एलएसी पर जमीनी स्थिति बहाल करने को लेकर व्यापक सहमति बनी: राजनाथ

Author: Yogesh Kumar Sahu
UPDATED: Thu, 24 Oct 2024 07:48 PM
एलएसी पर जमीनी स्थिति बहाल करने को लेकर व्यापक सहमति बनी: राजनाथ

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नयी दिल्ली. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बृहस्पतिवार को कहा कि भारत और चीन के बीच वार्ता के बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर जमीनी स्थिति बहाल करने के लिए व्यापक सहमति बन गयी है, जिसमें पारंपरिक क्षेत्रों में गश्त और मवेशियों को चराने की अनुमति देना भी शामिल है. ‘चाणक्य डिफेंस डायलॉग 2024’ में रक्षा मंत्री ने दोनों देशों के बीच हुए समझौते को एक ”महत्वपूर्ण घटनाक्रम” बताया, जो वैश्विक मंच पर रक्षा वार्ता के महत्व को रेखांकित करता है.

सिंह ने कहा, ”भारत और चीन एलएसी के साथ कुछ क्षेत्रों में मतभेदों को सुलझाने के लिए सैन्य और कूटनीतिक, दोनों स्तर पर बातचीत कर रहे हैं. वार्ता के बाद, समान और पारस्परिक सुरक्षा के सिद्धांत के आधार पर जमीनी स्थिति को बहाल करने के लिए व्यापक सहमति बन गई है.” रक्षा मंत्री ने कहा, ”इसमें गश्त करना, पारंपरिक क्षेत्रों में मवेशियों को चराने की अनुमति देना भी शामिल है. यह निरंतर बातचीत करने से संभव हुआ है, देर-सवेर समाधान निकल ही जाएगा.”

चार साल से अधिक समय से जारी सैन्य गतिरोध को समाप्त करने में एक बड़ी सफलता के रूप में, भारत ने सोमवार को घोषणा की कि वह पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर गश्त करने को लेकर चीन के साथ एक समझौते पर पहुंच गया है. समझा जाता है कि इस समझौते से देपसांग और डेमचोक क्षेत्रों में गश्त शुरू होगी, क्योंकि इन दोनों स्थानों पर कई बड़े अनसुलझे मुद्दे थे.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने पूर्वी लद्दाख में एलएसी पर गश्त और सैनिकों को पीछे हटाने पर भारत-चीन समझौते का ब्रिक्स सम्मेलन से इतर द्विपक्षीय बैठक में बुधवार को समर्थन किया. उन्होंने विभिन्न द्विपक्षीय वार्ता तंत्र को बहाल करने के निर्देश जारी किए, जो 2020 की सैन्य झड़प से प्रभावित हुए संबंधों को सामान्य बनाने के प्रयासों का संकेत देते हैं.
कार्यक्रम में सिंह ने यह भी कहा कि सुरक्षा एक व्यापक और बहुआयामी अवधारणा है, जिसमें आंतरिक स्थिरता, आर्थिक लचीलापन और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा सहित कई अन्य कारक शामिल हैं, जो सभी एक राष्ट्र के समग्र सुरक्षा ढांचे के लिए आवश्यक हैं.

रक्षा मंत्री ने कहा, ”सुरक्षा को अक्सर सीमा सुरक्षा से जोड़कर देखा जाता है. जब हम सुरक्षा के बारे में सोचते हैं, तो हमारे दिमाग में सीमा पर तैनात सैनिकों, आसमान में गश्त करते विमानों और समुद्र की रखवाली करते नौसेना के जहाजों की छवि आती है. हालांकि, जैसा कि आप सभी जानते हैं, सुरक्षा का मतलब सीमा सुरक्षा से कहीं आगे तक है.” उन्होंने यह भी कहा कि हथियारों और रक्षा उपकरणों का स्वदेशी निर्माण देश की सुरक्षा अवसंरचना के साथ-साथ अर्थव्यवस्था को भी मजबूत करता है.

सिंह ने कहा कि यदि रक्षा को विकास के अभिन्न अंग के रूप में मान्यता दी गई होती तथा अतीत में इसका अधिक व्यापक अध्ययन किया गया होता, तो भारत रक्षा क्षेत्र में बहुत पहले ही आत्मनिर्भरता हासिल कर चुका होता. उन्होंने कहा कि रक्षा में आत्मनिर्भरता एक प्रमुख राष्ट्रीय लक्ष्य है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वैश्विक समुदाय से अलग होकर काम करें.

उन्होंने कहा, ”जब भारत आत्मनिर्भरता की बात करता है, तो यह स्पष्ट करना महत्वपूर्ण है कि इसका मतलब वैश्विक समुदाय से अलग होकर काम करना नहीं है. इसके बजाय, जब हम आत्मनिर्भरता के अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, तो हम एक न्यायसंगत और समावेशी विश्व व्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए सर्मिपत हैं.” रक्षा मंत्री ने कहा कि भारत निष्पक्ष और न्यायपूर्ण अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए सभी देशों के साथ मिलकर काम करने को लेकर प्रतिबद्ध है.

By Yogesh Kumar Sahu