OPINION : आकाश तो चांदी का है, सोना तो यूं ही बदनाम है.. एआई से लेकर साफटवेयर तक चांदी की बल्ले बल्ले…पढ़िए शोधपरक लेख

Author: Navabharat News Group
UPDATED: Fri, 02 Oct 2026 09:08 PM
OPINION : आकाश तो चांदी का है, सोना तो यूं ही बदनाम है.. एआई से लेकर साफटवेयर तक चांदी की बल्ले बल्ले…पढ़िए शोधपरक लेख

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सौ बात की एक बात ये कि सोने क़ीमतों पर तो सबका ध्यान है लेकिन असली चांदी तो चांदी की हो रही है और पब्लिक उतना ध्यान नहीं दे रही चांदी पर। शायद इसलिए भी क्योंकि लोगों को ज़्यादा अंदाज़ा नहीं कि चांदी क्यों चढ़े जा रही है। सोना सबकी ज़ुबान पर रहता है। सोना चढ़ता है तो क्यों चढ़ता है, गिरता है तो क्यों गिरता है ये तो सब समझने की कोशिश भी करते हैं। और चांदी को भी उसी के साथ देख लेते हैं। लेकिन चांदी का खेल अलग चल रहा है आजकल। और उसको अच्छी तरह समझने की ज़रूरत है। क्योंकि चांदी लग रही है AI के डेटा सेंटरों में।

जी, डेटा सेंटरों का नाम तो सुना ही होगा आपने आजकल ख़बरों में छाए हुए हैं। उनमें चांदी क्यों चाहिए वो समझने की ज़रूरत है। क्योंकि सोने की कहानी तो लोग सदियों से समझ रहे हैं और आज तक समझे जा रहे हैं। राजा-महाराजाओं के ख़ज़ाने में सोना होता था, हमारे तो मंदिरों में भी लोग सोना चढ़ाते आए हैं, शादी-ब्याह में तो सोना चाहिए ही होता है, देशों के रिज़र्व बैंक भी अपनी तिजोरियों में सोना रखते हैं। तो सोने की कहानी तो काफ़ी टाइम से चली आ रही है। सैकड़ों साल से यही कहानी चली आ रही है कि असली दौलत तो सोना है। चांदी को तो लोग अक़्सर ‘ग़रीबों का सोना’ मानकर उसपर ज़्यादा ध्यान नहीं देते थे। जो सोना नहीं ले पाता था या उतना नहीं ले पाता था जितनी उसकी चाहत होती थी वो चांदी लेता था।

लेकिन अब एक नई कहानी बन रही है। और ये कहानी उस चांदी की है जो चुपचाप दुनिया के सबसे बड़े दिमाग़ों को चला रही है। उद्योग में और ख़ासकर इलेक्ट्रॉनिक्स में चांदी का इस्तेमाल होता है ये तो पब्लिक को फिर भी थोड़ा बहुत आइडिया होता है। लेकिन अब वो बात काफ़ी आगे तक निकल गयी है। AI तो आपने सुन ही लिया होगा। आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस। इस्तेमाल भी करने लगें हो शायद। बहुत से लोग तो कर रहे हैं चैट GPT वगैरह इस्तेमाल। फ़ोन पर, कंप्यूटर पर, एक सवाल पूछते हैं और तुरंत जवाब आ जाता है, या तस्वीर बन जाती है, या वीडियो तैयार हो जाता है। ये जादू हवा में नहीं होता। ये जादू जहां से आपके फ़ोन तक आता है उस जगह को कहते हैं डेटा सेंटर। क्योंकि सारा खेल ही डेटा का है। तो ये ऐसी इमारतें हैं जिनमें एक तरह से यूं समझ लीजिये कि हज़ारों-लाखों कंप्यूटर एक साथ दिन-रात बिना रुके काम कर रहे हैं। आपके सारे सवाल इस डेटा सेंटर तक जाते हैं और वहीं से जवाब आते हैं। और ये कंप्यूटर सिर्फ़ डेटा की फ़ाइलें नहीं रखते।

