शिवसेना के उद्धव ठाकरे गुट के कार्यकर्ता चुनाव चिह्न ‘मशाल’ लेकर बाल ठाकरे के स्मारक पर गये

Author: Yogesh Kumar Sahu
UPDATED: Tue, 11 Oct 2022 06:27 PM
शिवसेना के उद्धव ठाकरे गुट के कार्यकर्ता चुनाव चिह्न ‘मशाल’ लेकर बाल ठाकरे के स्मारक पर गये
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मुंबई. शिवसेना के उद्धव ठाकरे धड़े के कार्यकर्ता मंगलवार को हाथों में मशाल लेकर पार्टी संस्थापक बाल ठाकरे के स्मारक गए. चुनाव आयोग ने सोमवार को इस धड़े को ‘मशाल’ चुनाव चिह्न आवंटित किया था. पार्टी कार्यकर्ता हाथों में जलती मशाल लेकर उपनगरीय क्षेत्र बांद्रा में पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के निजी निवास ‘मातोश्री’ भी गये. उद्धव ठाकर ने पार्टी कार्यकर्ताओं से नये चुनाव निशान की अहमियत को समझने का आह्वान किया है.

इसे अंधेरी पूर्व विधानसभा क्षेत्र में उपचुनाव से पहले लोगों को नये चुनाव निशान से रूबरू कराने की कवायद के तौर पर देखा जा रहा है. यहां इस विधानसभा सीट के लिए तीन नवंबर को उपचुनाव होना है. नागपुर और औरंगाबाद समेत विभिन्न जिलों में पार्टी कार्यकर्ताओं ने नये चुनाव निशान के साथ जुलूस निकाला.

सोमवार को चुनाव आयोग ने शिवसेना के उद्धव ठाकरे धड़े को ‘मशाल’ चुनाव चिह्न आवंटित किया था. उसने धार्मिक बोध का हवाला देते हुए ‘त्रिशूल’ पर उसका दावा खारिज कर दिया था. शिवसेना के प्रतिद्वंद्वी गुटों के बीच विवाद को लेकर निर्वाचन आयोग ने सोमवार को एक आदेश जारी कर उद्धव ठाकरे गुट के लिए पार्टी के नाम के रूप में ‘शिवसेना – उद्धव बालासाहेब ठाकरे’ नाम आवंटित किया जबकि एकनाथ शिंदे के गुट को ‘बालासाहेबंची शिवसेना’ नाम आवंटित किया.

उद्धव ठाकरे गुट ‘मशाल’ चिह्न पर मुंबई की अंधेरी सीट पर विधानसभा उपचुनाव लड़ेगा. शिवसेना विधायक रमेश लटके के निधन के कारण यह सीट खाली हुई है. इस सीट पर उपचुनाव में सत्तारूढ़ भाजपा और शिवसेना के उद्धव ठाकरे गुट के बीच सीधा मुकाबला होने की संभावना है.

‘धनुष-बाण’ से लेकर ‘मशाल’ तक-शिवसेना के बदलते रहे चुनाव चिह्न

निर्वाचन आयोग से ‘मशाल’ चुनाव चिह्न मिलने के साथ शिवसेना के उद्धव ठाकरे नीत खेमा ने एक नयी शुरूआत की है. हालांकि, पार्टी के लिए यह कोई नया चिह्न नहीं है क्योंकि इसने 1985 में भी इसका उपयोग कर एक चुनाव जीता था. शिवसेना के साथ 1985 में रहे छगन भुजबल ने मुंबई की मझगांव सीट पर हुए चुनाव में ‘मशाल’ चुनाव चिह्न के साथ जीत हासिल की थी. उस समय पार्टी का कोई स्थायी चुनाव चिह्न नहीं था.

