पौराणिक कथाओं में महिलाओं की आवाज को शामिल किया जाना चाहिए: तेलुगु लेखिका वोल्गा

Author: Yogesh Kumar Sahu
UPDATED: Sun, 21 Sep 2025 09:01 PM
पौराणिक कथाओं में महिलाओं की आवाज को शामिल किया जाना चाहिए: तेलुगु लेखिका वोल्गा
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नयी दिल्ली. तेलुगु लेखिका और नारीवादी विचारक ललिता कुमारी का कहना है कि भारतीय पौराणिक कथाओं को उन महिलाओं की आंतरिक दुनिया को प्रतिबिंबित करने के लिए फिर से सुनाए जाने की आवश्यकता है, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से नजरअंदाज किया गया है.

साहित्य जगत में अपने उपनाम ‘वोल्गा’ से लोकप्रिय ललिता कुमारी ने पीटीआई.भाषा से बात करते हुए कहा, “यह पौराणिक कथाओं को चुनौती देने के बारे में नहीं है, बल्कि इसे दूसरों के नजरिए से देखने के बारे में है.” ” ये कहानियां पारंपरिक रूप से पुरुषों के नजरिए से कही जाती रही हैं, जबकि महिलाओं को आदर्श माना जाता था और उनकी पूजा की जाती थी, लेकिन उनके अंतर्मन को नजरअंदाज कर दिया गया.” ‘द लिबरेशन ऑफ सीता’ की लेखिका ने आगे कहा, “मैं वाल्मीकि और व्यास का बहुत सम्मान करती हूं, वे अद्भुत लेखक थे. मेरा प्रयास समकालीन परिस्थितियों को लागू करके इन कहानियों को फिर से कहना और यह पता लगाना है कि महिलाएं कैसे रहती थीं और कैसा महसूस करती थीं.” हार्पर कॉलिन्स द्वारा प्रकाशित उनकी नवीनतम पुस्तक रामायण के एक पात्र शबरी पर केंद्रित है जिसका उल्लेख केवल चार ‘श्लोकों’ में किया गया है.

वोल्गा ने कहा कि वह शबरी की भक्ति और भगवान राम के लिए उनकी प्रतीक्षा के पीछे की भावनात्मक गहराई से प्रभावित थीं.
लेखिका ने कहा, “पूरे वन का वर्णन सैकड़ों श्लोकों में किया गया है, लेकिन शबरी के बारे में केवल चार श्लोक हैं. उन्हें राम के प्रति उनकी चाहना और भक्ति के लिए याद किया जाता है, लेकिन मैं उनकी पृष्ठभूमि – एक वनवासी के रूप में उनके संघर्ष, उनकी पीड़ा और उनके गुरु, जो एक अछूत समुदाय से थे और एक ऋषि बन गए – के बारे में जानना चाहती थी.” वोल्गा ने प्रसिद्ध कृति “द लिबरेशन ऑफ सीता” के महाकाव्य का नारीवादी पुनर्कथन प्रस्तुत किया. उन्होंने कहा कि उन्हें अपनी व्याख्याओं के लिए कभी भी धमकी या सेंसरशिप का सामना नहीं करना पड़ा.

उन्होंने कहा, “मैं इन ग्रंथों के प्रति कभी अनादर या उन्हें चुनौती नहीं देती. यहां तक कि जब मैंने सूर्पणखा को एक सुंदर द्रविड़ स्त्री के रूप में चित्रित किया, तब भी पाठकों ने किसी प्रकार से आहत महसूस नहीं किया. मेरा लेखन पाठकों को इन पात्रों से प्रेम करने और उनकी आंतरिक गहराइयों को समझने के लिए प्रेरित करता है.” उन्होंने कहा, “वाल्मीकि द्वारा पहली रामायण लिखे जाने के बाद, विभिन्न भाषाओं में इसके सैकड़ों संस्करण आए, जिनमें से प्रत्येक में नई कहानियां जोड़ी गईं. यह महाकाव्य वास्तव में कभी समाप्त नहीं होता. मेरा काम इसी सतत परंपरा का हिस्सा है, बस इसे एक नए दृष्टिकोण से बताया गया है.”

वोल्गा ने कर्नाटक में दशहरा समारोह में बुकर पुरस्कार विजेता बानू मुश्ताक को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किए जाने से जुड़े विवाद (यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है) पर कहा,”ऐसे विवाद ब­ढ़ते राजनीतिकरण को दर्शाते हैं.” उन्होंने कहा, “आजकल हर चीज राजनीतिक होती जा रही है. बानू मुश्ताक को ही यह तय करना है कि वह निमंत्रण स्वीकार करें या नहीं, जबकि उन्हें आमंत्रित करने वालों को भी ऐसा करने का अधिकार है. भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, और हर नागरिक के अधिकारों का सम्मान किया जाना चाहिए.” वोल्गा के पौराणिक कथाओं के प्रति सूक्ष्म दृष्टिकोण ने उन्हें व्यापक पाठक वर्ग दिलाया है, तथा उनकी रचनाओं को पारंपरिक कथाओं में लंबे समय से खामोश रखे गए पात्रों को आवाज देने के लिए सराहा गया है.

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