
नयी दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि किसी आरोपी को आरोपपत्र का हिस्सा रहे दस्तावेजों तक पहुंच से वंचित नहीं किया जा सकता, क्योंकि ऐसा करने से उसके निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति जे के माहेश्वरी और न्यायमूर्ति ए एस चंदूरकर की पीठ ने की। पीठ ने निर्देश दिया कि 1923 के शासकीय गोपनीयता अधिनियम के तहत 2007 में दर्ज एक मामले में मुकदमे का सामना कर रहे सेवानिवृत्त मेजर जनरल वी के ंिसह को कुछ ”अत्यंत गोपनीय” दस्तावेजों की टाइप की हुई प्रतियां उपलब्ध कराई जाएं।
न्यायालय ने कहा कि केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) का मामला यह नहीं है कि ंिसह द्वारा मांगे गए दस्तावेज मुकदमे के लिए अप्रासंगिक हैं। इसने कहा कि अभियोजन पक्ष की एकमात्र आपत्ति यह थी कि ये दस्तावेज राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से ”अत्यंत गोपनीय” हैं और उनकी प्रतियां उपलब्ध कराने पर उनके सार्वजनिक होने की आशंका है।
ंिसह देश की खुफिया एजेंसी रॉ के अधिकारी भी रह चुके हैं। पीठ ने 18 मई के अपने आदेश में कहा, ”यह स्थापित कानून है कि किसी आरोपी को आरोपपत्र का हिस्सा बने दस्तावेजों, जिनमें सामान्य डायरी के दस्तावेज भी शामिल हैं, तक पहुंच से वंचित नहीं किया जा सकता, यदि वे दस्तावेज सद्भावना में प्राप्त किए गए हों, अभियोजन के मामले से संबंधित हों और लोक अभियोजक द्वारा न्याय तथा निष्पक्ष सुनवाई के हित में उनके प्रकटीकरण को आवश्यक माना गया हो।”
इसने कहा, ”ऐसा इसलिए है क्योंकि ऐसे दस्तावेजों को रोके रखने से आरोपी के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार को गंभीर क्षति पहुंच सकती है।” न्यायालय ने यह आदेश ंिसह की उस याचिका पर दिया, जिसमें उन्होंने पिछले वर्ष सितंबर में दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए आदेश को चुनौती दी थी।
उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के दिसंबर 2009 के उस आदेश में संशोधन किया था, जिसमें अभियोजन पक्ष को ंिसह द्वारा मांगे गए दस्तावेजों की प्रतियां उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया था। ंिसह ने दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 207 के तहत अधीनस्थ अदालत में आवेदन दाखिल कर अभियोजन पक्ष को कुछ ऐसे दस्तावेज उपलब्ध कराने का निर्देश देने का अनुरोध किया था, जो आरोपपत्र का हिस्सा थे लेकिन उन्हें नहीं दिए गए थे।
सीआरपीसी की धारा 207 आरोपी को पुलिस रिपोर्ट और अन्य दस्तावेजों की प्रति उपलब्ध कराने से संबंधित है। याचिका पर विचार करते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा, ”हमारी राय में, चूंकि ये दस्तावेज आरोपपत्र का हिस्सा हैं और आरोपी के खिलाफ इस्तेमाल किए जा रहे हैं, इसलिए इन्हें अपीलकर्ता (ंिसह) को उपलब्ध कराया जाना चाहिए।”
पीठ ने कहा कि आरोपी के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का एक महत्वपूर्ण पहलू है, का राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता से संतुलन करते हुए उसने सीबीआई की ओर से पेश विधि अधिकारी को एक समान प्रस्ताव पेश करने को कहा।
पीठ ने उल्लेख किया कि सुनवाई के दौरान विधि अधिकारी ने कहा है कि वे दस्तावेजों की टाइप की हुई प्रतियां उपलब्ध कराएंगे, लेकिन इस शर्त के साथ कि ंिसह उनका उपयोग केवल न्यायालयी कार्यवाही के लिए करेंगे और दस्तावेज किसी भी प्रकार से, विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक या ंिप्रट मीडिया अथवा सोशल मीडिया मंचों पर प्रसारित नहीं किए जाएंगे।
पीठ ने कहा, ”उपरोक्त परिस्थितियों को देखते हुए उच्च न्यायालय का आदेश रद्द किया जाता है और निचली अदालत के आदेश में संशोधन किया जाता है।” सीबीआई ने सितंबर 2007 में ंिसह के खिलाफ एक शिकायत के आधार पर मामला दर्ज किया था। आरोप था कि उन्होंने अपनी पुस्तक ‘इंडियाज एक्सटर्नल इंटेलीजेंस- सीक्रेट्स आॅफ रिसर्च एंड एनालिसिस ंिवग’ प्रकाशित कर गोपनीय जानकारी का खुलासा किया।