ये AI वाले कंप्यूटर हैं। इनको ऐसे डिज़ाइन किया हुआ होता है कि सोच सकते हैं आपकी तरह। इंटेलिजेंट होते है। तभी तो आर्टफ़िशियल इंटेलिजेंस कहते हैं। और सोचने का मतलब क्या। मतलब हर बार जब ये जवाब देते हैं तो इनकी प्रोग्रैमिंग ऐसी होती है कि ये अपने जवाबों से भी सीखते हैं। ऐसे ही तो सीख-सीख कर लोग इंटेलिजेंट बनते हैं। वैसे ही ये कंप्यूटर भी इंटेलिजेंट बनते जाते हैं। इन इमारतों को डेटा सेंटर कहते हैं। और अब दुनिया भर में होड़ लगी है डेटा सेंटर बनाने की। क्यों इतनी जल्दी-जल्दी ये डेटा सेंटर बनते जा रहे हैं? क्योंकि हर कंपनी इस दौड़ में लगी है, हर सरकार इस दौड़ में लगी है, हर देश इसी दौड़ में है कि AI में पीछे ना रह जाएं। ये ख़तरा खड़ा हो गया है कि जो पीछे रह गया वो भविष्य से कट जाएगा।

ऐमेज़ॉन डेटा सेंटर बना रही है, माइक्रोसॉफ्ट डेटा सेंटर बना रही है, गूगल डेटा सेंटेर बना रही है, मेटा डेटे सेंटर बना रही है। इतनी सारी कंपनियां सैकड़ों हज़ोरों करोड़ डॉलर सिर्फ़ इन्हीं केंद्रों पर ख़र्च कर रही हैं। क्यों चाहिएं इतने डेटा सेंटर? क्योंकि अब मुक़ाबला सॉफ़्टवेयर लिखने का नहीं रह गया। कि किसका कंप्यूटर प्रोग्रैम ज़्यादा बढ़िया चल रहा है। अब तो मुक़ाबला इस बात का हो गया है कि किसके पास सोचने वाली मशीनें ज़्यादा हैं। AI कोई ऐप नहीं है जो एक बार बनाकर भूल जाओ। AI तो एक भूखा जानवर है। जितना बड़ा मॉडल बनाना है, जितने ज़्यादा लोगों को जवाब देना है, जितने तेज़ जवाब देने हैं, उतनी ही बिजली चाहिए और उतने ही कंप्यूटर चाहिएं। डेटा सेंटर वही जगह है जहां ये कंप्यूटर होते हैं। जिसके पास ज़्यादा डेटा सेंटर होंगे, उसके पास उतना ज़्यादा कंप्यूटर वाल दिमाग़ होगा।

मतलब जैसे जब औद्योगिक क्रांति आई थी तो क्या हुआ था? जिसके पास ज्यादा मशीनें थीं, वो ज्यादा कपड़ा बनाता था, ज़्यादा सस्ता बनाता था, और बाज़ार पर कब्ज़ा कर लेता था। आज जो कंपनी ज्यादा डेटा सेंटर खड़े कर लेगी, वो AI का बड़ा मॉडल ट्रेन कर सकेगी। बड़ा मॉडल बेहतर जवाब देगा। बेहतर जवाब देने वाली कंपनी के पास ज़्यादा ग्राहक आएंगे। ग्राहक आएंगे तो पैसा आएगा। पैसा आएगा तो और डेटा सेंटर बनेंगे। अब आ जाइए चांदी पर। इन मशीनों को चांदी की क्या ज़रूरत? सोना क्यों नहीं? तांबा क्यों नहीं? क्योंकि चांदी में बिजली का सबसे तेज़ रफ़्तार में बहता है। स्कूल में पढ़ा होगा याद कीजिए, गुड कंटक्टर ऑफ़ इलेक्ट्रिसिटी। वैसा तो कॉपर यानी तांबा भी गुड कंडक्टर ऑफ़ इलेक्ट्रिसिटी होता है। लेकिन चांदी में बिजली सबसे तेज़ दौड़ती है। तो क्या उससे AI की स्पीड ज़्यादा हो जाती है? नहीं, स्पीड तो चिप पर डिपेंड करती है। लेकिन बिजली ऐसा समझ लो कि ऐसे बहती है जैसे किसी पाइप से पानी बहता है।

