मतदाता सूची स्थिर नहीं बनी रह सकती, बिहार में SIR की कवायद मतदाताओं के ‘अनुकूल’ : न्यायालय

नयी दिल्ली. उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि मतदाता सूची स्थिर नहीं बनी रह सकती और पुनरीक्षण होना निश्चित है तथा बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के लिए पहचान के स्वीकार्य दस्तावेजों की संख्या को सात से बढ.ाकर 11 करना असल में ”मतदाताओं के अनुकूल है, न कि उन्हें बाहर करने वाला.” एसआईआर से जुड़े विवाद पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि निर्वाचन आयोग को यह अधिकार है कि वह ऐसी प्रक्रिया अपनी जरूरत और समझ के मुताबिक चला सके.

न्यायालय ने एक याचिकाकार्ता की इस दलील से भी असहमति जताई कि चुनावी राज्य बिहार में एसआईआर का कोई कानूनी आधार नहीं है और इसे रद्द किया जाना चाहिए. राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों के नेताओं तथा गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) ‘एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ (एडीआर) ने बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की कवायद को शीर्ष अदालत में चुनौती दी है. एडीआर ने दलील दी कि इस कवायद को देशभर में करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए.

एनजीओ की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि एसआईआर पर निर्वाचन आयोग की अधिसूचना को कानूनी आधार के अभाव में और कानून में कभी भी विचारणीय नहीं होने के कारण रद्द कर देना जाना चाहिए. उन्होंने दलील दी कि इसे जारी रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती. उन्होंने कहा कि निर्वाचन आयोग अपनी स्थापना के बाद से कभी भी ऐसी कोई कवायद नहीं कर सका और यह पहली बार किया जा रहा है और अगर ऐसा होने दिया गया तो केवल ईश्वर ही जानता है कि इसका अंत कहां होगा.

पीठ ने कहा, ”इस तर्क से तो विशेष गहन पुनरीक्षण कभी नहीं किया जा सकता. एक बार की कवायद केवल मूल मतदाता सूची के लिए की जाती है. हमारे विचार से मतदाता सूची कभी स्थिर नहीं हो सकती.” शीर्ष अदालत ने कहा, ”इसमें संशोधन होना निश्चित है, अन्यथा निर्वाचन आयोग उन लोगों के नाम कैसे हटाएगा, जिनकी मृत्यु हो गई है, पलायन कर चुके हैं या अन्य निर्वाचन क्षेत्रों में चले गए हैं?” पीठ ने शंकरनारायणन से कहा कि निर्वाचन आयोग के पास ऐसी कवायद करने का अधिकार है, जैसा वह उचित समझे.
न्यायालय ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 21(3) का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया है कि ”निर्वाचन आयोग किसी भी समय, कारणों को दर्ज करके, किसी भी निर्वाचन क्षेत्र या निर्वाचन क्षेत्र के किसी हिस्से के लिए मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण का निर्देश दे सकता है….” न्यायमूर्ति बागची ने शंकरनारायणन से पूछा, ”अगर मुख्य कानून निर्वाचन आयोग को तरीका तय करने की छूट देता है, लेकिन नियमों में वह तरीका स्पष्ट नहीं बताया गया है – तो क्या चुनाव आयोग को यह आज.ादी नहीं होगी कि वह नियमों के दायरे में रहकर, लेकिन ज.रूरत के मुताबिक थोड़ा अतिरिक्त कदम उठाकर प्रक्रिया तय कर सके?”

शंकरनारायणन ने दलील दी कि यह प्रावधान केवल ”किसी भी निर्वाचन क्षेत्र” या ”निर्वाचन क्षेत्र के किसी हिस्से” के लिए मतदाता सूची में संशोधन की अनुमति देता है और निर्वाचन आयोग नये सिरे से मतदाता सूची में नाम शामिल करने के लिए समूचे राज्य की मतदाता सूची को हटा नहीं सकता. न्यायमूर्ति बागची ने कहा, ”दरअसल, यह संवैधानिक अधिकार और संवैधानिक शक्ति के बीच की लड़ाई है.” न्यायाधीश ने कहा कि निर्वाचन आयोग की शक्ति संविधान के अनुच्छेद 324 से प्राप्त होती है और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में संक्षिप्त पुनरीक्षण तथा विशेष पुनरीक्षण, दोनों का उल्लेख है तथा इस मामले में निर्वाचन आयोग ने केवल ”गहन” शब्द जोड़ा है.

एनजीओ की ओर से पेश हुए अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने आरोप लगाया कि निर्वाचन आयोग ने ”शरारत” की और मसौदा सूची से ‘सर्च’ की सुविधा को हटा दिया तथा 65 लाख लोगों की सूची को हटा दिया गया, जिनके नाम मृत, विस्थापित या अन्य निर्वाचन क्षेत्रों में स्थानांतरित होने के कारण हटा दिए गए थे. उन्होंने कहा, ”यह घटना कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा एक संवाददाता सम्मेलन में, एक लाख से अधिक लोगों को फर्जी मतदाता बताए जाने के ठीक एक दिन बाद हुई.” उन्होंने दलील दी कि आम आदमी को मतदाता सूची में अपना नाम खोजने का अधिकार नहीं दिया गया.

न्यायमूर्ति कांत ने कहा कि उन्हें ऐसी किसी संवाददाता सम्मेलन की जानकारी नहीं है, लेकिन जहां तक मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 की बात है, धारा 10 के अनुसार आयोग को निर्वाचन क्षेत्र स्थित कार्यालय में मसौदा सूची की एक प्रति प्रकाशित करना अनिवार्य है. न्यायमूर्ति बागची ने कहा, ”उन्हें निर्वाचन क्षेत्र स्थित कार्यालय में मसौदा सूची प्रकाशित करना होगा. यह कानून के तहत न्यूनतम आवश्यकता है. हालांकि, हमें अच्छा लगता अगर इसे व्यापक प्रचार के लिए वेबसाइट पर जारी किया जाता.” निर्वाचन आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने दावा किया है कि बिहार की ग्रामीण आबादी तकनीक की अधिक जानकारी नहीं रखती है और अब वे उन्हीं लोगों के ऑनलाइन सर्च करने में असमर्थ होने की बात कर रहे हैं.

सुनवाई के दौरान पीठ ने याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी से कहा कि बिहार में पूर्व में किए गए मतदाता सूची के संक्षिप्त पुनरीक्षण में दस्तावेजों की संख्या सात थी और विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में यह 11 है, जो दर्शाता है कि एसआईआर मतदाता अनुकूल है. पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ताओं की इस दलील के बावजूद कि आधार को स्वीकार न करना अपवादात्मक था, ऐसा प्रतीत होता है कि दस्तावेजों की बड़ी संख्या ‘वास्तव में समावेशी’ थी.

शीर्ष अदालत ने कहा कि मतदाताओं को सूची में शामिल 11 दस्तावेजों में से कोई एक जमा करना आवश्यक था. सुनवाई बृहस्पतिवार को भी जारी रहेगी. गत 12 अगस्त को, शीर्ष अदालत ने कहा कि मतदाता सूची में नागरिकों या गैर-नागरिकों को शामिल करना या बाहर करना निर्वाचन आयोग के अधिकार क्षेत्र में है और बिहार में मतदाता सूची की एसआईआर में आधार और मतदाता पहचान पत्र को नागरिकता के निर्णायक प्रमाण के रूप में स्वीकार नहीं करने के आयोग के रुख का न्यायालय ने समर्थन किया.

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