कश्मीर : निगरानी व्यवस्था को चकमा देकर पिछले एक साल से हो रही घुसपैठ से सुरक्षा को खतरा

Author: Yogesh Kumar Sahu
UPDATED: Sun, 27 Oct 2024 08:07 PM
कश्मीर : निगरानी व्यवस्था को चकमा देकर पिछले एक साल से हो रही घुसपैठ से सुरक्षा को खतरा

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श्रीनगर/नयी दिल्ली. जम्मू-कश्मीर के गांदरबल जिले के गगनगीर में 20 अक्टूबर को हुए आतंकवादी हमले की जांच के दौरान खुफिया जानकारी की कमी और नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर पिछले एक साल से निगरानी व्यवस्था को चकमा देकर घुसपैठ होने की जानकारी सामने आई है. अधिकारियों ने रविवार को यह जानकारी दी.

गगनगीर में हुए हमले में एक स्थानीय डॉक्टर और बिहार के दो मजदूरों सहित सात लोगों की जान चली गई थी. गगनगीर हमले ने कश्मीर में स्थानीय युवकों के आतंकवादी समूहों में शामिल होने की ”गुप्त प्रवृत्ति” के बारे में चिंता पैदा कर दी है. जेड-मोड़ सुरंग निर्माण स्थल पर हुए इस हमले में दो आतंकवादी शामिल थे. इनमें से एक की पहचान दक्षिण कश्मीर के कुलगाम के स्थानीय युवक के रूप में हुई है, जो 2023 में एक आतंकवादी समूह में शामिल हो गया था, जबकि दूसरे के बारे में माना जाता है कि वह पाकिस्तान से आया था.

सुरक्षा अधिकारियों ने स्थानीय युवकों के तेजी से कट्टरपंथी बनने पर चिंता व्यक्त की और ऐसे युवकों की पहचान के लिए उन्नत मुखबिर नेटवर्क की आवश्यकता पर बल दिया. जम्मू-कश्मीर पुलिस और भारतीय सेना की चिनार कोर के नेतृत्व में हाल के बदलावों के मद्देनजर, स्थानीय युवाओं को आतंकवाद में शामिल होने से रोकने के लिए मुखबिर नेटवर्क को बढ.ाने पर नये सिरे से ध्यान केंद्रित किया जा रहा है.

बीस अक्टूबर को आतंकवादी सुरंग निर्माण स्थल में घुसे और करीब दस मिनट तक गोलीबारी की और फिर पास के जंगलों में भाग गए. स्थानीय हमलावर के पास एके राइफल थी, जबकि उसके साथी के पास अमेरिकी एम-4 राइफल थी. अधिकारियों ने संकेत दिया कि स्थानीय आतंकवादी ने संभवत: अपने समूह के साथ मिलकर दूसरे हमलावर की घुसपैठ को सुगम बनाया, जो शायद इस वर्ष मार्च में तुलैल सेक्टर से नियंत्रण रेखा पार कर आया था.

पिछले वर्ष दिसंबर से ही उत्तरी कश्मीर के तुलैल, गुरेज, माछिल और गुलमर्ग सहित विभिन्न क्षेत्रों से घुसपैठ के प्रयासों की खुफिया रिपोर्ट मिल रही हैं, लेकिन सेना पुष्टि के अभाव में इनसे इनकार करती रही है. अधिकारियों ने बताया कि माना जा रहा है कि बृहस्पतिवार को गुलमर्ग क्षेत्र के बोटा पथरी में हुई घटना में शामिल आतंकवादी अगस्त की शुरुआत से ही अफरावत के ऊंचे इलाकों में छिपे हुए थे. इस हमले में दो सैनिक और सेना के दो पोर्टर की जान चली गई थी.

इससे पहले, सुरक्षा एजेंसियों को ”संरक्षण” की रणनीति अपनाने वाले आतंकवादियों द्वारा उत्पन्न ”छिपे हुए खतरे” से निपटने में चुनौती का सामना करना पड़ा है. इस रणनीति के तहत घुसपैठिये स्थानीय आबादी के बीच तब तक छिपे रहते हैं, जब तक उन्हें पाकिस्तान में बैठे अपने आकाओं से आदेश नहीं मिल जाता. अधिकारियों का मानना ??है कि केंद्र-शासित प्रदेश में हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव के मद्देनजर कड़े सुरक्षा उपाय और अंतरराष्ट्रीय जांच में वृद्धि के कारण ये समूह कम सक्रिय रहे हैं.

By Yogesh Kumar Sahu