भुजबल ने बाद में बगावत कर दी और पार्टी छोड़ दी और कांग्रेस में शामिल हो गये. अब वह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के एक प्रमुख नेता है. शिवसेना ने अतीत में नगर निकाय और विधानसभा चुनावों के दौरान भी ‘मशाल’ चुनाव चिह्न का इस्तेमाल किया था.
शिवसेना का गठन बाल ठाकरे ने 1966 में किया था और इसे ‘धनुष-बाण’ चिह्न हासिल करने में 23 वर्षों का समय लगा था.
शिवसेना को 1989 में राज्य स्तरीय पार्टी के रूप में मान्यता प्राप्त थी, जिसका मतलब है कि वह राज्य में एक चुनाव चिह्न का इस्तेमाल कर सकती थी. लेकिन, 1966 से 1989 तक वह लोकसभा, विधानसभा और नगर निकाय चुनाव विभिन्न चिह्नों के साथ लड़ी.

करीब 33 साल बाद, निर्वाचन आयोग ने पिछले हफ्ते उसके ‘धनुष-बाण’ चिह्न के इस्तेमाल करने पर एक अंतरिम अवधि के लिए रोक लगा दी. शिवसेना के उद्धव ठाकरे नीत और एकनाथ ंिशदे नीत खेमों के बीच तकरार के बाद आयोग ने यह आदेश जारी किया.
इसने दोनों पक्षों को ‘शिवसेना’ नाम का इस्तेमाल नहीं करने को भी कहा.

निर्वाचन आयोग ने सोमवार को ठाकरे खेमा को पार्टी का नाम ‘शिवसेना-उद्धव बालासाहेब ठाकरे’ आवंटित किया और मुख्यमंत्री ंिशदे नीत खेमा को पार्टी का नाम ‘बालासाहेबबांची शिवसेना’ (बालासाहेब की शिवसेना) आवंटित किया. शिवसेना सांसद गजानन कीर्तिकर ने कहा कि संगठन ने 1967-68 में पहली बार नगर निकाय चुनाव लड़ा था, जब इसके ज्यादातर उम्मीदवारों को ‘तलवार और ढाल’ चुनाव चिह्न मिला था. उन्होंने कहा कि कई उम्मीदवारों को ‘मशाल’ चुनाव चिह्न मिला था.
कीर्तिकर, शिवसेना के गठन के समय से ही पार्टी में हैं.

शिवसेना और इसके संस्थापक बाल ठाकरे पर कई पुस्तकें लिख चुके योगेंद्र ठाकुर ने ‘मार्मिक’ पत्रिका के 23 जुलाई के अंक में एक आलेख में कहा कि पार्टी के वरिष्ठ नेता मधुकर सरपोतदार ने उत्तर-पश्चिम मुंबई में खेरवाडी सीट से 1985 का विधानसभा चुनाव ‘मशाल’ चिह्न पर लड़ा था. ठाकुर ने कहा कि बाल ठाकरे ने सरपोतदार के लिए चुनाव प्रचार किया था. कीर्तिकर ने बताया कि 1985 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में कुछ उम्मीदवारों ने ‘मशाल’ चिह्न पर, जबकि अन्य ने ‘बल्ला’, ‘सूरज’ तथा ‘कप और तश्तरी’ चिह्न पर चुनाव लड़ा था.

उन्होंने बताया कि अक्टूबर 1970 में मुंबई में एक उपचुनाव के दौरान वामनराव महादिक ने ‘उगते सूरज’ चिह्नन पर चुनाव लड़ा था और वह विजयी रहे थे. कम्युनिस्ट नेता कृष्ण देसाई का निधन हो जाने पर यह उपचुनाव कराने की जरूरत पड़ी थी. ठाकुर ने बताया कि 1988 में निर्वाचन आयोग ने फैसला किया कि सभी राजनीतिक दलों को पंजीकरण कराना होगा. तब बाल ठाकरे ने भी शिवसेना का पंजीकरण कराने का फैसला किया. सभी आवश्यक दस्तावेज आयोग को सौंपने के बाद पार्टी का पंजीकरण हो गया. इसने शिवसेना को ‘धनुष-बाण’ चिह्नन हासिल करने में मदद की, जिसपर इसने बाद के कई चुनाव लड़े. उन्होंने कहा , ‘‘उस वक्त तक, शिवसेना विभिन्न चिह्नों पर चुनाव लड़ी.’’

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