जैसे पाइप पतला हो या कोई रुकावट हो तो पानी रुकता है, प्रेशर कम हो जाता है। वैसे ही डेटा सेंटर की सर्किट में अगर बिजली में कोई बाधा आती है तो सर्किट गर्म हो जाता है। तो ऐसे समझो जैसे तांबे का पाइप अच्छा है। लेकिन चांदी का पाइप उससे भी चिकना होता है एक तरह से। बिजली सर्र से दोड़ती है चांदी के तारों से। सर्किट कम गर्म होता है। AI डेटा सेंटर ये छोटी-सी बात बड़ी हो जाती है। सर्किट का एक रैक इतनी बिजली खाता है जितनी कभी पूरा दफ्तर खाता था। अगर रास्ते में बिजली का थोड़ा हिस्सा गर्मी बनकर बर्बाद हो गया, तो चिप तक पूरी ताकत नहीं पहुंचती। चिप ज्यादा गर्म होकर खुद को धीमा कर लेगी। इंजीनियर इसे थ्रॉटलिंग कहते हैं। मतलब मशीन अपनी सुरक्षा के लिए स्पीड कम कर लेती है। चांदी वाला रास्ता इस को कम करता है। सिग्नल फ़ुल स्पीड से दौड़ते हैं। डेटा बिना गड़बड़ी के पहुंचता है। चांदी हाई स्पीड पर सिग्नल को बिगड़ने नहीं देती। और डेटा सेंटर में बन रही गर्मी को कम करती है। तो हाल ये है कि दुनिया में जितनी चांदी निकल रही है उसका 10% तो ये डेटा सेंटर खा रहे हैं। और ये डेटा सेंटर बने ही जा रहे हैं। आगे और बनते जाएंगे।

अभी से ये हाल है कि चिली जैसा देश, जो दुनिया का छठा सबसे बड़ा चांदी निकालने वाला देश है, साल भर में जितनी चांदी निकालता है, उतनी चांदी तो अकेले ये डेटा सेंटर निगल रहे हैं। इसको ऐसे समझिए कि पुराने कंप्यूटर सर्वर में अगर लगभग 60 ग्राम चांदी लगती थी तो नए AI के सर्वर में 180 ग्राम से भी ज़्यादा चांदी लगती है। और एक सर्वर की बात नहीं है। हजारों सर्वर बन रहे है, सैकड़ों रैक बन रहे हैं सर्वरों के, और दर्जनों AI डेटा सेंटर बन रहे है। बिजली पहुंचाने वाले तार, स्विचगियर, बैकअप सिस्टम, सबमें चांदी लग रही है। साल 2000 में पूरी दुनिया के ITकेंद्रों की बिजली क्षमता 1 GW से भी कम थी। अब AI के डेटा सेंटरों में 50 GW अभी से पहुंच चुकी है। यानी चांदी की भूख बढ़ती ही जा रही है। पहले तो चांदी के ज्यादातर गहने बनते थे, बर्तन बनते थे, सिक्के ढलते थे। फोटोग्राफी के जमाने में फिल्म बनाने में चांदी लगती थी। लेकिन डिजिटल कैमरा आया तो वो मांग बैठ गई थी। गहने और बर्तन आज भी बनते हैं, लेकिन चांदी महंगी हुई तो लोग कम खरीदने लगे। लेकिन AI वाली मांग अभी तो कम होती दिखती नहीं। सोलर पैनल में भी चांदी लगती है लेकिन वहां चांदी की पतली परत से काम चलाने की तकनीक आ चुकी है। AI में ऐसी कोई तकनीक अभी तो आती नहीं दिख रही। तो सोने की मांग तो उन्हीं ऐतिहासिक वजहों से बनी हुई है आज भी, लेकिन चांदी भविष्य की धातु बन रही है। इसलिए चांदी की चांदी हो रही है और चांदी की चांदी आगे भी होती रहेगी ऐसा लग रहा है।

By Navabharat News Group