च, अदरक और लहसुन जैसी वस्तुओं की कीमतें 50 प्रतिशत से अधिक बढ़ीं. इसलिए कुछ विशिष्ट वस्तुओं की कीमतों में असामान्य वृद्धि के कारण जुलाई, 2023 में खाद्य मुद्रास्फीति ऊंची रही.

वित्त मंत्रालय ने कहा, ”टमाटर की नई खेप अगस्त के अंत या सितंबर की शुरुआत तक बाजार में आने से इसकी कीमतें कम होने की उम्मीद है. इसके अलावा अरहर दाल का आयात बढ़ने से दालों की कीमतें भी नरम होने की संभावना है. इसके साथ हाल के सरकारी प्रयासों से आने वाले महीनों में खाद्य मुद्रास्फीति जल्द ही कम हो सकती है.” मंत्रालय के मुताबिक, घरेलू खपत और निवेश मांग से वृद्धि की रफ्तार कायम रहने की उम्मीद है.

हालांकि, वैश्विक एवं क्षेत्रीय अनिश्चितताओं और घरेलू गतिरोधों के चलते आने वाले महीनों में मुद्रास्फीतिक दबाव बढ़ सकता है. ऐसी स्थिति में सरकार और केंद्रीय बैंक दोनों को ही अधिक सजग रहने की जरूरत होगी. आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति ने अगस्त की शुरुआत में हुई बैठक में नीतिगत रेपो दर को 6.5 प्रतिशत पर यथावत रखने का फैसला किया. मुद्रास्फीति के कुछ हद तक काबू में रहने की वजह से ऐसा किया गया था. हालांकि, आरबीआई ने अगस्त और उसके बाद अल-नीनो की वजह से प्रतिकूल मौसमी घटनाओं की वजह से खाद्य कीमतों पर दबाव की आशंका भी जताई थी.

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